सरकार-3: कहानी पस्त, धारदार अमिताभ, दमदार स्टारकास्ट

www.khaskhabar.com | Published : शुक्रवार, 12 मई 2017, 10:11 AM (IST)

फिल्म समीक्षा-
आठ साल के अंतराल के बाद अपनी सफल सीरीज ‘सरकार’ का तीसरा भाग लेकर हाजिर हुए निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने अमिताभ बच्चन के किरदार को जो पैनी धार दी, वह तारीफ के काबिल है। कथानक के अनुरूप उन्होंने नए अदाकारों की जो भीड जुटाई वह भी दमदार है लेकिन फिल्म की कहानी ‘पस्त’ है। कमजोर कहानी के चलते बेहतरीन अदाकारों से सजी यह फिल्म दर्शकों को अपने साथ जोडने में सफल नहीं हो पाती है। तकनीकी पहलुओं से फिल्म सशक्त है। रामगोपाल वर्मा ने फिल्म का कथानक पिछली फिल्मों की तरह रखा होता तो निश्चित रूप से यह फिल्म अविस्मरणीय फिल्मों में शुमार होती। उन्होंने इस बार सुभाष नागरे को एक कमजोर इंसान के रूप में पेश है और यही उनकी असफलता की सबसे बडी वजह है। एक समय था कि सरकार के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी वहीं अब उसी सरकार को उसके घर में लोग धमकी देकर चले जाते हैं। इसके साथ ही कथानक में भी कुछ नयापन नहीं है।

यह फिल्म भी ‘सरकार’ और ‘सरकार राज’ की तरह एक राजनीतिक ड्रामा है, जिसमें गरीब लोगों का एक मसीहा पूरे सिस्टम से अकेला टक्कर ले रहा है। जहां पहले की दो फिल्मों में उसके साथ उसके बेटे थे, वहीं इस बार उसके साथ उसका पोता है। रामगोपाल वर्मा ने अमित साध को शिवाजी नागरे के रूप में कथानक में जोडा हैै, जो कि सरकार के बडे बेटे विष्णु का बेटा है। फिल्म की शुरूआत उसी तरह से होती है जैसी कि सरकार सीरीज की पिछली दो फिल्मों में हुई थी। एक बिजनेसमैन अपने एक प्रोजेक्ट के लिए सरकार के पास आता है और उनके सामने अपने काम करने के बदले एक बडी रकम की पेशकश करता है।

सरकार जानते हैं कि इससे गरीबों को नुकसान होगा और वो काम करने से इंकार कर देते हैं। साथ ही यह भी कह देते हैं कि न तो यह काम वो करेंगे और न ही वो किसी को यह करने देंगे। इसके बाद शुरू होता है सत्ता का वो खूनी खेल जिसमें आप यह समझ नहीं पायेंगे कि किस पर भरोसा करें और किस पर नहीं ?

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निर्देशक के तौर पर भी रामगोपाल वर्मा खरे नहीं उतरते हैं। रामगोपाल वर्मा हिन्दी सिनेमा के वो निर्देशक रहे हैं, जिन्होंने इस इंडस्ट्री को एक नया स्वरूप देने में बहुत बडा योगदान दिया है। हालांकि पिछले कुछ समय से वो अपना शुरुआती दौर वाला करिश्मा नहीं दिखा पा रहे हैं, जिसके लिए वो कभी लोगों के बीच मशहूर हुआ करते थे। इस बार भी कुछ वैसा ही हुआ है। इस फिल्म को देखते हुए रामगोपाल वर्मा की कमी स्पष्ट तौर पर नजर आती है। हालांकि रामगोपाल वर्मा ने फिल्म की तकनीकी बातों का खासा ख्याल रखा है, उन्होंने दृश्यों के फिल्मांकन के वक्त उन्हें नए तरीके से लिया है, कैमरा एंगल्स के साथ खेलना, फोकस और डी-फोकस से अपने किरदारों को धार देना लेकिन इन सारी चीजों में फिल्म की कहानी कहीं पीछे छूट गई। फिल्म का पूर्वाद्र्ध जितना सशक्त है, उत्तराद्र्ध उतना ही नीरस। मध्यान्तर के बाद फिल्म वर्मा फिल्म को समेटते हुए नजर आए हैं, जिसके चलते कथानक का क्रम बिगड गया है। साथ ही इस भाग में संपादन की जल्दबाजी स्पष्ट नजर आती है। दृश्यों को कम करने के चक्कर में वे कथानक से मेल नहीं खा पाते हैं। साथ ही उनका तारतम्य भी आपस में नहीं बैठता है।

फिल्म की कहानी को ज्यादा धार देने के लिए डायरेक्टर रामगोपाल वर्मा ने अमिताभ बच्चन के अलावा इंडस्ट्री के काफी बडे-बडे कलाकारों को फिल्म में लिया है लेकिन वो उनको सही तरह से उपयोग नहीं कर पाये हैं। यहां तक कि मनोज बाजपेयी, जैकी श्रॉफ और यामी गौतम से पूरी तरह से निराशा होती है। अभिनय में भी सिर्फ और सिर्फ अमिताभ बच्चन हैं जो पूरी फिल्म में छाये रहते हैं शेष सितारों में कोई भी ऐसा नहीं है जिसने अपने अभिनय से प्रभावित किया हो। सरकार के किरदार के अलावा रामगोपाल वर्मा ने जिस किरदार को सबसे ज्यादा स्क्रीन स्पेस दिया है वो शिवाजी नागरे यानि कि अमित साध है, लेकिन वो अपने किरदार में फिट नहीं हैं। जिस तरह का उनका किरदार लिखा गया है उसके अनुरूप उनकी बॉडी लैंग्वेज, संवाद अदायगी और अभिनय सब कुछ फीका है। दूसरे शब्दों में आप इसे उनकी ओवर एक्टिंग कह सकते हैं। इस किरदार को जितना अंडरप्ले किया जाना चाहिए था वर्मा ने उनसे उतना ही लाउड प्ले करवाया है, जिसके चलते किरदार का महत्त्व खत्म हो जाता है। उनके द्वारा बोले गए संवाद ऐसे लगते हैं जैसे जबरदस्ती बुलवाये जा रहे हैं। इन दो किरदारों के अलावा फिल्म में रॉनित रॉय, मनोज बाजपेयी, जैकी श्रॉफ, यामी गौतम, रोहिणी भी हैं। इनमें थोडा बहुत रोनित रॉय प्रभावित करते हैं। यामी गौतम ने अपनी पिछली फिल्म काबिल में प्रभावित किया था लेकिन यहां उनके चेहरे के भावों को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे गंभीरता जबरदस्ती ओढा दी गई है।

गीत संगीत की दृष्टि से भी फिल्म प्रभावी है। पाश्र्व में बजता गोविन्दा-गोविन्दा अपनी एक पहचान बना चुका है। फिल्म में यूं तो 7 गीत हैं लेकिन सिर्फ गणपति पूजा वाला गीत ध्यानाकर्षित करता है, क्योंकि बाकी 6 गीत फिल्म के बैकग्राउंड में यूज किए गए हैं। रवि शंकर द्वारा बनाये गए इन गानों से फिल्म के दृश्यों को काफी मजबूती मिली है। इसके अलावा फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक काफी कमाल का है। हालांकि कई लोगों को वो काफी लाउड लग सकता है। छायांकन के तौर पर फिल्म बेहतरीन है। छायाकार अमोल राठौड ने कैमरे का जबरदस्त इस्तेमाल किया है। अमोल ने फोकस और डी-फोकस का भी बहुत ही अच्छी तरह से उपयोग किया है। दृश्यों के फिल्मांकन के वक्त वर्मा ने किरदार की बारीकी का विशेष रूप से ध्यान रखा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस फिल्म को अमिताभ बच्चन के प्रशंसक जरूर पसंद करेंगे क्योंकि लंबे समय बाद अमिताभ एंग्री मैन के रूप में परदे पर वापस आए हैं। गुस्से की तीव्र अभिव्यक्ति को उन्होंने उम्र के अनुरूप चेहरे पर दर्शाया है। अमिताभ बच्चन के चलते इस फिल्म को एक बार जरूर देखा जा सकता है।