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संपदाओं के दोहन के खिलाफ फिर उठी अफ्रीका में आवाज, बुरकिना फासो के युवा राष्ट्रपति कैप्टन इब्राहिम बदलाव का चेहरा बन उभरे

Voices were raised again in Africa against the exploitation of resources; Burkina Faso young president Captain Ibrahim emerged as the face of change - News in Hindi

मेरी उम्र की पीढ़ी ये समझ नहीं पा रही है कि तमाम तरह की बहुमल्य संपदाओं से भरपूर अफ्रीका महाद्वीप आखिरकार इतना गरीब क्यों है? इतना सब कुछ पास होते हुए भी आखिर अफ्रीका के नेताओं को भीख मांगने के लिए दुनियां के दूसरे देशों के सामने हाथ क्यों फैलाने पड़ रहे हैं? साल पहले फ्रांस से आजादी प्राप्त चुके छोटे से देश बुरकिना फासो के राष्ट्रपति कैप्टन ईब्राहिम टराओरे (आयु 36 वर्ष) ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित रशिया-अफ्रीका समम्मेलन में करीब साल भर पहले ये बात अपने भाषण में कही थी। तब किसी को अंदाजा नहीं था कि सेना द्वारा तखतापलट के माध्यम से बुरकिना फासो देश की बागडोर संभाल चुका ये नौजवान जल्द ही अफ्रीका महाद्वीप में बदलाव का एक चेहरा बन कर उभरने वाला है।

उपनिवेश या कहें कि कालोनियन ईरा बीत जाने के बाद अफ्रीका एक बार फिर इसे ढोने की जारी परंपरा को तोडऩे के लिए लामबद्व होने की कोशिश में दिखाई दे रहा हैं। इस कड़ी में माली, नाईजर और बुरकिना फासो तीन देश पहले ही एक मंच पर आ चुके हैं। तीनों देशोंं ने आपसी तालमेल के लिए सालेह मंच बनाने की घोषणा कर दी है। खास बात ये है कि यूरेनियम के बड़े उत्पादक देश नाईजर ने अमेरिकी सैनिकों को देश छोडऩे के लिए कह दिया है। इस घोषणा के साथ ही रूस के सैनिकों का दस्ता नाईजर पहुंच चुका है। अमेरिका ने भी जल्द ही नाईजर से अपने सैनिकों को वापिस बुलाने की बात कही है।
उधर, उसके पड़ौसी देश बुरकिना फासो ने भी अपने देश में मौजूद फ्रांस के सैनिकों को देश से बाहर कर दिया है। ये मामूली घटना नहीं थी, क्योंकि ये सैनिक बीते 63 साल से बुरकिना में मौजूद थे। स्थानीय मीडिया में कहा जा रहा है कि कैप्टन ईब्राहिम टराओरे की मदद रूस कर रहा है। रूस से लौटने के बाद जहां उनके तेवर सख्त हुए हैं वहीं उन्होंने कई अहम निर्णय भी लिए हैं।
बीते दिनों कैप्टन ईब्राहिम ने अपने मंत्रियों, राजनेताओं के वेतन में 30 प्रतिशत की कटौती कर आम वर्कर के वेतन में 50 प्रतिशत की वृद्वि तुरंत करने का ऐलान कर दिया। साथ ही खुद किसी भी तरह का वेतन न लेने की बात कही। इस निर्णय की आमजन ने खुले दिल से प्रशंसा की है। वो न केवल देश में गरीबों के हमदर्द बन कर उभरे बल्कि अफ्रीकी देशों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। नाईजीरिया, केन्या, तंजानिया सहित अनेकों अफ्रीकी देशों के आम लोगों ने ही नहीं बल्कि बड़े राजनीतिज्ञों ने उनकी प्रशंसा की और सोशल मीडिया पर वो कई दिन से चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। इसी बीच बुरकिना फासो में तखतापलट की एक कोशिश भी हुई जोकि विफल रही।
स्थानीय मीडिया में कहा गया है कि रूस की खुफिया एजेंसियों की मदद से कैप्टन ईब्राहिम टराओरे का बचाव संभव हुआ है। यहां ये भी काबिले जिक्र है कि कैप्टन ईब्राहिम टराओरे को मार्कसिसट विचारधारा का पक्षधर कहा जाता है। कैप्टन ईब्राहिम ने कच्चे माल की प्रोसेसिंग देश में ही होगी ये निर्णय लागू कर दिया है। इसमें सोना और अन्य बहुुमल्य खनिज शामिल हैं। अब देश से प्योर सोना और खनिज ही देश से बाहर जा सकेंगे।
उधर नाईजीरिया ने भी कह दिया है कि सभी प्रकार के मिनरल्स की प्रोसेसिंग अब देश से बाहर नहीं होगी। विदेशी कंपनियों को अपनी यूनिट लोकल स्तर पर लगानी होंगी। फ्रांस के जहां बुरकिना फासो से पांव उखड़ रहे हैं वहीं अमेरिका को नाईजर छोडऩा पड़ रहा है। सामरिक उदेश्यों के लिए अमेरिका को अफ्रीका में अपनी मौजूदगी बनाए रखना जरूरी है ताकि उसके हित सधते रहें। नाईजर के रूख के बाद अमेरिका ने केन्या की तरफ हाथ बढ़ाया है।
सीएनएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के अफ्रीका में बढ़ते वर्चस्व से निपटने के लिए अमेरिका हर स्तर पर कोशिश जारी रखे है। विलियम रूटो जोकि केन्या के राष्ट्रपति हैं को बीते दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन की तरफ से व्हाईट हाउस के साउथ लॉन में राजकीय भोज में आमंत्रित किया गया। उन्हें रेड कारपेट सम्मान दिया गया। हालांकि सात माह पहले केन्या राष्ट्रपति चीन के दौरे पर जब गए थे उन्हें वहां भी सी तरह सम्मान दिया गया था।
चीन अफ्रीका में जो मॉडल अपनाए हुए है उसमें लंबी अवधि के कम बयाज पर कर्ज दिये जाने की उसकी नीति ब्रहमअस्त्र है। इसके बदल में चीन अफ्रीकी देश से उसके संसाधनों में अपनी मनमर्जी के अनुसार हिस्सेदारी लेता है। उधर, फ्रांस जोकि अफ्रीका के 14 देशों पर अतीत में राज कर चुका है, लेकिन आज भी इन देशों से फ्रांस कालोनियल टैक्स वसूलता है। मेल एंड गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस की कालोनी रहे इन देशों से आमदनी का 85 प्रतिशत फ्रांस के फ्रंच सेंट्रल बैंक में जमा होता है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें से ये देश 20 प्रतिशत राशि वापिस ले सकते हैं। इससे ज्यादा की जरूरत पर इन्हें अपनी ही राशि को कर्ज के तौर पर फ्रांस देता है। इसके लिए ना कहने का अधिकार भी फ्रांस के पास है। फ्रांस ये राशि अपने शासन के दौरान इन अफ्रीकी देशों में बनाई गई बिल्डिंग और अन्य आधारभूत ढांचे के खर्च के तौर पर सालाना वसूलता आ रहा है। फ्रांस की इसी नीति का विरोध बुरकिनो फासो के राष्ट्रपति कैप्टन ईब्राहिम ने करते हुए फ्रांस से उपनिवेश वाले सभी तरह के संबंध तोड़ लिए है और देश को स्वावलंबी बनाने की घोषणा की है।
बहरहाल बुरकिना फासो चर्चा में है, लेकिन नाईजर, माली के बाद अन्य अफ्रीकी देशों का झुकाव अब पश्चमी देशों और अमेरिका से हट कर चीन और रूस की तरफ होने लगा है। अफ्रीका में एक बार फिर चीन रूस का सामना करने को अमेरिका और पश्चिम देश विवश हैं। अफ्रीकी देशों में तख्तापलट के पीछे हमेशा उन देशों पर आरोप लगते रहे हैं जिनके हितों पर आंच पहुंचती हो। इस नई कूटनीतिक जंग का चेहरा बन कर उभरे कैप्टन ईब्राहिम बुरकिनो फासो के राष्ट्रपति कितने दिन बने रहेंगे ये बड़ा सवाल है। फिलहाल उन्होंने पांच वर्ष के लिए अपना कार्यकाल घोषित कर दिया है और कहा है देश में आतंकवाद समाप्त होने के बाद ही चुनाव संभव होंगे।

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