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2 साल का झेला बैन, फिर जीरो से की शुरुआत, गोल्ड मेडल जीतने के बाद परवीन बोलीं- मुश्किल अनुभवों ने बनाए मजबूत

Endured a two-year ban, then started from scratch; after winning gold, Parveen says tough experiences made her stronger - Sports News in Hindi

निशियो। भारतीय बॉक्सर परवीन हुड्डा ने कहा कि करीब दो साल के बैन और उसके बाद की कठिन वापसी के दौरान मानसिक रूप से मजबूत बने रहना उनकी सबसे बड़ी ताकत रही। उन्होंने बताया कि इसी मानसिक मजबूती ने उन्हें चुनौतियों से उबरने में मदद की और शुक्रवार को महिलाओं के 65 किग्रा वर्ग में एशियन गेम्स 2026 का गोल्ड मेडल जीतने का रास्ता तैयार किया। परवीन को 2023 में 'वेयरअबाउट्स क्लॉज' के उल्लंघन के कारण 22 महीने का प्रतिबंध झेलना पड़ा था। सस्पेंशन खत्म होने के बाद उन्होंने प्रतियोगिताओं में वापसी की, लेकिन उनका संघर्ष वहीं नहीं रुका। उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में ग्लासगो में निराशा हाथ लगी, जहां वह महिलाओं के 65 किग्रा वर्ग के क्वार्टर फाइनल में हारकर मेडल की दौड़ से बाहर हो गई थीं। बैन के कारण उन्हें एशियन गेम्स 2022 का अपना ब्रॉन्ज मेडल भी गंवाना पड़ा, जिससे टॉप पर वापसी का उनका सफर और भी मुश्किल हो गया। हालांकि, उन मुश्किलों को अपने करियर पर हावी होने देने के बजाय, परवीन ने जीरो से शुरुआत करने का फैसला किया। शुक्रवार को उन्होंने चीनी ताइपे की निएन-चिन चे को हराकर अपना पहला एशियन गेम्स गोल्ड जीता और मौजूदा गेम्स में भारत के लिए महिलाओं की बॉक्सिंग का दूसरा गोल्ड मेडल हासिल किया।
जीत के बाद पत्रकारों से बात करते हुए परवीन ने कहा, "जब मेरे साथ वह सब हुआ, तो मैं मानसिक रूप से टूट गई थी। सब कुछ खत्म हो गया था। मुझे जीरो से शुरुआत करनी पड़ी। मैं कुछ दिनों तक दुखी रही। फिर मैंने खुद को संभाला। मैंने खुद से कहा कि अगर मैंने अभी ट्रेनिंग नहीं की और वापसी नहीं की, तो मुझे जिंदगी भर पछतावा होगा। एक छोटी सी गलती की वजह से इतना कुछ हो गया। इसलिए मैंने सब कुछ अलग नजरिए से देखने का फैसला किया।"
26 वर्षीय बॉक्सर ने ग्लासगो में हार के बाद के दर्दनाक पलों को भी याद किया, जब दूसरे भारतीय बॉक्सरों को सफल होते देख वह बहुत दुखी हुई थीं। उन्होंने कहा, "मैं वहां खड़ी होकर रो रही थी। मैंने सोचा, अब रोने का क्या फायदा? चलो कड़ी मेहनत करते हैं। वरना, मैं अगली प्रतियोगिता में फिर रोऊंगी। इसलिए अगले दिन, मैं उठी और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की। मैंने सोचा कि मैं जितना चाहूं उतना रोऊंगी। मैं अगली प्रतियोगिता में हंसते हुए आऊंगी।"
शुक्रवार को यह सोच बहुत काम आई, जब परवीन एक और कड़े मुकाबले में फंसी हुई थीं। उन्होंने पहले राउंड में 5-0 से दबदबा बनाया, लेकिन दूसरे राउंड में 'चे' ने भी उसी स्कोर से जवाब दिया। गोल्ड मेडल दांव पर था, इसलिए परवीन ने अपना संयम बनाए रखा और आखिरी राउंड 3-2 से अपने नाम किया। उन्होंने कहा, "तीसरे राउंड में मुझे एक फैसला लेना था। मुझे बस इतना याद आया कि मुझे डिप्टी डायरेक्टर बनना है। हरियाणा में अगर मैं गोल्ड जीतती हूं, तो मुझे डिप्टी डायरेक्टर का पद मिलेगा। यह मेरा ड्रीम जॉब था। फिर मैंने वह राउंड अपने पक्ष में कर लिया।"
परवीन ने कहा कि उन्होंने नतीजों की चिंता करने के बजाय मानसिक रूप से तटस्थ रहना और अपने काम पर ध्यान देना सीख लिया है। उन्होंने कहा, "मुझे बुरा लग रहा था, लेकिन मैं उन चीजों के लिए शुक्रगुजार थी जो बॉक्सिंग ने मुझे दी हैं। इसी कारण मैंने नतीजे के बारे में सोचा, जैसा कि गीता में कहा गया है: कर्म करो; नतीजे की चिंता मत करो। मैंने सोचा कि मैं पूरे दिल से ट्रेनिंग करूंगी, अपना बेस्ट दूंगी। नतीजा आए या न आए, इसलिए मैं मानसिक रूप से तटस्थ थी।"
अपने करियर के इस दौर को दूसरी यात्रा बताते हुए परवीन ने कहा कि मुश्किल अनुभवों ने उन्हें ज्यादा मजबूत और परिपक्व बना दिया है। उन्होंने कहा, "मैं कह सकती हूं कि यह मेरी दूसरी यात्रा है, लेकिन इस बार मैं पहले से ज्यादा मजबूत हूं क्योंकि जब हम फिर से शुरुआत करते हैं, तो हम मानसिक रूप से अधिक मजबूत हो जाते हैं। मैं और मजबूत और परिपक्व हो गई हूं। मैं अपनी चीजें खुद संभालती हूं और दूसरों पर निर्भर नहीं रहती। मैं और ज्यादा परिपक्व और मानसिक रूप से मजबूत हो गई हूं।"
--आईएएनएस

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