समीक्षा: वर्ष की सबसे बेहतरीन फिल्म रही ‘दंगल’, जरूर देखें

www.khaskhabar.com | Published : शुक्रवार, 23 दिसम्बर 2016, 12:58 PM (IST)

आखिरकार आमिर खान की दंगल प्रदर्शित हो गई। इस फिल्म की तारीफ के लिए शब्दों का अकाल से पड गया है। पूरे वर्ष चर्चाओं में रही यह फिल्म अपने दृश्यों, संवादों और कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय के चलते आलोचना का कोई मौका नहीं देती है। कमियां इस फिल्म में भी हैं, लेकिन ना के बराबर। हर खेल फिल्म में वही पहलू होते हैं जो पहले भी कई बार देख चुके होते हैं, यहां भी हैं पर उन्हीं पहलुओं को नए नजरिए और वास्तविकता के साथ दर्शाया गया है। ‘दंगल’ पहलवानी पर आधारित फिल्म है। सलमान खान की ‘सुल्तान’ भी पहलवानी पर आधारित थी। इसी को देखते हुए ‘सुल्तान’ और ‘दंगल’ में समानताएं नजर आ रही थीं। लेकिन ‘दंगल’ देखने के बाद यह बात साफ हो जाती है कि, दोनों फिल्मों में जमीन आसमान का फर्क है।

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निर्देशक नितीश तिवारी ने ‘दंगल’ का निर्देशन किया है। किसी आम फिल्म के मुताबिक खेल पर आधारित फिल्म को निर्देशित करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। खासकर अगर बायोपिक हो तो फिर जिम्मेदारी और ज्यादा बढ जाती है। नितीश तिवारी ने ‘दंगल’ का निर्देशन करते हुए अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है। फिल्म में कई दृश्य हैं जहां ना बैकग्राउंड संगीत का सहारा लिया गया है ना ही किसी और प्रभाव का, इसके बावजूद दृश्य प्रभावशाली हैं जो दर्शकों पर अपनी छाप छोडते हैं। उदाहरण के तौर पर कुश्तियों के दृश्य जहाँ सिर्फ दर्शकों की आवाज का प्रयोग किया गया है। गीता और बबिता के कुश्ती वाले दृश्यों को नितेश तिवारी ने लाजवाब तरीके से फिल्माया है। ये दृश्य सुल्तान में अनुष्का पर फिल्माये गए दृश्यों की तरह काल्पनिक नहीं लगते हैं। इन दृश्यों में वास्तविकता का अहसास होता है।

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अभिनय के लिए आमिर खान की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। एक पहलवान, एक सख्त बाप और एक मजबूर पिता, हर भावना का फर्क आमिर के अभिनय में साफ झलकता है। सबसे बडी बात आमिर ने एक बार फिर साबित किया कि वो एक ऐसे अभिनेता हैं जो फिल्म की बेहतरी के लिए काम करता है ना कि सिर्फ अपने किरदार के लिए। इस फिल्म में भी उन्होंने अपने किरदार की लंबाई की परवाह किए बगैर फिल्म की कहानी और पटकथा के मुताबिक बाकी कलाकारों को भी खुलकर मौका दिया है। यह एक ऐसा कदम है जो फिल्म उद्योग में बहुत कम देखने को मिलता है। फिल्म में गीता के किरदार में फातिमा आश्वस्त भी हैं और एक मंझे हुए कलाकार की तरह पर्दे पर उभर कर आती हैं। सबसे बडी बात यहां आमिर हों, फातिमा हों या फिर सान्या मल्होत्रा, इनकी कुश्ती देखकर ही लगता है कि इन्होंने अपने-अपने किरदारों पर जबरदस्त मेहनत की है। आमिर खान की पत्नी दया कौर की भूमिका में साक्षी तंवर फिट हैं। गीता और बबिता के बचपन के किरदार में जरीना वसीम और सुहानी भटनागर ने उम्दा काम किया है। नए चेहरे होने के बावजूद ऐसा लगता नहीं कि हम किसी नए चेहरे को देख रहे हैं। राजकुमार राव ने भी अच्छी अदाकारी की है। इनके अलावा फिल्म का हर किरदार अपनी भूमिका के साथ न्याय करता नजर आता है।

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फिल्म के गीतों को अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखा और प्रीतम ने संगीत दिया है। प्रीतम के संगीत से हरियाणा की मिट्टी की खुशबू आती है। ‘बापू हानिकारक’, ‘धाकड़ है धाकड़’ है, ‘गिलहरियाँ’, और शीर्षक गीत ‘दंगल दंगल’ ऐसे गीत हैं जिन्हें बार-बार सुनने को मन करता है। कैमरामैन सेतू श्रीराम ने पूरी फिल्म को अपने कैमरे में शिद्दत के साथ उतारा है। बेहद खूबसूरत फिल्मांकन है, जो सीधे दिल में उतरता है।

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शुरूआत में फिल्म की धीमी गति दर्शकों को बेचैनी भरती है वहीं दूसरी ओर फिल्म में आमिर का यंग लुक ना के बराबर नजर आता है। लेकिन यह कहानी की जरूरत है। अब तक खेल पर आधारित बनी फिल्मों में थोडा बहुत रोमांस था लेकिन ‘दंगल’ में रोमांस की कमी नजर आती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘दंगल’ वर्ष 2016 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है, जिसे आप अपने पूरे परिवार के साथ बार-बार देखना चाहेंगे। इस फिल्म की सफलता तो निश्चित है लेकिन महिला सशक्तिकरण और बेटी बचाओ बेटी पढाओं का संदेश देने वाली यह फिल्म क्या सात दिन बाद भी दर्शकों को अपने साथ जोडने में सफल रहेगी यह एक विचारणीय प्रश्न है।

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