किशोरावस्था में बच्चों का रखें विशेष ध्यान, अपने व्यवहार में लाए बदलाव

www.khaskhabar.com | Published : गुरुवार, 23 दिसम्बर 2021, 1:20 PM (IST)

गाहे-बगाहे हमें समाचार पत्रों में यह पढऩे को मिल जाता है कि फलां बच्चे या बच्ची ने आत्महत्या कर ली। इन समाचारों में कहीं भी इस बात का कोई जिक्र या चर्चा नहीं होती है कि आखिर क्योंकर के बच्चों ने ऐसा कदम उठाया। मनोचिकित्सकों का कहना है कि किशोरावस्था ऐसी होती है जब बच्चों में न सिर्फ शारीरिक बदलाव आता है अपितु उनका मानसिक विकास भी तेजी से होने लगता है जिसके चलते उनके मन मस्तिष्क में कई तरह के सवाल जवाब चलते हैं। ऐसे हालातों में अक्सर बच्चों का व्यवहार न सिर्फ अपने घरवालों से अपितु अपने समस्त परिचितों से बदल जाता है। इस तरह के हालातों में माता-पिता को बच्चे के मन की बातें जानने के लिए धैर्य के साथ जतन करने चाहिए। बच्चों की चुप्पी माता-पिता को सोचने पर मजबूर कर देती है।
आज खास खबर डॉट कॉम आपके लिए कुछ ऐसी बातें लेकर आया है, जिनकी मदद से हो सकता है आपको अपने किशोरावस्था में चल रहे बच्चों को समझने में मदद मिले। आइए डालते हैं एक नजर उन पर—

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बच्चे को डांटें-फटकारें नहीं, दूसरों से तुलना न करें
छोटा बच्चा माता-पिता से हर बात शेयर करता है, लेकिन अक्सर हम माता-पिता उसे झिडक़कर या डांटकर चुप करा देते हैं। नतीजतन बच्चा हमसे बातें छुपाने लगता है। धीरे-धीरे वह दूरी बनाना शुरू कर देता है। कई बार यह देखा जाता है कि हम अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करने लगते हैं, जो सही नहीं है। हर बच्चे की क्षमता और सामथ्र्य अलग-अलग होती है। माता-पिता को ध्यान रखना चाहिए कि ज्यादा तारीफ और ज्यादा आलोचना दोनों ही बच्चे के लिए ठीक नहीं हैं। माता-पिता का यह कत्र्तव्य है कि उनमें जितनी योग्यता और क्षमता है, उसे निखारने में उनकी मदद करें। उन्हें एहसास कराएं कि वे हर पल उनके साथ हैं।
असीमित उम्मीदें, अधूरी इच्छाओं को पूरा करने का जरिया
जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, माता-पिता की उम्मीदें भी बढऩे लगती हैं। ऐसे में अक्सर वे अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों के जरिये पूरा करना चाहते हैं। बच्चे जब उन उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो वे अपने और माता-पिता के बीच दूरी बनाने लगते हैं। यहीं से शुरू होता है संवादहीनता का सिलसिला। अगर आपका बच्चा भी चुप रहने लगे, तो आप उससे कोई उम्मीद न करें, बल्कि उस दूरी को कम करने की कोशिश करें।

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पर्सनल स्पेस
बच्चों को जितनी अपने माता-पिता की जरूरत होती है, उतनी ही उन्हें अपनी भी जरूरत होती है। उन्हें इतनी आजादी जरूर दें कि वे अपने छोटे-छोटे फैसले ख़ुद कर सकें। इससे उनमें आत्मविश्वास आएगा। उनका मार्गदर्शन करें, पर अपने फैसले उन पर न थोपें। बच्चों पर जितनी बंदिशें लगाएंगे, वे उतने ही अपनी बातें शेयर करने से कतराएँगे। उन्हें ऐसा महसूस होने लगता है कि वे उन्हें समझेंगे नहीं, तो वे चुप्पी को अपना विरोध जताने का हथियार बना लेते हैं।

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बच्चे में सामाजिकता का भाव पैदा करें
सिंगल चाइल्ड के बढ़ते कॉन्सेप्ट और कार्यरत माता-पिता होने के कारण बच्चा मेड के भरोसे पलता है या फिर अकेले। ऐसे में उसका दायरा बहुत सीमित हो जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से माता-पिता उसे घर से अकेले बाहर नहीं जाने देते हैं। नतीजा यह होता है कि वह बच्चा समाज से कट जाता है, उसमें सामाजिकता का अभाव पैदा हो जाता है। वह दूसरे बच्चों के साथ घुलना-मिलना नहीं जानता। अपनी बातें मन में दबाए रखता है, क्योंकि उसके माता-पिता कामरत हैं इसलिए उनके पास उसकी बातें सुनने का समय नहीं होता। ऐसे हालातों में आपको चाहिए कि आप अपने बच्चे को अपने पास-पड़ोस में घुलने मिलने दें, दूसरे बच्चों के साथ व्यवहार बढ़ाने दें, ताकि वह अपना अकेलापन कम कर सके और अपने दिल की बातें दूसरों के साथ-साथ आपको भी बता सके। जिससे आप उसकी मनस्थिति को जानकर उसके साथ बर्ताव कर सकें। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, तो हो सकता है उसमें बदलाव आए, पर ऐसा तभी संभव है जब वह सोशल हो और बाहरी दुनिया के साथ तालमेल बिठा सके। उसकी चुप्पी का लावा जब फूटता है, तो उसका नतीजा बहुत खतरनाक हो सकता है। बेहतर होगा कि बच्चे को उसके हमउम्र बच्चों के साथ समय बिताने दें।

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बाल शोषण का शिकार तो नहीं
बच्चा अगर अचानक चुप रहने लगे, तो माता-पिता यह जानने की कोशिश करें कि कहीं वह चाइल्ड एब्यूज (बाल शोषण) का शिकार तो नहीं है। इस बारे में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि चाइल्ड एब्यूज का हल ढूंढऩे की राह माता-पिता से शुरू होती है और वहीं खत्म भी। अगर बच्चा माता-पिता को अपने साथ हुई किसी घटना के बारे में बताना चाहता है, तो उसे डांटने-फटकारने की जगह उसकी बात सुनें। अपने स्तर पर छानबीन करने की कोशिश करें। माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि बाल शोषण बड़ी समस्या है और इसका शिकार कोई भी बच्चा हो सकता है।

नोट—यह खास खबर डॉट कॉम के अपने विचार हैं। हो सकता है आप इन विचारों से सहमत न हों। यदि आपके बच्चे में आपको इस तरह का व्यवहार देखने को मिलता है तो प्रयास करके किसी मनोचिकित्सक से परामर्श जरूर करें।

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