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समीक्षा दायरा : सशक्त कथानक और असरदार अभिनय, कमजोर क्लाइमैक्स ने बिगाड़ा खेल

Daayra Movie Review: Strong Story and Powerful Performances Undermined by a Weak Climax - Movie Review in Hindi

—राजेश कुमार भगताणी ‘सैम बहादुर’ जैसी चर्चित फिल्म के बाद मेघना गुलजार एक बार फिर ऐसे विषय के साथ लौटी हैं, जिसमें अपराध, पुलिस व्यवस्था और न्याय के बीच की जटिल रेखा दिखाई देती है। ‘दायरा’ की कहानी एक महिला की हत्या और उसके बाद हुई पुलिस मुठभेड़ की जांच के बहाने उस सवाल तक पहुंचने की कोशिश करती है, जहां सच और आधिकारिक कहानी के बीच का फर्क धीरे-धीरे सामने आता है।
‘दायरा’ की कहानी 2019 के हैदराबाद पशु चिकित्सक दुष्कर्म-हत्या मामले और उसके बाद हुए पुलिस मुठभेड़ की याद जरूर दिलाती है, लेकिन निर्देशक मेघना गुलजार के अनुसार फिल्म किसी एक वास्तविक घटना पर आधारित नहीं है। कहानी तैयार करते समय कई ऐसे मामलों का अध्ययन किया गया था।
फिल्म का विषय बेहद गंभीर है और इसकी पृष्ठभूमि में देश में हुई ऐसी कई वास्तविक घटनाओं की छाया महसूस होती है, जिनमें अपराध के बाद पुलिस कार्रवाई और कथित मुठभेड़ ने अलग-अलग सवाल खड़े किए। मेघना गुलजार ने इस बार भी विषय को सनसनीखेज बनाने के बजाय उसकी परतों को खोलने की कोशिश की है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन जैसे दो मजबूत कलाकारों की मौजूदगी इसे और दिलचस्प बनाती है। फिल्म का पहला हिस्सा जिस मजबूती से कहानी को आगे बढ़ाता है, उससे उम्मीद बंधती है, लेकिन दूसरे हिस्से में पटकथा का संतुलन बिगड़ता है और अंत तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म वह प्रभाव पैदा नहीं कर पाती, जिसकी जमीन वह शुरुआत में तैयार करती है।

क्या है कहानी

‘दायरा’ करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की प्रमुख भूमिकाओं वाली फिल्म है, जिसका आधार पुलिस व्यवस्था, एक संदिग्ध मुठभेड़ और उसके पीछे छिपे सच की पड़ताल है। फिल्म की शुरुआत एक युवती रागिनी के लापता होने से होती है। पुलिस शुरुआती तौर पर उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लेती और अगले दिन उसका जला हुआ शव मिलने के बाद मामला सुर्खियों में आ जाता है। दबाव बढ़ने पर पुलिस चार संदिग्धों को गिरफ्तार करती है, लेकिन अदालत में पेश किए जाने से पहले ही चारों एक कथित मुठभेड़ में मारे जाते हैं। पुलिस इसे जवाबी कार्रवाई बताती है, जबकि सवाल उठते हैं कि कहीं यह सुनियोजित मुठभेड़ तो नहीं थी।
यहीं से कहानी में पुलिस उपायुक्त अजोनी कोहली की एंट्री होती है। आंतरिक सतर्कता इकाई से जुड़ी अजोनी को पूरे मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल की जिम्मेदारी दी जाती है। दूसरी ओर, पुलिस उपायुक्त रमन कुमार अपनी टीम के साथ मुठभेड़ को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। दोनों अधिकारियों के काम करने का तरीका अलग है और फिल्म इन्हीं दो दृष्टिकोणों के बीच आगे बढ़ते हुए दर्शक को यह समझने का मौका देती है कि आखिर उस रात हुआ क्या था।
शुरुआत में पकड़ बनाती है कहानी
कहानी की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय है। वास्तविक जीवन की एक घटना से प्रेरित कहानी को दूसरे समान मामलों के संदर्भों के साथ विकसित किया गया है। शुरुआत से ही फिल्म रहस्य बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहती है। पटकथा में कई ऐसे नाटकीय क्षण आते हैं, जो दर्शक की दिलचस्पी बनाए रखते हैं। खास तौर पर अजोनी का घटनास्थल को दोबारा समझने की कोशिश करना, पुलिस थाने में रागिनी की मां पार्वती को इंतजार करवाना और मुठभेड़ के बाद होने वाली पत्रकार वार्ता जैसे दृश्य प्रभाव छोड़ते हैं। मध्यांतर से पहले फिल्म जिस मोड़ पर पहुंचती है, वह भी उत्सुकता बढ़ाता है।
निर्देशक मेघना गुलजार इस विषय को उसी गंभीर और संयमित अंदाज में पेश करती हैं, जिसके लिए उनका काम पहचाना जाता है। फिल्म बेवजह भूमिका बांधने में समय नहीं गंवाती और शुरुआती दृश्य से ही मुख्य घटना की ओर बढ़ जाती है। दोनों पुलिस टीमों के बीच बातचीत को साथ-साथ दिखाने का तरीका प्रभावी है। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दर्शक को घटनाओं के अलग-अलग पहलुओं की जानकारी मिलती जाती है। खास बात यह है कि दूसरे हिस्से में कहानी दर्शक की शुरुआती धारणाओं को बदलने की कोशिश भी करती है।
हालांकि, मध्यांतर के बाद फिल्म की गति कुछ धीमी पड़ जाती है। कुछ दृश्यों में वर्तमान और अतीत की घटनाओं के बीच अंतर करना आसान नहीं रहता, जिससे कहानी थोड़ी उलझती है। रागिनी को जिस तरह बहकाया जाता है, वह भी पूरी तरह सहज नहीं लगता, खासकर उस घटनाक्रम में ट्रक की भूमिका को देखते हुए। लेकिन इससे भी बड़ी समस्या फिल्म के अंत में सामने आती है।
उम्मीद पर खरा नहीं उतरता क्लाइमैक्स
फिल्म जिस तरह की टकराहट और नाटकीय निष्कर्ष की जमीन तैयार करती है, उसके मुकाबले इसका अंत काफी अचानक आता है। दर्शक अजोनी और रमन के बीच किसी निर्णायक आमने-सामने की स्थिति की उम्मीद करता है, लेकिन फिल्म उस स्तर का नाटकीय समाधान नहीं देती। अचानक से क्लाइमैक्स आ जाने से ऐसा लगता है कि कहानी जिस बिंदु तक पहुंचने का वादा कर रही थी, वहां पहुंचने से पहले ही समाप्त हो गई। यही कमी फिल्म के प्रभाव को काफी कम कर देती है।
करीना और पृथ्वीराज का असरदार अभिनय
अभिनय की बात करें तो करीना कपूर खान ने अजोनी के किरदार को बिना अनावश्यक भावुकता के निभाया है। उनका पुलिस अधिकारी वाला किरदार उन कई महिला पुलिस पात्रों से अलग है, जिन्हें हाल की फिल्मों में अक्सर व्यक्तिगत त्रासदी या शराब की लत जैसी कमजोरियों के साथ पेश किया गया है। करीना का संयमित अभिनय इस भूमिका को विश्वसनीय बनाता है।
पृथ्वीराज सुकुमारन रमन कुमार के रूप में बेहद प्रभावशाली हैं। उनके संवाद बोलने का अंदाज दमदार है, उनके अभिनय की खासियत उनकी आंखों के भाव में दिखाई देती है। दोनों मुख्य कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को मजबूत आधार देती है। क्षिति जोग और भावेश बब्बानी भी अपने हिस्से में असर छोड़ते हैं। बिस्वपति सरकार, जितेंद्र जोशी और बृज भूषण शुक्ला समेत सहायक कलाकारों ने भी अपने किरदारों को विश्वसनीय बनाए रखा है। अचिंत कौर और कंवलजीत सिंह छोटी भूमिकाओं में भी प्रभाव छोड़ते हैं।
तकनीकी पक्ष भी मजबूत
तकनीकी स्तर पर फिल्म का काम मजबूत है। गीतगार गुलजार और संगीतकार अमित त्रिवेदी इस बार वो काम नहीं कर पाए हैं जिसकी उम्मीद दर्शकों और श्रोताओं को उनके काम से रहती है। केतन सोढ़ा का बैकग्राउण्ड म्यूजिक कई महत्वपूर्ण दृश्यों के तनाव को बढ़ाता है। सौरभ गोस्वामी की छायांकन शैली खास तौर पर करीबी दृश्यों में प्रभावशाली है। फिल्म हिंसा और मुठभेड़ के दृश्यों को सनसनीखेज बनाने से बचती है और कहानी को अनावश्यक मारधाड़ या वीभत्स दृश्यों के सहारे आगे नहीं बढ़ाती।
फिल्म के दृश्य संयोजन और कलाकारों की वेशभूषा कहानी के माहौल को विश्वसनीय बनाने में मदद करते हैं। एडिटर के तौर पर मेघना गुलजार और चारु श्री रॉय पूर्वार्द्ध में जो प्रभाव छोड़ते हैं वह उत्तरार्द्ध में ढीला नजर आता है। मध्यांतर के बाद के हिस्से को अगर और कसा जाता तो फिल्म का प्रभाव ज्यादा होता।
कहानी में दम, लेकिन अंत में कमी
कुल मिलाकर, ‘दायरा’ एक दिलचस्प विषय और मजबूत अभिनय के कारण शुरुआत से दर्शक की रुचि बनाए रखती है। मेघना गुलजार का निर्देशन और करीना कपूर खान तथा पृथ्वीराज सुकुमारन का अभिनय फिल्म की प्रमुख ताकत हैं। लेकिन दूसरे हिस्से का कुछ खिंचना और सबसे बढ़कर ऐसा चरमोत्कर्ष, जो कहानी द्वारा तैयार किए गए तनाव को संतोषजनक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा पाता, फिल्म के समग्र प्रभाव को कमजोर करता है। यह ऐसी फिल्म है जिसकी कहानी में दम है, लेकिन पटकथा के अंतिम हिस्से में अपेक्षित धार और निर्णायकता दिखाई नहीं देती।

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