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एक व्यक्ति, एक संकल्प और पूरा जंगल- ढीकोला के बाऊजी कैलाश चंद्र चौबे ने प्रकृति को समर्पित कर दिया जीवन

One Man, One Resolution, and an Entire Forest - Kailash Chandra Chaube, affectionately known as Bauji of Dhikola, dedicated his life to nature. - Bhilwara News in Hindi

भीलवाड़ा (प्रकाश् चपलोत जैन)।

शाहपुरा तहसील के ढीकोला गांव के बाऊजी कैलाश चंद्र चोबे भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन, उनके कर्म और उनके द्वारा रचा गया हरित संसार आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन चुका है। वे उन विरले लोगों में से थे, जिन्होंने न तो कभी प्रचार चाहा और न ही किसी मंच की तलाश की। उन्होंने जो किया, वह चुपचाप किया, लेकिन उसका असर इतना गहरा है कि आज पूरा क्षेत्र उसे महसूस करता है। बाऊजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि संकल्प सच्चा हो तो अकेला व्यक्ति भी समाज और प्रकृति के लिए बड़ा परिवर्तन कर सकता है। कैलाश चंद्र चौबे केवल राजकीय सेवा में रहे एक साधारण अध्यापक नहीं थे, बल्कि वे सादगी, करुणा और अनुशासन से भरे हुए व्यक्तित्व थे। गांव का हर व्यक्ति उन्हें स्नेह से “बाऊजी” कहता था। उनका स्वभाव अत्यंत शांत, सरल और हंसमुख था। क्रोध जैसे भाव उनसे कोसों दूर रहते थे। वे मानते थे कि मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म प्रकृति और समाज की सेवा है। इसी सोच ने उन्हें दशकों पहले उस रास्ते पर ला खड़ा किया, जिस पर आज लोग पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चल रहे हैं।
जब पर्यावरण संरक्षण न तो कोई बड़ा विषय था और न ही सरकारी योजनाओं या नारों का हिस्सा, तब बाऊजी ने मन ही मन यह संकल्प लिया कि वे धरती को खाली हाथ नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने तय किया कि वे जीवन भर पेड़ लगाएंगे और उनकी देखभाल करेंगे। इसी उद्देश्य से उन्होंने गांव ढीकोला से लगभग एक किलोमीटर दूर शाहपुरा मार्ग पर स्थित एक उपेक्षित, पथरीली और कांटों से भरी भूमि को चुना। जहां लोग जाने से भी कतराते थे, वहां बाऊजी ने भविष्य देख लिया। यही स्थान आगे चलकर “कैलाश नाड़ी” के नाम से पहचाना जाने लगा।
शुरुआत बेहद कठिन थी। उस क्षेत्र में अंग्रेजी बबूल और कांटों का घना जंगल था। पानी का कोई साधन नहीं था। हर पौधा लगाना और उसे जीवित रखना एक बड़ी चुनौती थी। बाऊजी साइकिल पर पानी के केन लटकाकर रोज वहां पहुंचते और नन्हे पौधों को अपने हाथों से सींचते थे। कई बार पौधे सूख जाते, कई बार टूट जाते, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा। वे फिर नए पौधे लगाते और पहले से अधिक लगन से उनकी देखभाल करते।
जब पानी की समस्या बढ़ने लगी, तो बाऊजी ने किसी से मदद नहीं मांगी। उन्होंने अपने निजी धन से वहां कुआं खुदवाया और बाद में जल संरक्षण की दृष्टि से तालाब का निर्माण भी कराया। यह सब उन्होंने न तो किसी योजना के नाम पर किया और न ही किसी प्रशंसा की अपेक्षा में। यह उनके लिए एक साधना थी, एक मौन व्रत था। समय के साथ वह बंजर भूमि हरियाली में बदलने लगी। आज वहां नीम, पीपल, बरगद, शीशम, गुलमोहर, करंज, बेलपत्र और बेर जैसे सैकड़ों वृक्ष खड़े हैं। पक्षियों की चहचहाहट और शीतल हवा उस स्थान को एक जीवंत आश्रम जैसा बना देती है।बाऊजी की सेवा केवल कैलाश नाड़ी तक सीमित नहीं रही। गांव के देवस्थान, सराय, तालाब घाट और श्मशान घाट की नियमित साफ-सफाई करना उनके जीवन का हिस्सा था। वे रोज झाड़ू लेकर निकलते और बिना किसी को बताए अपना काम करते। श्मशान घाट और तालाब परिसर में बरगद और पीपल के पेड़ लगाना उनके लिए विशेष महत्व रखता था। वे कहते थे कि जीवन और मृत्यु, दोनों को छाया की आवश्यकता होती है।
लगभग 55 वर्षों तक उन्होंने यह जीवन जिया निरंतर, निस्वार्थ और अनुशासित। वृद्धावस्था में भी उनकी दिनचर्या नहीं बदली। सुबह गांव की साफ-सफाई, दिन में कैलाश नाड़ी जाकर पौधों की देखभाल और शाम को गांव भ्रमण। वे हर व्यक्ति से “राम-राम” कहते, छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं रखते थे। उनके लिए गांव का हर व्यक्ति अपना था। 3 अक्टूबर 25 को वे रोज की तरह कैलाश नाड़ी गए थे। वहीं उनकी तबीयत बिगड़ी। इलाज चला और लगभग तीन महीने तक वे पैरालिसिस की अवस्था में रहे। आखिरकार 3 जनवरी 2026 की सुबह उनका देहावसान हो गया। उनका जाना पूरे गांव के लिए एक व्यक्तिगत क्षति जैसा था।
हाल ही में ढीकोला मोक्षधाम में ग्रामवासियों द्वारा उनकी स्मृति में वटवृक्ष का पौधारोपण किया गया, जिसे “कैलाश वटवृक्ष” नाम दिया गया। इस अवसर पर गांव के जिम्मेदार नागरिक नारायण माली ने कहा कि यह केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का संकल्प है। बाऊजी कैलाश चंद्र चोबे भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका प्रकृति-प्रेम, उनकी साधना और उनकी हरियाली हमेशा रास्ता दिखाती रहेगी। यही एक सच्चे पर्यावरण सेवक को सच्ची श्रद्धांजलि है।

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