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21 देशों में हर पाँचवाँ बच्चा डिजिटल माध्यमों से यौन शोषण का शिकार: UNICEF

 - World News in Hindi

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि 21 देशों में 12 से 17 वर्ष की आयु के लगभग दो करोड़ बच्चे - यानि हर पाँच में से एक - सोशल मीडिया व अन्य डिजिटल माध्यमों के ज़रिये यौन शोषण का शिकार हुए हैं. मुख्य बिन्दुलगभग 60 प्रतिशत मामले सोशल मीडिया से जुड़े थे.बहुत से बच्चे यौन शोषण के बारे में किसी को नहीं बताते.UNICEF ने डिजिटल मंचों को अधिक सुरक्षित बनाने और क़ानून मज़बूत करने की अपील की है.इस आयु वर्ग के डेढ़ करोड़ से अधिक बच्चों को उनकी इच्छा के विरुद्ध यौन सामग्री दिखाई गई. लगभग 90 लाख बच्चों से यौन बातचीत करने या यौन तस्वीरें साझा करने के लिए कहा गया, जबकि 40 लाख बच्चों की सहमति के बिना उनकी यौन तस्वीरें साझा की गईं.UNICEF ने कहा कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.UNICEF की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने कहा, “यह रिपोर्ट एक बेहद पीड़ादायक सच्चाई सामने लाती है. अध्ययन में शामिल देशों में दो करोड़ से अधिक बच्चों को अनचाही यौन सामग्री या डिजिटल माध्यमों के ज़रिये यौन शोषण का सामना करना पड़ा, अक्सर उन्हीं मंचों पर जहाँ वे पढ़ते हैं, खेलते हैं और दोस्तों से जुड़ते हैं.”सोशल मीडिया के ज़रिये शोषणरिपोर्ट में दर्ज यौन शोषण के लगभग 60 प्रतिशत मामले Facebook, Instagram, Snapchat, TikTok और WhatsApp जैसे सोशल मीडिया मंचों से जुड़े थे, जबकि 14 प्रतिशत मामले ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े थे. कई मामलों में इन मंचों की सुविधाओं का इस्तेमाल बच्चों का भरोसा जीतकर उनका शोषण करने के लिए किया गया.लगभग 38 प्रतिशत बच्चों का अपराधियों से पहला सम्पर्क ऑनलाइन हुआ. रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी डिजिटल सुविधाएँ शोषण को और आसान बना सकती हैं, जिनसे अपराधी अपनी पहचान छिपा सकें.मोंटेनेग्रो में दर्ज 80 प्रतिशत से अधिक मामले सोशल मीडिया से जुड़े थे.21 देशों में 57 प्रतिशत मामलों में अपराधी बच्चों के परिचित थे, जिनमें साथी, दोस्त और परिवार के सदस्य शामिल थे.आत्म-हानि का ख़तरा शोधकर्ताओं से बातचीत में यौन शोषण का सामना कर चुके बच्चों ने बताया कि इसका गहरा असर उनकी भावनात्मक सेहत, सुरक्षा की भावना और दूसरों पर भरोसे करने की उनकी क्षमता पर पड़ा. बच्चों ने डर, शर्म, उलझन और अकेलेपन जैसी भावनाओं का ज़िक्र किया.डोमिनिकन गणराज्य की एक युवती ने बताया कि 14 वर्ष की उम्र में उनकी निजी तस्वीरें बिना सहमति के साझा किए जाने के बाद, “मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूँ…मैं सदमे में थी.”विश्लेषण के अनुसार, तकनीकी माध्यमों के ज़रिये यौन शोषण का सामना करने वाले बच्चों में आत्महत्या के विचार, आत्मघाती व्यवहार और आत्म-हानि का ख़तरा चार गुना अधिक था. उनमें चिन्ता का स्तर भी काफ़ी अधिक पाया गया.पाकिस्तान में ऐसे बच्चों में आत्म-हानि का ख़तरा सात गुना से भी अधिक पाया गया.मदद तक पहुँच मुश्किलतकनीकी माध्यमों के ज़रिये यौन शोषण के 40 प्रतिशत से अधिक मामलों में बच्चों ने किसी को कुछ नहीं बताया, जबकि एक प्रतिशत से भी कम मामलों की सूचना अधिकारियों तक पहुँची.इसकी सबसे आम वजह यह थी कि बच्चों को पता ही नहीं था कि वे किससे मदद माँगें या किसे इस बारे में बताएँ.UNICEF की प्रमुख कैथरीन रसैल ने कहा, “ऐसे अनुभव बच्चों को गहरे भावनात्मक और मानसिक तनाव में डालते हैं. बहुत से बच्चे चुपचाप यह सब सहते रहते हैं और उन्हें समझ नहीं आता कि मदद के लिए कहाँ जाएँ. हम इसे नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकते.”सभी पक्षों की ज़िम्मेदारीUNICEF प्रमुख कैथरीन रसैल ने कहा, “सरकारों और तकनीकी कम्पनियों समेत हम सभी को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे.”शोधकर्ताओं ने यौन शोषण की रोकथाम के लिए कई उपाय सुझाए हैं:तकनीकी कम्पनियाँ, बच्चों के लिए सुरक्षा उपाय मज़बूत करें और शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था बेहतर बनाएँ.सरकारें जवाबदेही तय करने और क़ानून लागू करने की व्यवस्था मज़बूत करें.समाज को ऐसी हानिकारक लैंगिक धारणाओं को चुनौती देनी होगी, जो लड़कियों के यौनिकरण को सामान्य बनाती हैं और यौन हिंसा के भुक्तभोगियों को कलंकित करती हैं.

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