हाल ही में अमेरिका ने अपनी बहुप्रतीक्षित एच-वन-बी वीज़ा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए नए आवेदनों पर एक लाख अमेरिकी डॉलर की भारी फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह निर्णय केवल आप्रवासन नीति का मामला नहीं है बल्कि बदलते वैश्विक आर्थिक समीकरणों और श्रम बाज़ार की गहरी हलचलों का प्रतीक है। भारतीय पेशेवर, जो अब तक एच-वन-बी वीज़ा धारकों का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा बनाते थे, इस कदम से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन यही संकट भारत के लिए अवसर भी ला सकता है। यदि लौटती हुई प्रतिभाओं यानी रिवर्स ब्रेन ड्रेन का सही इस्तेमाल हो तो यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
एच-वन-बी वीज़ा लंबे समय से अमेरिकी तकनीकी कंपनियों की रीढ़ रहा है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न जैसी दिग्गज कंपनियों में बड़ी संख्या में भारतीय आईटी पेशेवर कार्यरत हैं। किंतु अब अमेरिका में संरक्षणवादी रुझान और आर्थिक राष्ट्रवाद खुलकर सामने आ रहा है। विकसित देश अपने घरेलू श्रमिक वर्ग को संतुष्ट करने के दबाव में बाहरी प्रतिभाओं पर निर्भरता घटाने लगे हैं। यह एक विरोधाभासी स्थिति है क्योंकि अमेरिकी श्रम बाज़ार में उच्च तकनीकी क्षेत्रों में पर्याप्त घरेलू संसाधन नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव इसे बाहर से आने वाले लोगों पर रोक लगाने के लिए मजबूर कर रहा है।
अमेरिका आव्रजन को केवल श्रम गतिशीलता का विषय नहीं मानता बल्कि इसे व्यापारिक हथियार के रूप में भी प्रयोग कर रहा है। वीज़ा शुल्क में इस प्रकार की बढ़ोतरी से न केवल राजस्व अर्जित होगा बल्कि अन्य देशों पर राजनीतिक दबाव भी डाला जाएगा। इसी दौरान कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी आप्रवासन नीतियों को उदार बना रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि वैश्विक प्रतिभा प्रतिस्पर्धा का भूगोल बदल रहा है और अमेरिका का आकर्षण धीरे-धीरे कम हो सकता है।
इस नीति परिवर्तन का असर भारतीय प्रवासी समुदाय पर बहुआयामी है। एक ओर लाखों परिवारों में नौकरी की असुरक्षा और भविष्य की अनिश्चितता का माहौल बन गया है। बच्चों की पढ़ाई, सामाजिक जीवन और पारिवारिक स्थिरता पर इसका असर पड़ रहा है। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
वहीं दूसरी ओर भारत में इसका सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा है। बड़ी संख्या में पेशेवर भारत लौटने के लिए प्रेरित होंगे। वे केवल पूँजी ही नहीं बल्कि वैश्विक अनुभव, नेटवर्क और तकनीकी दक्षता भी लेकर आएँगे। इस प्रकार भारत के स्टार्ट-अप और यूनिकॉर्न इकोसिस्टम को नई ऊर्जा मिल सकती है। विदेशों से लौटे पेशेवरों के पास निवेशकों का दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार का अनुभव होगा, जिससे भारत का उद्यमिता वातावरण और मजबूत हो सकता है।
एक और बड़ा अवसर यह है कि लौटे हुए विशेषज्ञ भारत के अनुसंधान और विकास क्षेत्र में अहम योगदान देंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। यदि लौटे हुए वैज्ञानिक और इंजीनियर भारतीय संस्थानों से जुड़ें तो देश में नवाचार की गति तेज़ हो सकती है। इससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को वास्तविक बल मिलेगा। इसके अलावा डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलें उन प्रतिभाशाली पेशेवरों की मदद से मज़बूत होंगी जो विदेशों में आधुनिक तकनीकी अनुभव लेकर आएंगे।
भारत के लिए यह समय केवल इंतजार करने का नहीं है, बल्कि ठोस नीतिगत कदम उठाने का है। सरकार को लौटती प्रतिभाओं का स्वागत करने के लिए विशेष योजनाएँ बनानी होंगी।
उदाहरण के लिए रिटर्निंग टैलेंट स्कीम के तहत विदेशों से लौटने वाले पेशेवरों को कर में छूट, निवेश प्रोत्साहन और विशेष स्टार्ट-अप पैकेज दिए जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच सहयोग के लिए उच्चस्तरीय शोध प्रयोगशालाएँ और नवाचार केंद्र विकसित किए जा सकते हैं। निजी क्षेत्र को अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाने के लिए कर रियायत और प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इसके साथ ही वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी फंड्स को प्रवासी पेशेवरों के अनुभव से जोड़कर वित्तीय इकोसिस्टम को मज़बूत करना आवश्यक होगा।
लौटे हुए प्रवासियों और उनके परिवारों के लिए सामाजिक पुनर्वास योजनाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। यदि उन्हें भारत में बसने के दौरान कठिनाइयाँ झेलनी पड़ेंगी तो उनकी प्रतिभा का पूरा लाभ नहीं उठाया जा सकेगा।
सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं में उन्हें आसानी उपलब्ध करानी होगी ताकि वे बिना किसी झंझट के समाज और अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकें।
इस प्रकार एच-वन-बी वीज़ा विवाद भारत के सामने दोहरी चुनौती पेश करता है। एक ओर लाखों प्रवासी भारतीयों की आजीविका और भविष्य की चिंता है, तो दूसरी ओर यही संकट भारत के लिए सुनहरा अवसर भी है। यदि भारत इस अवसर का लाभ उठाकर रिवर्स ब्रेन ड्रेन को अपनी ताकत बना लेता है तो आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को नई दिशा और ऊर्जा मिलेगी। संकट हमें यह याद दिलाता है कि आत्मनिर्भरता केवल नारे से नहीं बल्कि दूरदर्शी नीतियों और वैश्विक अवसरों को साधने की क्षमता से संभव है।
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