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मंडी में गूंजी देवध्वनि,1836 बजंतरियों ने किया सामूहिक महानाद, तोडा रिकार्ड

Mandi rang Devdhvni 1836 Bjntrion Mahanad by mass, broke last years record - Mandi News in Hindi

मंडी(बीरबल शर्मा)। मंडी में एक बार फिर से देवध्वनि ने आसमां को गुंजायमान कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय मंडी शिवरात्रि महोत्सव के दौरान आयोजित देवध्वनि ने इस बार अपना ही पिछले साल का रिकार्ड तोड़ दिया। पिछले साल इतिहास में पहली बार 1806 बजंतरियों ने एक साथ वाद्ययंत्र बजाकर लिम्का बुक आफ रिकार्डस में अपना नाम दर्ज करवाया था। मगर इस बार 1836 बजंतरियों ने एक साथ वाद्ययंत्र बजाकर देवध्वनि का महानाद किया और इसके साथ ही अपना पिछला रिकार्ड भी तोड़ दिया।
इस दौरान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह बतौर मुख्यअतिथि मौजूद रहे। उनकी मौजूदगी में सैंकड़ों ढोल, नगाड़े, बाम, करनाल, रणसिंगां और शहनाईयों के समवेत स्वरों से निकली यह देवध्वनि लोकधुनों का महानाद बन गई, जिससे मंडी की वादियां गुंजायमान हो उठी। इस अभूतपूर्व नजारे को देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ी थी तो इसे कैमरे में कैद करने वालों की भी होड़ लगी रही। देवी देवताओं के साथ आए सारे बजंतरियों ने पड्डल मैदान में एकत्रित होकर देव ध्वनि की। मुख्यमंत्री ने कहा कि पहाड़ में मेले देवताओं के बिना पूर्ण नहीं हो सकते। देवता हमारे लिए पूज्य ही नहीं है, बल्कि ये हमारे पूर्वज हैं जो हमारे सुख-दुख में शामिल होते हैं। देवताओं में पहाड़ के लोगों का विश्वास कायम रहता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमें अपनी भाषा, संस्कृति, रहन-सहन और खान-पान को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि देवताओं को जहां नजराना दिया जाता है। उसी प्रकार बजंतरियों को भी मेले के दौरान पारिश्रमिक दिया जाएगा। जिससे यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
हर क्षेत्र की है अलग देव ध्वनि
मंडी शिवरात्रि के दौरान आने वाले जनपद के लोक देवताओं के रथों की बनावट अलग है तो उसी तरह से देवताओं के साथ सबसे आगे चलने वाले बजंतरियों के वाद्ययंत्रों से निकलने वाली ध्वनि भी अलग-अलग है। वाद्ययंत्रों की धुन से ही इस बात का पता चल जाता है कि आने वाला देवता किस क्षेत्र से संबंधित है। जैसे सराज, उत्तरसाल और चौहारघाटी के देवताओं के वाद्ययंत्रों की ध्वनि में विविधता के बावजूद कुछ हद तक समानता भी है। इसमें नाटी नृत्य के दौरान बजाई जाने वाली लोकधुनों का समावेश बजंतरियों द्वारा किया जाता है। जबकि इसके विपरीत बल्हघाटी के देवी-देवताओं के साथ बजने वाले वाद्ययंत्रों की लय में जोश और एकरूपता झलकती है। इसमें बजंतरी एक ही लय पर देर तक बजाते जाते हैं। वहीं पर जनपद के बड़ादेव कमरूनाग के वाद्ययंत्रों की धुन सबसे अलग है। जिसे दूर सही कोई पहचान कर बता सकता है कि बड़ादेव कमरूनाग पधार रहे हैं। देवध्वनि में चौहरघाटी, बल्हघाटी, सराज और सनोर उत्तरसाल क्षेत्र के बजंतरियों ने अपने-अपने क्षेत्र की देवधुनें बजाई।
बजंतरियों के बिना नहीं चलते देवता
देव परंपरा में बजंतरियों का प्रमुख स्थान है। देवता बजतंरियों के बिना एक कदम भी नहीं चलता है। वाद्ययंत्रों की लोकधुनों पर जहां देवलू नाचते हैं तो देवता भी झूमने लगते हैं। देवतों के रूठने मनाने, देव खेल, यात्रा पर निकलने, पड़ाव पर पहुंचने और भंडारने आदि के अलग-अलग संकेत देव ध्वनि के माध्यम से होते हैं।
चांदी, तांबा और पितल के बनते हैं वाद्ययंत्र
देवी-देवताओं के साथ बजाए जाने वाले वाद्ययंत्रों को देव वाद्य कहा जाता है, जिनमें ढोल-नगाड़े के अलावा करनाल, रणसिंगा, काहल, फड़ी और शहनाई प्रमुख हैं। इनमें ढोल-नगाड़े के खोल पितल से बनते हैं, जिनमें नगाड़े पर भैंस का मोटा चमड़ा लगता है तो ढोल पर बकरे की खाल लगती है। जबकि करनाल चांदी और पित्तल तथा रणसिंगा चांदी और तांबे के बनते हैं, वहीं शहनाई अमुमन लकड़ी की बनती है। मगर उस पर चांदी की परत भी चढ़ाई जाती है। इस अवसर पर ग्रामीण विकास मंत्री अनिल शर्मा, उपायुक्त मंडी संदीप कदम, नगर परिषद अध्यक्ष नीलम शर्मा आदि भी मौजूद रहे।

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