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इस आश्रम में 43 वर्षो से जल रही अखंड अग्नि

शांतिकुंज स्थित इस अग्नि के बारे में बताते हुए गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि गायत्री के सिद्ध महापुरूष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी हिमालय में तप करने गए थे, तभी यह अग्नि देवात्मा हिमालय के किसी गुप्त गुहा के सिद्ध कुंड से उनके गुरूदेव सर्वेश्वरानंद द्वारा दी गई थी। सन् 1953 में गायत्री तपोभूमि मथुरा में इसकी स्थापना की गई और फिर 1974-75 में शांतिकुंज हरिद्वार में इसकी स्थापना हुई। वैसे तो श्रीराम शर्मा आचार्य जीवन भर इसके समक्ष साधनाएं करते रहे, किंतु विशेष व कठोर साधनाएं उन्होंने चौबीस वर्षो तक इसी सिद्धाग्नि के प्रतीक अखंड दीपक के सम्मुख पूरी की, जो चौबीस लाख गायत्री महामंत्र जप के चौबीस महापुरpण का महान अनुष्ठान है। इस दौरान वह केवल गाय के गोबर से निकले जौ से तैयार रोटी और छाछ पर निर्भर रहे थे। डॉ. पण्ड्या कहते हैं कि इसी अखंड अग्नि से अग्नि लेकर देश और विदेशों में महायज्ञों की शृंखलाएं चल प़डीं। 1958 का सहस्त्रकुंडी महायज्ञ हो या तमिलनाडु के कन्याकुमारी में इस सप्ताह के समापन में होने वाले गायत्री अश्वमेध महायज्ञ हो, इन सभी में इसी अग्रि का प्रयोग यज्ञकुंडों में किया गया है। हरिद्वार आने वाले या इन महायज्ञों में अपनी आहुतियां देने वाले अब तक करो़डों श्रद्धालु हैं, जिनमें दर्शनार्थियों से लेकर राजनैतिज्ञों व प्रशासनिक सचिवों तक की लंबी सूची है।

(आईएएनएस)

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