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स्मृति शेष : सुरों की जादूगरनी का अनंताकाश में प्रस्थान

In Memoriam : The Enchantress of Melodies Departs for the Eternal Sky - Jaipur News in Hindi

सैयद हबीब, जयपुर इंदौर की गलियों से निकला संगीत का वह कारवां आज थम गया, जिसने सात दशकों तक भारतीय जनमानस के अहसासों को सुरों से सींचा था। आशा भोसले—सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि आवाज़ की वह लोच थी जिसने शास्त्रीय गायकी की गंभीरता और क्लब सॉन्ग्स की चंचलता के बीच एक ऐसा पुल बनाया, जिस पर चलकर कई पीढ़ियों ने प्यार करना और जीना सीखा। 92 वर्ष की आयु में उनका जाना दरअसल संगीत के एक जादुई युग का अवसान है। आशा जी की शख्सियत में वह कशिश थी जो आर.डी. बर्मन यानी 'पंचम' के संगीत में 'कटी पतंग' की तरह उड़ती थी। मुझे याद आता है, एक बार उन्होंने कहा था कि वे गाते-गाते ही इस दुनिया से विदा होना चाहती हैं। उनकी यह जिजीविषा ही थी जिसने उन्हें 92 की उम्र में भी 30 साल की युवती जैसी ऊर्जा से लबरेज रखा।
साठ और सत्तर के दशक की रिकॉर्डिंग आज के 'डिजिटल कतरन' वाले दौर जैसी नहीं थी। तब सुरों का मेल रूहों के मेल से होता था। आशा जी अक्सर याद करती थीं कि कैसे वे, लता दीदी, रफ़ी और किशोर एक ही कमरे में खड़े होकर लाइव रिकॉर्डिंग करते थे। वहां न कोई एडिटिंग थी, न ऑटो-ट्यून। बस एक-दूसरे की आंखों में झांककर सुर पकड़ने की वह कला थी। लता दीदी जब आलाप लेती थीं, तो आशा जी उनकी उठती उंगलियों और 'आड़ी आंख' के इशारे से समझ जाती थीं कि अब तान कहां से शुरू होनी है। यह वह दौर था जब संगीत सिर्फ सुना नहीं जाता था, महसूस किया जाता था।
पंचम, झाड़ू और 'चांद का अचार' : पंचम और आशा की जोड़ी भारतीय सिनेमा का वह अध्याय है, जिसके बिना 'म्यूजिक हिस्ट्री' अधूरी है। पंचम के साथ उनका रिश्ता सुरों के साथ-साथ हंसी-ठिठोली का भी था। सफाई की इतनी शौकीन कि पंचम दा ने उन्हें सोने का झाड़ू तक भेंट कर दिया था! गुलज़ार साहब के साथ उनकी नोक-झोंक भी कम दिलचस्प नहीं थी। जब गुलज़ार 'इजाज़त' में चांद की मिस्री और उसे तोड़कर खाने की बातें लिखते, तो आशा जी शरारत से कहती थीं— "गुलज़ार भाई, अब आप इस चांद का अचार ही डाल लीजिए!"
तुलना के तराजू और अपनी पहचान : एक ही घर में 'सुर साम्राज्ञी' लता मंगेशकर जैसी विशाल छाया हो, तो अपना वजूद बनाना हिमालय चढ़ने जैसा था। आशा जी ने हमेशा महसूस किया कि उन्हें 'मंगेशकर' होने का लाभ कम और नुकसान ज़्यादा हुआ। दुनिया हमेशा उन्हें लता जी के तराजू में तौलती रही। लेकिन यह उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति ही थी कि उन्होंने अपनी गायकी के लिए एक अलग रास्ता चुना। अगर दीदी 'शुद्धता' की प्रतीक थीं, तो आशा 'प्रयोग' की पर्याय बनीं। उन्होंने पाश्चात्य धुनों को भारतीय गले में ऐसे उतारा कि वह विदेशी नहीं, अपनी लगीं।
अंतिम आलाप : "तब तक ज़िंदा रहें, जब तक काम कर सकें"—आशा जी का यह फलसफा उनके जीवन का मूलमंत्र था। वे बहुभाषाविद बनना चाहती थीं, क्लासिकल की शिखर तक जाना चाहती थीं, और सबसे बढ़कर, वे रुकना नहीं चाहती थीं।
ब्रीच कैंडी अस्पताल की उस खामोशी में आज एक आवाज़ हमेशा के लिए विलीन हो गई, लेकिन 'दम मारो दम' की खनक और 'मेरा कुछ सामान' की कसक हमेशा हमारे आसपास रहेगी। सिनेमा के पर्दे के पीछे की वह आवाज़ अब अनंताकाश के संगीत का हिस्सा बन गई है।
अंतिम प्रणाम, सुरों की उस बागी और बेमिसाल मलिका को!

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Web Title-In Memoriam : The Enchantress of Melodies Departs for the Eternal Sky
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