• Aapki Saheli
  • Astro Sathi
  • Business Khaskhabar
  • ifairer
  • iautoindia
1 of 3

उप्र चुनाव: फागुनी रंग में रंगी यूपी की सियासत, यहां सपने बेचे जाते हैं...

लखनऊ। उप्र की चुनावी फिजा में राजनीति फगुना गई है। राजनेता से लेकर वोटर और सपोर्टर सब बसंती रंग में रंग गए हैं। सियासी पारा अपने चरम पर पहुंचने लगा है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति धमाल मचा रही है। लेकिन बेचारा मतदाता मौन है। अभी परिणाम आए नहीं कि सरकार बनाने की कवायदें शुरू हो गई हैं। कौन सत्ता संभालेगा और कौन प्रतिपक्ष में जाएगा, यह बात भी सामने आ गई है।
हालांकि यह जमीनी हकीकत नहीं है, क्योंकि अभी कई चरण का मतदान बाकी है। लिहाजा, हर दल दूसरे के वोटबैंक में सेंध लगाने को तत्पर दिखता है, यही वजह है कि इस तरह के बयान सामने आ रहे हैं।


प्रेमी युगलों के लिए खास वेलेंटाइन डे बीत गया। लेकिन फिजा में उसकी गंध अब परवान चढ़ रही है। उप्र की राजनीति के लिए भी यह किसी उत्सव से कम नहीं है। यह राजनीति, दलों और राजनेताओं के लिए भी उतना प्रिय विषय है, जितना की युगल जोड़ों के लिए।

राज्य में पहले चरण का मतदान खत्म हो चला है। दूसरे चरण की वोटिंग भी खत्म हो चली है। राजनेता हो या समर्थक, सबका अपना वेलेंटाइन है। किसी को जाति से लव है तो किसी को धर्म से। चुनावी झोली से राम बाहर आ गए हैं और लव, जेहाद बन गया है।

अयोध्या में मंदिर निर्माण की दिल से बात हो रही है। दूसरी तरफ रहमान को कब्जाने के लिए फतवे जारी किए गए। कभी कांग्रेस युवराज को खाट पसंद थी और उप्र 27 साल बेहाल दिखता था। लेकिन आज स्थिति बदल गई है। उप्र को अब यह साथ पसंद है, दोनों की जोड़ी नंबर वन है।

सियासत की झोली से चुनावी मौसम में एक के बाद एक बासंतिक जुमले निकल रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को इस कड़ाकी सर्दी में कोयले की कालिख, टूजी, स्पेक्ट्रम सब याद आते हैं और दिल्ली में रेनकोट और बाथरूम की याद आती है। साथ में कैराना, मुजफ्फरनगर सब का रंग बरस रहा है।


किसी को फटे कुर्ते से लगाव है तो दूसरे का सूट निशाना है। मतदताओं के ध्रुवीकरण के लिए कोई सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी पर भिड़ा है। दूसरी तरफ उप्र अपने मुख्यमंत्री की भूमिगत रेल, एक्सप्रेसवे और डायल-100 से दिल और उम्मीद लगाए है।

वेलेंटाइन इजहार में जोड़े एक-दूसरे को गुलाब भेंट करते हैं। साथ में अजीब तोहफे भेंट करते हैं। लेकिन यहां तो गुलाब छोड़िए, लव ही जेहाद हो जाता है। उपहार नहीं, सपने बेचे जाते हैं।

वैसे, चुनावी घोषणाओं की मंडी तो बेहद सुहानी है। युवाओं के लिए लैपटॉप है। किसी की तरफ से डाटा और वाईफाई है। स्मार्टफोन भी खैरात में हैं। साइकिल भी मिलेगी। किसानों के लिए बिजली, पानी और कर्ज मुफ्त होगा। बुजुर्गो को मोटी पेंशन मिलेगी। वुमन हेल्प की अनगिनत सुविधाएं। लेकिन यह सब चुनावी मौसम में ही क्यों?


मतदाताओं को सिर्फ सब्जबाग दिखाया जा रहा है, जबकि मुद्दों की जमीन खाली और बंजर है। राजनीति सपने बेच रही है। राजनीति में धर्म, जाति अहम मसला बन गया है। चुनावी वेलेंटाइन के मौसम में किसी को मुसलमान तो दूसरे को हिंदू पसंद है। दूसरों को सांप्रदायिकता की खुमारी। लेकिन आम मतदाता खामोश है और राजनीति लव, जेहाद, मुजफ्फरनगर, कैराना में डूब चली है। महिला सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी गायब है।

सरकारी चीनी मिल बंद पड़ी है। कुटीर उद्योग ठप पड़ गया है। सरकारी मिलों का हाल बदहाल है। सरकारी अस्पतालों और उन पर उपलब्ध सेवाओं की हाल मत पूछिए। पश्चिमी उप्र में गन्ना किसानों को भुगतान नहीं मिल रहा है। पूर्वी उप्र में बनारसी साड़ियां, कालीन, पीतल, काष्ठ उद्योग और चीनी मिलें ठप पड़ी हैं। राजनीति में अपराधियों का बोलबोला है। उजली खादी बाहुबली और दागी छवि वालों की पहली पसंद बन गई है।

पश्चिमी उप्र सांप्रदायिकता की आग को हवा देने की कोशिश हो रही है। बागपत से एक खबर आई है, जिसमें एक परिवारों को पहले चरण के दौरान भाजपा के पक्ष में वोट न करने पर धमकी मिली। उनके घर पर पत्थर डाले गए। घर पर धमकी भरे नारे लिखे गए। वहीं बिजनौर में एक जाट परिवार के बेटे की हत्या को राजनीतिक दल सांप्रदायिक रंग चढ़ाने में लगे हैं।


यहां की राजनीति में हिंदू-मुस्लिम और दलित सबसे प्यारा विषय हो गया है। मध्यमवर्गीय परिवार और आम आदमी गायब है। भाजपा को छोड़ सपा-कांग्रेस और बसपा मुस्लिमों को लुभाने की सारी पराकाष्ठाएं लांघती दिखती हैं। भाजपा ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया है, जिस पर पार्टी के स्लोगन सबका साथ सबका विकास पर तीखी टिप्पणियां भी हुईं।

उधर, दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में खुल कर आए हैं। एक टीवी साक्षात्कार के दौरान सपा पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए मुसलमानों से बसपा को वोट करने की अपील की है। उन्हें फतवों की राजनीति से काफी लगाव है।


सर्वोच्च अदालत ने धर्म, जाति, भाषा और नस्ल के आधार पर प्रचार करने और वोट मांगने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। अदालत के फैसले बाद चुनाव आयोग भी इस पर सख्त है। लेकिन इस तरह की बयानबाजी के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई होती नहीं दिखती है। सभी दलों ने संवैधानिक चीरहरण किया है और सब इस पर मौन हैं।

सांप्रदायिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण के लिए जाति और धर्म की माला जपी जा रही है। संवैधानिक संस्थाओं की किसी को चिंता नहीं है। सवाल उठता है कि क्या इस तरह की संस्थाओं को खत्म कर देना चाहिए? निश्चित तौर पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक अघोषित टकराहट दिख रही है। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
[# अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे]

[# ये हैं लोगों से 20 करोड़ से ज्यादा ठगने वाले बाप-बेटे ]


यह भी पढ़े

Web Title-UP politics painted in Faguni paint
खास खबर Hindi News के अपडेट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो करे!
(News in Hindi खास खबर पर)
Tags: up, politics, painted, faguni paint, khaskhabar, up election, up election 2017, samachar, rajniti, khabar, hindi, article, literature, comic, akhilesh, rahul, modi, mayawati, yourh, dreams, mobile, laptop, hindu, muslim, , hindi news, news in hindi, breaking news in hindi, lucknow news, lucknow news in hindi, real time lucknow city news, real time news, lucknow news khas khabar, lucknow news in hindi
Khaskhabar UP Facebook Page:
स्थानीय ख़बरें

उत्तर प्रदेश से

प्रमुख खबरे

आपका राज्य

Traffic

जीवन मंत्र

Daily Horoscope

Copyright © 2021 Khaskhabar.com Group, All Rights Reserved