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ऋषि चिंतन: विचारक्रांति पर ध्यान एकाग्र करें

Rishi Chintan: Concentrate on Thought Revolution - News in Hindi

हमारा परामर्श यह है कि "पुण्य-परमार्थ" की अन्तश्चेतना यदि मन में जागे तो उसे सस्ती वाहवाही लूटने की मानसिक दुर्बलता से टकराकर चूर-चूर न होने दिया जाए । आमतौर से लोगों की ओछी प्रवृत्ति "नामवरी" लूटने का ही दूसरा नाम पुण्य मान बैठती है और ऐसे काम करती है, जिनकी वास्तविक उपयोगिता भले ही नगण्य हो, पर उनका विज्ञापन अधिक हो जाए। मंदिर, धर्मशाला बनाने आदि प्रयत्नों को हम इसी श्रेणी का मानते हैं। वे दिन लद गए जबकि मंदिर जनजाग्रति के केंद्र रहा करते थे। वे परिस्थितियाँ चली गई जब धर्मप्रचारकों और पैदल यात्रा करने वाले पथिकों के लिए विश्रामगृहों की आवश्यकता पड़ती थी। अब व्यापारिक या शादी-ब्याह संबंधी स्वार्थपरक कामों के लिए लोगों को किराया देकर ठहरना या ठहराना ही उचित है। मुफ्त की सुविधा वे क्यों लें और क्यों दें। कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह के विडंबनात्मक कामों से शक्ति का अपव्यय बचाया जाना चाहिए और उसे जनमानस के परिष्कार कर सकने वाले कार्यों की एक ही दिशा में लगाया जाना चाहिए। हमें नोट कर लेना चाहिए कि आज की समस्त उलझनों और विपत्तियों का मात्र एक ही कारण है- "मनुष्य की विचार विकृति।"
दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों ने ही शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, राजनीतिक संकट खड़े किए हैं। बाह्य उपचारों से पत्ते सींचने से कुछ बन नहीं पड़ेगा, हमें मूल तक जाना चाहिए और जहाँ से संकट उत्पन्न होते हैं, उस छेद को बंद करना चाहिए। कहना न होगा कि विचारों और भावनाओं का स्तर गिर जाना ही समस्त संकटों का केंद्रबिंदु है। हमें इसी मर्मस्थल पर तीर चलाने चाहिए। हमें "ज्ञानयज्ञ" और "विचार-क्रांति" को ही इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता एवं समस्त विकृतियों की एक मात्र चिकित्सा मानकर चलना चाहिए और उन उपायों को अपनाना चाहिए जिनसे मानवीय विचारणा एवं आकांक्षा को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता का स्तर उन्मुख किया जा सके। ज्ञानयज्ञ की सारी योजना इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

हमें अर्जुन को लक्ष्य भेदते समय मछली की आँख देखने की तरह केवल युग की आवश्यकता "विचार-क्रांति" पर ही ध्यान एकत्रित करना चाहिए और केवल उन्हीं परमार्थ प्रयोजनों को हाथ में लेना चाहिए, वही ज्ञानयज्ञ के पुण्य-प्रयोजन पूरा कर सकेगा। अन्यान्य कार्यक्रमों से हमें अपना मन बिलकुल हटा लेना चाहिए, शक्ति बखेर देने से कोई काम पूरा नहीं हो सकता। हमारा परामर्श परिजनों को यही है कि वे परमार्थ भावना से सचमुच कुछ करना चाहते हों तो उस कार्य को हजार बार इस कसौटी पर कस लें कि इस प्रयोग से आज की मानवीय दुर्बुद्धि को उलटने के लिए अभीष्ट प्रबल पुरुषार्थ की पूर्ति होती है या नहीं। शारीरिक सुख-सुविधाएँ पहुँचाने वाले धर्म-पुण्यों को अभी कुछ समय रोका जा सकता है, वे पीछे भी हो सकते हैं, पर आज की तात्कालिक आवश्यकता तो विचार-क्रांति एवं भावनात्मक नवनिर्माण ही है, सो उसी को आपत्तिधर्म-युगधर्म मानकर सर्वतोभावेन हमें उसी प्रयोजन में निरत हो जाना चाहिए । "ज्ञानयज्ञ" के कार्य इमारतों की तरह प्रत्यक्ष नहीं दीखते और स्मारक की तरह वाहवाही का प्रयोजन पूरा नहीं करते तो भी उपयोगिता की दृष्टि से ईंट-चूने की इमारतें बनाने की अपेक्षा इन भावनात्मक परमार्थों का परिणाम लाख-करोड़ गुना अधिक है। हमें वाहवाही लूटने की तुच्छता से आगे बढ़कर वे कार्य हाथ में लेने चाहिए जिनके ऊपर मानवजाति का भाग्य और भविष्य निर्भर है। यह प्रक्रिया ज्ञानयज्ञ का "होता"—"अध्वर्यु" बने बिना और किसी तरह पूरी नहीं होती । उपरोक्त प्रवचन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित अखण्ड ज्योति जून 1971 पृष्ठ-58-59 से लिया गया है।

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Web Title-Rishi Chintan: Concentrate on Thought Revolution
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