यूपी चुनाव: सत्ता के लिए सब चलेगा, भले दागी ही क्यों न हों?

www.khaskhabar.com | Published : बुधवार, 15 फ़रवरी 2017, 1:21 PM (IST)

अभिषेक मिश्रा, लखनऊ। ये सियासत का स्याह चेहरा है जो राजनैतिक दलों को उनके आदर्शों और विचारों से दूर करता है। भले ही कोई कितनी भी दुहाई दें, लेकिन इस सच्चाई से नहीं भाग सकते हैं कि सत्ता के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। भले दावे करें कि वह अपराधियों और दागियों से दूर हैं।
चुनावी राजनीति में अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की बढ़ती दखलन्दाजी भले ही आमजन के लिए चिंता का सबब हो पर पार्टियों का मानना है कि जिताऊ है तो सब चलेगा। मजे की बात तो यह हैं कि पुलिस और अदालत के दस्तावेजों में यह दबंग भले ही अपराधी पृष्ठभूमि के हो पर इलाके में इनकी छवि ‘‘रॉबिन हुड’ सी है।

पहले 17 वीं विधानसभा के चुनाव को अलग नजरिये देखा जा रहा था, लोगों की जागरूकता के चलते उम्मीद की जा रही थी कि पार्टियां अपराधी छवि के लोगों को उम्मीदवार बनाने से परहेज करेंगी लेकिन जब मैदान में चेहरे दिखे तो राजीतिक दलों की कथनी करनी में भेद साफ दिखा। वर्ष 2007 के चुनाव में बसपा ने सपा के खिलाफ ‘‘चढ़ गुंडों की छाती पर मोहर लगाओं हाथी पर’ का नारा भी दिया था। 2017 के चुनाव में जब सपा-कांग्रेस गठबंधन हुआ तो बसपा को दलित-मुस्लिम गठजोड़ बिखरता नजर आया तो मायावती ने पूर्वान्चल के बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का अपनी पार्टी में विलय करा लिया।


यह दोस्ती जब ज्यादा सुर्खियों में आयी तो बसपा की तरफ से यह तर्क दिया गया कि अंसारी परिवार को जानबूझ कर फंसाया गया है। यूपी इलेक्शन वाच की पड़ताल को सही माना जाए तो पहले और दूसरे चरण में माननीय बनने की लड़ाई लड़ रहे 227 प्रत्याशी ऐसे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें सपा के 51 , बसपा के 67, भाजपा के 36, कांग्रेस के 22, रालोद के 16 प्रत्याशी गंभीर अपराधिक मामलों में फंसे हैं। पहले और दूसरे चरण में पांच उम्मीदवार महिला अत्याचार, सात अपहरण, छह हत्या और 15 के खिलाफ हत्या के प्रयास के संगीन अपराधों के मामले चल रहे हैं।

मुरादाबाद की कुंदरकी सीट से कमल चुनाव निशान पर लड़ रहे रामवीर सिंह, बिजनौर की चांदपुर से हाथ का चुनाव निशान पर वोट की जंग लड़ रहे शाहबाज खां, हाथरस से साइकिल चुनाव निशान पर भाग्य आजमा रहे देवेन्द्र अग्रवाल और खुर्जा से रालोद के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे मनोज गौतम हत्या के मामलों में फंसे हैं। मुज्जफरनगर दंगों के सिलसिले में रासुका में निरुद्ध रहे संगीत सोम सरधना सीट से कमल निशान पर फिर से मैदान में हैं जबकि उनके खिलाफ सपा के टिकट से चुनाव लड़ रहे अतुल प्रधान के खिलाफ भी कई गंभीर अपराधी मामले चल रहे हैं। फैजाबाद की बीकापुर सीट से हाथी चुनाव निशान पर जोर आजमाइश कर रहे पूर्व विधायक जितेन्द्र सिंह उर्फ बब्लू सिंह की दबंगई तब और सुर्खियों में आयी जब उन पर डा. रीता बहुगुणा जोशी के मकान में आग लगाने का मुकदमा कायम हुआ। यह मामला राजधानी के समाचार पत्रों में सुर्खियों में छपा और इसकी गूंज विधानसभा में भी सुनाई दी। अपहरण, जानलेवा हमले जैसे संगीन मुकदमों का सामना कर रहे इस बाहुबली को बसपा ने फिर अपना उम्मीदवार बनाया है।[# अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे]

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कांटे से कांटा निकालने के फामरूले के तहत बब्लू सिंह के खिलाफ सपा ने जिन आनंदसेन को अपना प्रत्याशी घोषित किया है वह बहुचर्चित शशि हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं। आनंदसेन के विरुद्ध हत्या, अपहरण और धोखाधड़ी के संगीन मामले भी अदालत में चल रहे हैं। इसी जिले की गोसाईगंज सीट से साइकिल निशान पर चुनाव लड़ रहे अभय सिंह के विरुद्ध आठ मामले चल रहे हैं।

भाजपा और अपना दल ने अभय सिंह के खिलाफ खब्बू तिवारी को साझा प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा है। खब्बू तिवारी जिले का चर्चित नाम है जिनके खिलाफ हत्या , हत्या का प्रयास समेत 8 मामले अदालत में चल रहे हैं।

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