—राजेश कुमार भगताणी
‘मिर्जापुर’ सिर्फ एक वेब सीरीज नहीं रही, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में यह अपने अलग किस्म के किरदारों, संवादों, हिंसा और सत्ता की लड़ाई के कारण एक मजबूत ब्रांड बन चुकी है। ऐसे में जब यही दुनिया बड़े पर्दे पर पहुंचती है तो उम्मीद स्वाभाविक रूप से और बड़ी हो जाती है। ‘मिर्जापुर: द मूवी’ अपने परिचित माहौल के साथ दर्शकों के सामने आती है—बंदूकें हैं, गालियां हैं, बदले की आग है और मिर्जापुर की गद्दी के लिए खूनी संघर्ष भी। लेकिन तीन घंटे से अधिक लंबी इस फिल्म को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इस बार कहानी दर्शकों के लिए नया क्या लेकर आई है?
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पुराने किरदारों की वापसी, लेकिन कहानी में नएपन की कमी
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं। वर्षों से दर्शक जिन चेहरों को इस दुनिया में देखते आए हैं, उन्हें बड़े पर्दे पर देखना निश्चित रूप से एक अलग अनुभव देता है। दिव्येंदु की मुन्ना भैया के रूप में वापसी फिल्म में ऊर्जा भरती है। उनका अंदाज, उनकी आक्रामकता और स्क्रीन पर मौजूदगी आज भी दर्शकों को आकर्षित करती है। कई दृश्यों में वही पुराना मुन्ना भैया दिखाई देता है, जिसने इस फ्रेंचाइजी को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
अली फजल का गुड्डू पंडित इस बार भी अपने परिचित अंदाज में दिखाई देता है। उसके भीतर परिवार, प्रेम और अपराध की दुनिया के बीच चलने वाला संघर्ष मौजूद है, लेकिन फिल्म उसके किरदार को कोई ऐसी नई दिशा नहीं दे पाती जो उसे पहले से अलग बनाती हो। गुड्डू की मौजूदगी जरूर है, लेकिन उसके हिस्से में उतना प्रभावशाली लेखन नहीं आता, जिसकी इस किरदार से उम्मीद की जाती है।
इस बार क्यों कमजोर दिखे कालीन भैया ?
फिल्म की सबसे बड़ी निराशाओं में से एक पंकज त्रिपाठी के कालीन भैया का सीमित इस्तेमाल है। जिस किरदार के आसपास ‘मिर्जापुर’ की पूरी दुनिया खड़ी दिखाई देती रही है, इस फिल्म में वही कई बार कहानी के पीछे छूटता नजर आता है।
पंकज त्रिपाठी अपनी सहज अभिनय शैली से हर दृश्य में प्रभाव पैदा करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन यहां समस्या अभिनय की नहीं, बल्कि किरदार को दिए गए अवसरों की है। कालीन भैया की मौजूदगी उतनी मजबूत महसूस नहीं होती, जितनी इस कहानी में होनी चाहिए थी। फिल्म कई बार अपने ही सबसे महत्वपूर्ण किरदार को पर्याप्त ताकत देने में चूक जाती है।
रवि किशन की एंट्री ने भरी नई ऊर्जा
फिल्म की सबसे दिलचस्प एंट्री रवि किशन की है। बब्बन यादव के रूप में वह कहानी में एक नई ऊर्जा लेकर आते हैं। उनका किरदार तेज, आक्रामक और अप्रत्याशित है। रवि किशन अपने अंदाज से इस किरदार को सिर्फ एक सामान्य गैंगस्टर नहीं रहने देते।
जब फिल्म की कहानी कुछ जगह धीमी पड़ती है, तब उनका स्क्रीन पर आना दर्शक का ध्यान फिर से खींचता है। उनकी मौजूदगी फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में गिनी जा सकती है। रवि किशन अपने संवादों और बॉडी लैंग्वेज के जरिए किरदार में अलग तरह की ताकत भरते हैं।
दिव्येंदु की वापसी बनी फिल्म की ताकत
दिव्येंदु एक बार फिर मुन्ना भैया के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस और दूसरे किरदारों के साथ आमना-सामना फिल्म के मनोरंजक हिस्सों में शामिल है।
मुन्ना भैया का किरदार पहले से ही इस फ्रेंचाइजी के सबसे लोकप्रिय किरदारों में रहा है और उनकी वापसी प्रशंसकों के लिए फिल्म का बड़ा आकर्षण है। दिव्येंदु इस किरदार की पुरानी लोकप्रियता को बनाए रखने में सफल दिखाई देते हैं।
रसिका दुग्गल ने संभाला क्लाइमेक्स
रसिका दुग्गल का किरदार भी फिल्म में महत्वपूर्ण असर छोड़ता है। शुरुआत में उनके किरदार से जुड़ा ट्रैक कुछ कमजोर और अनावश्यक लग सकता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी अंतिम चरण में पहुंचती है, यही हिस्सा फिल्म को संभालने में अहम भूमिका निभाता है।
खासकर क्लाइमेक्स के करीब रसिका दुग्गल के किरदार से जुड़ी घटनाएं कहानी को एक जरूरी दिशा देती हैं। फिल्म के अंतिम हिस्से में उनका योगदान स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।
बाकी कलाकारों को नहीं मिला पूरा मौका
जितेंद्र कुमार भी फिल्म का हिस्सा हैं और उन्हें एक लोकप्रिय किरदार की यादगार छवि के साथ तुलना की चुनौती का सामना करना पड़ता है। कुछ दृश्यों में वह प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन उनके किरदार को उतनी मजबूती से विकसित नहीं किया गया है।
वहीं, अभिषेक बनर्जी, श्रिया पिलगांवकर और श्वेता त्रिपाठी जैसे कलाकारों के पास प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन फिल्म उन्हें अपनी क्षमता के अनुरूप इस्तेमाल नहीं कर पाती। इतने सारे लोकप्रिय किरदारों को एक साथ लाने के बावजूद कहानी सभी को पर्याप्त महत्व नहीं दे पाती।
सबसे बड़ी कमजोरी: कहानी फिर उसी मोड़ पर
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी दोहराव भरी कहानी है। ‘मिर्जापुर’ की दुनिया में सत्ता की लड़ाई, बाहुबलियों की टक्कर और गद्दी हासिल करने की महत्वाकांक्षा पहले भी कई बार दिखाई जा चुकी है। इस फिल्म में भी संघर्ष का केंद्र वही है—मिर्जापुर की सत्ता किसके हाथ में जाएगी।
समस्या यह नहीं है कि कहानी पुरानी जमीन पर चलती है, बल्कि परेशानी यह है कि वह उस जमीन पर कोई नया रास्ता नहीं बनाती। दर्शक लगातार इंतजार करता है कि शायद कहानी कोई बड़ा मोड़ लेगी, लेकिन ज्यादातर समय घटनाक्रम परिचित रास्ते पर ही चलता रहता है।
तीन घंटे 15 मिनट की लंबाई बनी बोझ
फिल्म की अवधि करीब तीन घंटे 15 मिनट है, जो इसकी बड़ी चुनौतियों में से एक बनती है। कई दृश्य ऐसे हैं जिन्हें छोटा किया जा सकता था। फिल्म का मध्य भाग विशेष रूप से धीमा महसूस होता है।
पुराने रिश्ते, दुश्मनियां और सत्ता के समीकरण बार-बार सामने आते हैं, जबकि ‘मिर्जापुर’ की दुनिया से परिचित दर्शक इन्हें पहले से अच्छी तरह जानते हैं। यही दोहराव फिल्म की गति को प्रभावित करता है और कई जगह दर्शक का धैर्य भी आजमाता है।
दूसरे हाफ में संभलती है फिल्म
निर्देशन की बात करें तो फिल्म का अंतिम हिस्सा पहले भाग की तुलना में ज्यादा प्रभावी है। क्लाइमेक्स के करीब आते-आते कहानी की गति तेज होती है और फिल्म कुछ हद तक अपनी पकड़ बनाती है। बड़े सेट, तेज एडिटिंग और बेहतर गति के कारण दूसरा हाफ ज्यादा प्रभावशाली महसूस होता है। हालांकि, यहां पहुंचने से पहले दर्शक को एक लंबी और कई जगह धीमी यात्रा तय करनी पड़ती है।
जब पहले से पता हो आगे क्या होने वाला है
फिल्म का एक और कमजोर पक्ष यह है कि कहानी के कई परिणाम दर्शकों के लिए पूरी तरह अनजान नहीं हैं। चूंकि यह कहानी ‘मिर्जापुर’ की पहले से स्थापित दुनिया और घटनाक्रम से जुड़ी है, इसलिए कई बड़े टकरावों में वह तनाव नहीं बन पाता जिसकी उम्मीद की जाती है। एक गैंगस्टर ड्रामा में दांव जितना बड़ा और अनिश्चित होता है, कहानी उतनी ही रोमांचक बनती है। यहां कई बार दर्शक को यह महसूस होता है कि वह पहले से परिचित घटनाओं को फिर से देख रहा है।
एक्शन और हिंसा भरपूर, लेकिन क्या इतना काफी है?
एक्शन ‘मिर्जापुर’ के स्वभाव के अनुरूप है। गोलियां चलती हैं, हिंसा होती है और गैंगवार का माहौल लगातार बना रहता है। फ्रेंचाइजी के प्रशंसकों को यही सब देखने की उम्मीद भी होती है, लेकिन जब हिंसा कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल होने लगे तो उसका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। फिल्म में कई जगह एक्शन बड़ा है, लेकिन कहानी का भावनात्मक और नाटकीय प्रभाव उतना मजबूत नहीं बन पाता।
कमजोर है संगीत पक्ष
फिल्म का संगीत मिर्जापुर की दुनिया के अनुकूल है और माहौल बनाने में मदद करता है। बैकग्राउंड म्यूजिक कई दृश्यों में तनाव और एक्शन को प्रभावशाली बनाता है। हालांकि, फिल्म खत्म होने के बाद कोई ऐसा संगीत या धुन लंबे समय तक याद नहीं रहती। संगीत अपना काम करता है, लेकिन फिल्म की अलग पहचान बनाने में बहुत बड़ा योगदान नहीं दे पाता।
प्रशंसकों के लिए मनोरंजन, नए दर्शकों के लिए सीमित आकर्षण
‘मिर्जापुर: द मूवी’ आखिरकार एक ऐसी फिल्म है, जो अपने पुराने प्रशंसकों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। अगर आप इस फ्रेंचाइजी के कट्टर प्रशंसक हैं तो मुन्ना भैया की वापसी, कालीन भैया, गुड्डू पंडित और बाकी परिचित किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना आपके लिए मनोरंजक अनुभव हो सकता है। लेकिन अगर आप एक नई और मजबूत कहानी की उम्मीद लेकर सिनेमाघर जाएंग तो फिल्म कुछ हद तक निराश कर सकती है। फिल्म अपने प्रशंसकों को उनका परिचित माहौल जरूर देती है, लेकिन उसी दुनिया में कोई बड़ा नया रोमांच पैदा करने में पूरी तरह सफल नहीं होती।
‘मिर्जापुर: द मूवी’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें किरदारों का भौकाल कहानी से बड़ा हो जाता है। रवि किशन की दमदार एंट्री, दिव्येंदु की प्रभावशाली वापसी और रसिका दुग्गल का महत्वपूर्ण योगदान फिल्म की प्रमुख खूबियां हैं।
वहीं, पंकज त्रिपाठी जैसे अभिनेता का सीमित इस्तेमाल, कहानी में नएपन की कमी और तीन घंटे से अधिक की लंबाई फिल्म को कमजोर बनाती है। फिल्म में शोर बहुत है, गोलियां बहुत हैं और लोकप्रिय किरदारों की भी कमी नहीं है, लेकिन कहानी के पास कहने के लिए बहुत कुछ नया नहीं है।
कुल मिलाकर, ‘मिर्जापुर: द मूवी’ फ्रेंचाइजी के प्रशंसकों के लिए एक बड़ा सिनेमाई अनुभव हो सकती है, लेकिन एक स्वतंत्र फिल्म के रूप में देखें तो यह अपनी कहानी और गति के कारण उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।
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