ठंड से बचने के लिए बच्चों को ऐक्रेलिक कपड़े पहनाने से बचाए

www.khaskhabar.com | Published : सोमवार, 07 नवम्बर 2016, 12:13 PM (IST)

कानपुर। सुबह और शाम को अब मौसम हल्का ठंडा होने लगा हैए ठण्ड जल्द ही तेजी भी पकड़ने लगी है और याद दिलाने लगी है कि गरम कपड़े निकालने के दिन आ गये है। परिवार में अगर बूढ़े बच्चे है तो परिजन आलस न करें। उनके कपड़े निकाल ले।
यह कहना है बाल रोग विशेषज्ञ डॉ निखिल गुप्ता का। उन्होंने बताया कि शरीर की आंतरिक बॉयोकेमिकल क्रियाओं को ठीक तरह चलाने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती है।

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तापमान के कम होने से शरीर की आंतरिक क्रियाओं में दिक्कत होने लगती है और शरीर अस्वस्थ्य होने लगता है। इसके साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्रियाएं भी शिथिल होने लगती हैं। कहा कि वर्तमान समय में सर्दी की शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में सर्दी से बचने के लिए माताएं कमरे को बन्द रखे तथा साथ ही गर्म रखने के लिए हीटर या ब्लोअर का उपयोग करे।
बच्चों व बुजुर्गों के घर में कोयला या कंडा जलाना घातक है, इसके जलने से निकलने वाली कार्बन मोनोक्साईड की वजह से दम घुटने की दिक्कत हो सकती है।


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वहीं बच्चों के कपड़ां का चुनाव में माताओं को अत्यधिक सावधानी से करना चाहिए। जाड़ा शुरू होते ही बाजार रंग-बिरंगे और आकर्षक कपड़ों से भर जाता है। लेकिन यह ऊनी दिखने वाले कपड़े ऐक्रेलिक के होते है गर्म नहीं। प्योर वूल या रूई से भरे कपड़े बच्चों को पहनाएं। बच्चों को सिर और कान ढका होना बहुत ही आवश्यक है। उन्होंने बताया कि ठंड बच्चों के सिर और कान के जरिए शरीर के भीतर प्रवेश कर जाती है। जिससे निमोनिया, सर्दी, खांसी, जुकाम जैसे बीमारियां बच्चों को अपने चपेट में लेती है।


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निमोनिया का बढ़ता है खतरा
ठंडी हवा से बचाने के चक्कर में हम बच्चां को ज्यादा बीमार कर लेते हैं। सबसे ज्यादा वह बच्चे बीमारी के चपेट में आते है जिन्हे माताएं डायपर पहनाती है। माताएं इस भ्रम में की बच्चों को ठण्ड लग जाएगी। इसके चलते वह बच्चां के डायपर नहीं बदलती है। अधिक देर तक मल-मूत्र में लिपटे बच्चें को इन्फेक्शन का शिकार हो जाते है। जाड़े के मौसम में बच्चों को सर्दी खांसी और निमोनिया होने का ख़तरा बढ़ जाता है।





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