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जैसलमेर: ‘गोल्डन सिटी’ जहाँ इतिहास, संस्कृति और रेगिस्तान मिलकर रचते हैं जादू

राजस्थान का अनमोल गहना कहे जाने वाला जैसलमेर अपने किलों, हवेलियों और रेत के धोरों के कारण दुनिया भर के सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। पर्यटन के त्रिकोणीय सर्किट का यह अहम हिस्सा हर देशी-विदेशी पर्यटक की यात्रा सूची में शामिल होता ही है। लोकगीतों में अमर हुआ ‘धरती धोरां री’ जैसलमेर की रेतीली धरती का सटीक परिचय देता है। थार मरुस्थल के बीच बसा यह शहर अपनी सुनहरी रेत पर ऊँटों की लंबी कतारों और पीले पत्थरों से बनी इमारतों की वजह से विशेष रूप से विदेशी यात्रियों के लिए यादगार अनुभव बन जाता है। इसीलिए जैसलमेर को ‘गोल्डन सिटी’ और इसके भव्य क़िले को ‘सोनार किला’ कहा जाता है। जैसलमेर सिर्फ पर्यटन ही नहीं, बल्कि इतिहास और भूविज्ञान का भी अनोखा संगम है। जैसलमेर शहर से लगभग 17–18 किलोमीटर दूर, जैसलमेर–बाड़मेर मार्ग (NH-68) पर स्थित ‘अकाल वुड फ़ॉसिल पार्क’ में करीब 18 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म सुरक्षित हैं, जहाँ थार मरुस्थल की भूगर्भीय घटनाओं की झलक मिलती है। यह स्थल भारत का नेशनल जियोलॉजिकल मॉन्यूमेंट और बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट भी है।
इस शहर का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। 12वीं शताब्दी में रावल जैसल ने ऋषि ईसल के मार्गदर्शन पर 1156 में मिट्टी के एक क़िले का निर्माण कर इसे अपनी राजधानी बनाया। भगवान कृष्ण की भविष्यवाणी के अनुसार यदुवंशियों की यह भूमि एक नए राज्य का केंद्र बनी। समय की आँधियों और उतार-चढ़ाव के बावजूद जैसलमेर का किला, यहाँ की हवेलियाँ, कला और संस्कृति आज भी वैसी ही चमक बिखेरते हैं जैसी कभी सदियों पहले हुआ करती थी।
जैसलमेर का किला देश के अन्य किलों से अलग है क्योंकि इसके भीतर आज भी लोग रहते हैं। यहाँ दुकानों, होटलों और प्राचीन हवेलियों का जीवन अब भी वैसा ही चलता है जैसा सदियों से चलता आया है। यही इसकी सबसे अनोखी पहचान है।
रेत के कणों में सदी दर सदी के इतिहास की गाथाएँ समेटे जैसलमेर हर आगंतुक को बार-बार अपनी ओर बुलाता है। कला, संस्कृति और सुनहरी माटी का यह अद्भुत संगम ही इस शहर को राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट स्थान दिलाता है।
जैसलमेर में पर्यटकों के लिए घूमने की कई प्रसिद्ध जगहें हैं। सोनार किला और पटवों की हवेली यहाँ की सबसे खास धरोहर मानी जाती हैं। सम और खुरी के रेत के धोरों पर ऊँट सफारी हर पर्यटक का सपना पूरा करती है। इसके अलावा गड़ीसर झील और जैन मंदिरों की भव्यता यात्रियों को अविस्मरणीय अनुभव देती है।
घूमने का सबसे अच्छा समय
जैसलमेर घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक का माना जाता है। इस दौरान मौसम सुहावना और ठंडा रहता है, जिससे रेगिस्तान की तपती धूप परेशान नहीं करती। नवंबर से फरवरी के बीच तो यहाँ का वातावरण पर्यटकों के लिए सबसे उपयुक्त होता है।
गर्मियों (अप्रैल से जून) में यहाँ का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है, इसलिए इस समय यात्रा करना कठिन हो जाता है। वहीं बरसात (जुलाई से सितंबर) में हल्की बारिश और नमी होती है, लेकिन रेगिस्तानी इलाका होने के कारण हरियाली ज्यादा नहीं दिखती।
ठंडी हवाओं, सुनहरी रेत पर ऊँट सफारी, रेगिस्तान के सांस्कृतिक मेले और लोकनृत्य का आनंद सर्दियों में ही सबसे ज्यादा लिया जा सकता है। खासकर डेजर्ट फेस्टिवल (फरवरी में) के समय जैसलमेर की रौनक देखते ही बनती है।
आइए डालते हैं एक नजर जैसलमेर के आकर्षक स्थलों पर—

सालिम सिंह की हवेली

जैसलमेर रेल्वे स्टेशन के नज़दीक, यह हवेली मोर के पंखों जैसी गोलाई लिए छज्जों और मेहराबों से सजी है। तीन सौ साल पुरानी यह हवेली, जैसलमेर के एक दुर्र्जेय प्रधानमंत्री सालिम सिंह का निवास था। यह हवेली 18वीं शताब्दी के आरंभ में बनाई गयी थी और इसका एक हिस्सा अब भी इसके वंशजों के अधीन है। ऊंचे मेहराबदार छत में खाँचे बांटकर मोर के आकार से अलंकरण तैयार किये गये हैं। किंवदंती है कि वहाँ दो लकड़ी की मंजिलंे और थीं जो इसे महाराजा के महल के समान ऊँचाई प्रदान करती थीं। लेकिन उन्होंने इसको ध्वस्त करने का आदेश दे दिया था। स्वर्ण आभूषणों जैसी इस हवेली को पर्यटक बड़े विस्मय से देखते हैं तथा इसकी ढेरों तस्वीरें लेते हैं।
पटवों की हवेली
इस हवेली के अन्दर पाँच हवेलियाँ हैं जो कि गुमान चंद पटवा ने अपने पाँच बेटों के लिए, 1805 ई. में बनवाई थी। इसे बनाने में 50 साल लग गए थे। जैसलमेर में सबसे बड़ी और सबसे ख़ूबसूरत नक़्काशीदार हवेली, यह पांच मंज़िला संरचना एक संकरी गली में गर्व से खड़ी है। यद्यपि हवेली अब अपनी उस भव्य महिमा को खो चुकी है, तथापि कुछ चित्रकारी और काँच का काम अभी भी अंदर की दीवारों पर देखा जा सकता है। पर्यटक इस हवेली को देखने के लिए पैदल या रिक्शे में ही आ सकते हैं, क्योंकि यह पतली गली के अन्दर है।
सोनार किला (जैसलमेर किला)
जैसलमेर का सबसे बड़ा आकर्षण सोनार किला है, जिसे ‘द गोल्डन फोर्ट’ भी कहा जाता है। पीले बलुआ पत्थर से बने इस किले की दीवारें सूर्य की रोशनी में सुनहरी चमक बिखेरती हैं। यह किला आज भी बसा हुआ है, जिसके अंदर बाजार, हवेलियाँ, मंदिर और घर मौजूद हैं। पर्यटक यहां इतिहास और जीवन के अनोखे संगम का अनुभव करते हैं। यह क़िला एक वर्ल्ड हैरिटेज साइट है। थार मरूस्थल के ’त्रिकुटा पर्वत’ पर खड़ा यह क़िला बहुत सी ऐतिहासिक लड़ाईयाँ देख चुका है।
अस्तांचल में जाता सूर्य भी अपने उजास से क़िले को रहस्यपूर्ण बना देता है। बेजोड़ शैली में निर्मित यह क़िला स्थानीय कारीगरों द्वारा शाही परिवार के लिए बनाया गया था। सोनार किला एक विश्व धरोहर स्थल है। महान फिल्मकार सत्यजीत रे की प्रसिद्ध फिल्म ’फेलुदा’ में सोनार क़िला (द गोल्डन फोर्ट) का विशेष उल्लेख है। इसके अलावा भी यहाँ बहुत सी फिल्मों की शूटिंग की गई है। इस क़िले के सामने, प्रतिवर्ष, राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा, फरवरी माह में डैजर्ट फैस्टिवल मनाया जाता है। इस उत्सव में ऊँट दौड़, ऊँट श्रृंगार, ऊँट सजावट, ऊँटनी का दूध निकालने की प्रतियोगिता, पगड़ी बाँधने की प्रतियोगिता तथा विभिन्न प्रकार के नृत्य व संगीत के कार्यक्रम होते हैं। इस उत्सव में हज़ारों की संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक यहाँ आते हैं।
गड़ीसर झील
शहर के बीच स्थित गड़ीसर झील जैसलमेर का शांत और खूबसूरत पर्यटन स्थल है। यह झील कभी शहर की मुख्य जल आपूर्ति का स्रोत हुआ करती थी। यहाँ बने मंदिर और घाट इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते हैं। सुबह और शाम के समय यह झील पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए आदर्श जगह है।
लेज़र वाटर शो में जैसलमेर दुर्ग के निर्माण पटकथा, आक्रांताओ का दुर्ग पर आक्रमण, जैसलमेर के वीरों के पराक्रम और बलिदान की गाथा, तनोट माता के मंदिर का दृश्य, रामदेवरा मंदिर के दृश्य, लोद्रुवा मंदिरो का छायांकन, लक्ष्मी नारायण मंदिर के दृश्य, लोंगोवाल के युद्ध के दृश्य गड़ीसर लेक पर पानी की बूंदो से निर्मित स्क्रीन पर 3 डी वीडियो प्रोजेक्शन मैपिंग के माध्यम से दिखाया गया है। इसके साथ ही राजस्थानी गीतों पर संगीतमय फव्वारों का नृत्य भी दिखाया गया है।
जैन मंदिर

सोनार किले के भीतर बने जैन मंदिर अपने अद्वितीय स्थापत्य और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर की गई नक्काशी और मूर्तियाँ इतनी बारीकी से गढ़ी गई हैं कि देखने वाला आश्चर्यचकित रह जाए। धार्मिक आस्था और कला का यह संगम पर्यटकों को विशेष अनुभव देता है।
जैसलमेर में बने जैन मंदिरों में कला की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं ’लौद्रवा जैन मन्दिर’। दूर से इसका भव्य शिख़र नजर आता है। इसमें लगे कल्प वृक्ष के बारे में मान्यता है कि इसे छूकर जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह पूरी हो जाती है। मंदिर के गर्भगृह में ’सहसफण पाश्वर्नाथ’ की श्याम मूर्ति है, जो कि कसौटी पत्थर से बनी हुई है। जैसलमेर के क़िले के अंदर स्थित जैन मंदिर 12वीं और 15वीं शताब्दियों तक के माने जाते हैं। ये मंदिर ऋषभदेव जी आौर शंभवदेव जी, प्रसिद्ध जैन संतों के रूप में जाना जाता है, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। विवेकशील शिक्षक जो लोगों को निर्वाण का मार्ग बताते हैं, को समर्पित है। जैसलमेर की अन्य सभी संरचनाओं की तरह, इन मंदिरों को भी पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया है। प्रसिद्ध दिलवाड़ा शैली में बने इन मंदिरों को इनकी सुन्दर वास्तुकला के लिए जाना जाता है। जैन समाज के अनुयायी जैसलमेर की यात्रा को तीर्थ यात्रा मानते हैं। यहाँ दुर्ग के अन्दर भी सात आठ जैन मंदिर है।

नथमल जी की हवेली

दीवान मोहता नथमल, जो कि जैसलमेर राज्य में प्रधान मंत्री थे, उनके रहने के लिए यह हवेली बनाई गई थी। महारावल बेरीसाल द्वारा निर्मित, तथा दो भाईयों-हाथी और लूलू, जो कि बहुत ही जबरदस्त वास्तुकार थे, उन्होंने ही इस हवेली की वास्तुकला में सहयोग किया। मेन गेट पर दो पत्थर के हाथी देखकर लगता है कि आपके स्वागत के लिए खड़े हैं। 19वीं शताब्दी में दो वास्तुकार भाईयों ने ’नथमल जी की हवेली’ का निर्माण किया। उन्होंने दो तरफ से हवेली पर काम किया और इसका परिणाम सम विभाजित संरचना के एक संुदर रूप में सामने आया। मिनिएचर शैली के चित्रों और पीले बलुआ पत्थर पर नक़्काशीदार हाथी सजावट के लिए प्रयोग किये गये हैं। इस हवेली का प्रारूप तथा नक़्काशी अन्य सभी हवेलियों से अलग हैं।
बड़ा बाग
यह एक विशाल पार्क है तथा यह भाटी राजाओं की स्मृतियों को समेटे हुए है। बड़ा बाग जैसलमेर के उत्तर में 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसे ’बरबाग़’ भी कहा जाता है। इस बगीचे में जैसलमेर राज्य के पूर्व महाराजाओं जैसे जय सिंह द्वितीय सहित, राजाओं की शाही छतरियां हैं। उद्यान का स्थान ऐसी जगह है कि यहां से पर्यटकों को सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य भी देखने को मिलता है। जैसलमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय (1688-1743) ने एक बाँध बनवाया था, जिसके कारण जैसलमेर का काफी हिस्सा हरा भरा हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद 1743 में उनके पुत्र लूणकरण ने अपने पिता की छतरी यहाँ बनवाई थी। उसके बाद अन्य राजाओं की मृत्यु के बाद उनकी भी छतरियाँ यहाँ बनाई गईं।

डेज़र्ट नेशनल पार्क

थार रेगिस्तान के विभिन्न वन्यजीवों का सबसे अच्छा पार्क है। पार्क में रेत के टीले, यत्र तत्र चट्टानों, नमक झीलों और अंतर मध्यवर्ती क्षेत्रों का गठन किया गया है। जानवरों की विभिन्न प्रजातियां जैसे काले हिरण, चिंकारा और रेगिस्तान में पाई जाने वाली लोमड़ी, ये सब पार्क में विचरण करते हैं। अत्यधिक लुप्तप्रायः ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, जो दुनिया का सबसे बड़ी उड़ान भरने वाले पक्षियों में से एक है, उसे भी यहां देखा जा सकता है। सर्दियों में पार्क में विविध जीव जैसे हिमालयी और यूरेपियन ग्रिफोन वाल्टर्स, पूर्वी इंपीरियल ईगल और ’स्केलेर फॉल्कन’ पक्षी यहां विहार करते हैं। यह नैशनल पार्क जैसलमेर से 40 कि.मी. की दूरी पर है तथा पर्यटकों के देखने लायक़ हैं।

सम और खुरी के रेत के धोरें

जैसलमेर का असली आकर्षण इसके रेत के धोरें हैं। सम और खुरी के धोरों पर ऊँट सफारी और जीप सफारी पर्यटकों को रेगिस्तान की रोमांचक सैर कराते हैं। सूर्यास्त के समय यहाँ का नज़ारा स्वर्णिम आभा से भर जाता है, जिसे देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है।

मंदिर पैलेस

इसे ’ताज़िया टॉवर’ भी कहते हैं। बिल्कुल ताज़िए के शेप में यह महल, एक के ऊपर एक मंजिल के साथ खड़ा है। दो सौ साल तक यह महल, जैसलमेर के शासकों का निवास स्थान था। इसके ’बादल विलास’ नाम के हिस्से को, शहर की सबसे ऊँची इमारत माना जाता है। बादल महल (क्वाउड पैलेस) की पांच मंजिली वास्तु संरचना को इसके पगोड़ा सृदशा ताज़िया टॉवर द्वारा आगे बढ़ाया गया है। महल की प्रत्येक मंजिल में एक अद्भुत नक़्काशीदार छज्जा है। ’बादल पैलेस’ मुस्लिम कारीगरों की कला कौशल का एक बेहतरीन नमूना है, जिसमें ताज़िया के आकार में टॉवर को ढाला गया है। अब यह मंदिर पैलेस पर्यटकों के लिए, हैरिटेज होटल के रूप में संचालित किया जा रहा है, जहाँ रहकर पर्यटक स्वयं को महाराजा और महारानी महसूस करते हैं।

कुलधरा

पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा इन गाँवों का निर्माण लगभग 13वीं शताब्दी में माना जाता है। इन गाँवों के खण्डहरों को देख कर लगता है कि इनकी बहुत ही बढ़िया वास्तुकला रही होगी। सुनसान जंगल के बीच, काफी बड़े क्षेत्र में फैले, खण्डहरों में आधी अधूरी दीवारें, दरवाज़े, खिड़कियाँ दिखाई देते हैं। मध्ययुगीन 84 गांव थे जिनको पालीवाल ब्राह्मणों ने रातों रात छोड़ दिया था। उनमें से दो सबसे प्रमुख ’कुलधरा’ और ’खावा’, जैसलमेर के दक्षिण पश्चिम से क्रमशः लगभग 18 और 30 किलोमीटर दूर स्थित है। कुलधरा और खावा के खंडहर उस युग की वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनके बारे में अनेक किवदंतियां प्रचलित हैं। लेकिन इस सम्बन्ध में कोई भी सच ज्ञात नहीं है कि बड़े पैमाने पर गांवों का पलायन क्यों हुआ। ग्रामीणों का मानना है कि यह जगह शापित है और आतंक के डर से यहां बसावट नहीं होती। वर्तमान में यह स्थान एक प्रमुख पर्यटन आकर्षण है। जैसलमेर घूमने आने वाले पर्यटक, इन गाँवों की कहानियाँ सुनकर, यहाँ देखने ज़रूर आते हैं।
तन्नोट माता मंदिर
भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने वि.सं. 828 में तन्नोट माता का मंदिर बनवा कर, मूर्ति की स्थापना की थी। यहाँ आस पास के सभी गाँवों के लोग तथा विशेषकर, बीएसएफ के जवान यहां पूर्ण श्रृद्धा के साथ पूजा अर्चना करते हैं। जैसलमेर से क़रीब 120 किलोमीटर दूर ’तन्नोट माता’ मंदिर है। तन्नोट माता को देवी हिंगलाज़ का पुनर्जन्म माना जाता है। 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान, तन्नोट में हुए भारी हमले और गोलाबारी की कई कहानियाँ है। हालांकि मंदिर में गोले या बमों में से कोई भी विस्फोट नहीं हुआ। इससे लोगों की आस्था को बल मिला युद्ध के बाद से इस मंदिर का पुनर्निर्माण व प्रबंधन सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ ट्रस्ट) द्वारा किया जाता है। तन्नोट माता का एक रूप ’हिंगलाज माता’ का माना जाता है, जो कि वर्तमान में बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में स्थापित है।
अमर सागर लेक
जैसलमेर के पश्चिमी क्षेत्र में लगभग 7 कि.मी. दूरी पर अमर सागर लेक स्थित है जो कि अमर सिंह पैलेस के पास ही है। 17वीं शताब्दी में बनवाया गया यह महल झील पत्थर के नक्काशीदार जानवरों के मुखौटो से घिरा है, जिन्हें शाही परिवार का संरक्षक माना जाता है। यह शाही महल राजा महारावल अखाई सिंह द्वारा अमर सिंह के सम्मान में बनवाया गया था। इस महल में मंडप हैं जहाँ से सीढ़ियां अमर सागर झील की तरफ जाती हैं। पर्यटक इस पाँच मंज़िला इमारत की दीवारों पर आकर्षक भित्ति चित्र देख सकते हैं। इसके परिसर में कई तालाब, कुंए और मंदिर हैं। बडे़ ही शांत और सौम्य वातावरण वाले अमर सागर से, आप जैसलमेर का सबसे ख़ूबसूरत सूर्यास्त का नज़ारा भी देख सकते हैं।

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Web Title-Jaisalmer: The Golden City Where History, Culture and the Desert Weave Magic Together
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