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ऋषि चिंतन: बनाए रखें कर्म में संतुलन तभी मिलेगी सफलता

आदि से लेकर अंत तक मनुष्य जीवन में कर्म ही कर्म भरे पड़े हैं। परिवार के लिए अन्न, वस्त्र आदि की व्यवस्था, बच्चों की पढ़ाई, रोजी-रोजगार, बीमारियों का चक्कर, शादी-ब्याह, मेल-मिलाप आदि तरह-तरह के कर्म उसे करते ही रहने पड़ते हैं। इतने और न जाने कितने ज्यादा कर्मों के बीच कर्म कुशलता ही वह संबल है, जिसके आधार पर सभी ओर सफलता और सभी ओर सुख-संतोष पाया जा सकता है अन्यथा यदि एक कर्म सफल होकर अंजलि भर सुख देगा, तो चार असफल होकर पास की भी सुख-शांति छीन ले जाएँगे। कर्म कौशल इसी में है कि कामों की एक ऐसी व्यवस्था, एक ऐसा विधान बनाया जाए, जिसकी धुरी पर सारे कर्तव्य अपनी-अपनी कक्षा में वांछित गति से चक्कर लगाते रहें, जिससे हर काम पर दृष्टि रखी जाए और सब पर उचित ध्यान दिया जा सके। किन्ही एक-दो रुचिकर कामों में आसक्ति जोडक़र बैठे रहना सारे कर्म-कलाप को छितरा देगा और तब उनको समेटने और सँभालने में इतना और अनावश्यक रूप से श्रम करना पड़ेगा कि जिंदगी बोझ बन कर रह जाएगी। संपूर्ण कर्म व्यवस्था तभी ठीक रह सकती है, जब प्रत्येक कार्य को चतुराई के साथ अपेक्षित मनोयोग से किया जाए। न तो किसी काम को छोड़ा ही जा सकता है और न किसी को पकड़ कर बैठा ही जा सकता है। समय और परिस्थिति के अनुसार सारे कामों को पूरा करना आवश्यक है। जिस ओर ध्यान न दिया जाएगा, उसी और अशांतिदायक अव्यवस्था फैल जाएगी। उदाहरण के लिए मान लीजिए बच्चों को खूब खिला-पिलाकर स्वस्थ तो बना दिया, किंतु उनकी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया, तो निश्चित ही वे अशिक्षित बच्चे आगे चलकर एक बड़ी अशांति एवं अव्यवस्था का कारण बनेंगे। दिन और रात परिश्रम करके धन की प्रचुरता कर ली, पर उसको पुण्य परमार्थ अथवा अन्य आवश्यक कामों में व्यय करने में कृपणता की तो क्या वह धन चोरों, डाकुओं, ईष्र्यालुओं और शत्रुओं की दुरभिसंधि का केंद्र बनकर जीवन में भय और शंका उत्पन्न नहीं करेगा? क्या वह परिवार में कलह और संघर्ष का सूत्रपात नहीं करेगा? दिन भर काम तो खूब किया जाए, पर आहार की ओर ध्यान न दिया जाए, तो क्या स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सकता है? यदि किसी एक ओर आसक्ति जोडक़र बैठा रहा जाए, तो भी जीवन में शांति तथा स्थिरता के लिए खतरा पैदा हो जाएगा ।पुत्र से आसक्ति है, उसकी पढ़ाई, रहन-सहन, स्वास्थ्य,सुंदरता पर पूरा ध्यान देते हैं, पर पुत्री की उपेक्षा करते हैं तो क्या ये आशा की जा सकती है कि उस पर इस पक्षपात की अशांतिकारक प्रतिक्रिया न होगी। इसी प्रकार यदि शरीर से आसक्ति रखकर आत्मा की, और आत्मा को प्रधानता देकर शरीर की, सर्वथा उपेक्षा कर दी जाए तो न लोक बनेगा और न परलोक, दोनों बिगड़ जाएंगे।
उपरोक्त प्रवचन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित पुस्तक सत्कर्म, सद्ज्ञान और सद्भाव का संगम, पृष्ठ-7 से लिया गया है।

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Web Title-Rishi Chintan: Maintain balance in karma only then you will get success
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