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पिघलते हिमनद, बढ़ता बाढ़ का संकट

 - World News in Hindi

नेपाल-चीन सीमा के पास हिमालय में तबाही का सैलाब आने से ठीक एक दिन पहले, दीपेश चापागाईं अपने एक सहकर्मी से चर्चा कर रहे थे कि ऐसी आपदा कितनी विनाशकारी हो सकती है. पूर्वी नेपाल की पहाड़ियों में पले-बढ़े 40 वर्षीय जलवायु शोधकर्ता दीपेश चापागाईं अब जर्मनी के बॉन शहर में संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय में पर्वतीय आपदाओं का अध्ययन करते हैं. इसलिए यह विषय उनके लिए केवल पेशे से जुड़ा नहीं, बल्कि बेहद निजी भी है.उन्होंने अपने जीवनकाल में ही इस क्षेत्र के सामने मौजूद जोखिमों को बदलते देखा है.उन्होंने कहा, “जब मैं बच्चा था, तब हालात ऐसे नहीं थे. मेरे माता-पिता या दादा-दादी के बचपन में भी यह कोई बड़ी चुनौती नहीं थी.” © UNU-EHS/Austin Gonzales जर्मनी के बॉन शहर में संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय परिसर में दीपेश चापागाईं. हिमनद टूटा, पहाड़ ढहाफिर बुधवार सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर हिमालय की ऊँचाइयों में पहाड़ का एक हिस्सा अचानक ढह गया.यह घटना इतनी विशाल थी कि भूकम्प मापने वाले उपकरणों ने इसे 5.2 तीव्रता की घटना के रूप में दर्ज किया और शुरुआत में इसे भूकम्प समझा गया. एक हिमनद के नीचे की आधारशिला टूटने से बर्फ़ और चट्टानों का विशाल हिस्सा क़रीब 1,200 मीटर नीचे घाटी की ओर जा गिरा.इसके बाद पानी, मिट्टी और बड़ी चट्टानों का सैलाब नदियों में उमड़ पड़ा और नेपाल-चीन के बीच एक प्रमुख व्यापार मार्ग के आसपास बसे शहरों और गाँवों को अपनी चपेट में ले लिया. एक निगरानी केन्द्र पर महज़ आधे घंटे में जलस्तर नौ मीटर तक बढ़ गया.शुक्रवार तक नेपाल और तिब्बत में 500 से अधिक लोगों की मौत की ख़बर थी, जबकि 1,500 से अधिक लोग अब भी लापता थे. इनमें सैकड़ों विदेशी नागरिक भी शामिल हैं.हालाँकि दीपेश चापागाईं का परिवार सुरक्षित रहा, लेकिन इस आपदा की ख़बर ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया.उन्होंने कहा, “घर से ऐसी विनाशकारी ख़बरें मिलना हमेशा बहुत कठिन होता है. अब ऐसी घटनाएँ अधिक होने लगी हैं और उनकी तीव्रता भी बढ़ रही है.”यह आपदा उस बढ़ते ख़तरे की भयावह मिसाल है, जिसके बारे में जलवायु वैज्ञानिक वर्षों से चेतावनी देते आए हैं. हिमालय का बर्फ़ीला भू-दृश्य तेज़ी से बदल रहा है, जिससे लाखों लोग ऐसे ख़तरों की चपेट में आ रहे हैं जिनका पूर्वानुमान लगाना कठिन होता जा रहा है और जो कुछ मामलों में पहले से अधिक विनाशकारी हो सकते हैं. © Planet Labs PBC उपग्रह तस्वीरों में नेपाल के तिमुरे इलाक़े को विनाशकारी बाढ़ से पहले और बाद में देखा जा सकता है. पहाड़ ढहने से कैसे आई विनाशकारी बाढ़बुधवार की आपदा किस तरह शुरू हुई और फिर इतनी विनाशकारी बाढ़ में कैसे बदली, विशेषज्ञ अभी भी इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं. उपग्रह तस्वीरों के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि एक हिमनद के नीचे की आधारशिला टूट गई, जिससे बर्फ़ व चट्टानों का विशाल हिस्सा भोटेकोशी नदी की सहायक नदी, ल्हेंदे खोला में जा गिरा और वहाँ से तबाही का सिलसिला शुरू हुआ.यह घटना हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ों से अलग थी. डॉक्टर दीपेश चापागाईं और उनके सहयोगी, हिन्दूकुश हिमालय क्षेत्र में वैश्विक पर्वतीय सुरक्षा अनुसंधान कार्यक्रम (GLOMOS) के तहत ऐसी बाढ़ों का अध्ययन करते हैं. GLOMOS, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) के पर्यावरण और मानव सुरक्षा संस्थान का हिस्सा है.उनके हाल के शोध में, उपलब्ध शुरुआती रिकॉर्ड से लेकर वर्ष 2024 तक ऐसी 493 बाढ़ों का विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि 1950 के बाद से ऐसी घटनाएँ लगभग पाँच गुना बढ़ गई हैं. पहले एक दशक में औसतन क़रीब सात ऐसी बाढ़ें आती थीं, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 34 हो गई है.ऐसी बाढ़ आमतौर पर तब आती है, जब पीछे हटते हिमनदों के आसपास बनी झीलों में पिघला हुआ पानी जमा हो जाता है. यह पानी अक्सर बर्फ़, ढीली चट्टानों और तलछट से बने अस्थिर प्राकृतिक बाँधों के पीछे रुका रहता है. जब ये बाँध टूटते हैं, तो बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी तेज़ी से नीचे की ओर बह निकलता है.लेकिन बुधवार की आपदा कुछ अलग तरह से हुई प्रतीत होती है.डॉक्टर दीपेश चापागाईं ने कहा, “इस बार बीच का चरण नहीं हुआ.”इस बार हिमनदीय झील नहीं फटी. इसके बजाय, पहाड़ से चट्टानें और बर्फ़ नीचे गिरीं और तेज़ बहाव पैदा हुआ. शोधकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मलबे ने कुछ समय के लिए नदी का रास्ता रोककर एक अस्थाई बाँध बना दिया था, जो बाद में टूट गया. हालाँकि, डॉक्टर चापागाईं ने कहा कि अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है.वैज्ञानिकों के लिए यह अन्तर महत्वपूर्ण है. लेकिन नीचे घाटियों में नतीजा लगभग उतना ही भयावह हो सकता है: पानी, बर्फ़ और मलबे का विशाल सैलाब बहुत कम चेतावनी के साथ संकरी व आबादी वाली घाटियों में उमड़ सकता है.यह अभी स्पष्ट नहीं है कि बुधवार को पहाड़ ढहने की घटना जलवायु परिवर्तन के कारण हुई या नहीं. मगर वैश्विक तापमान वृद्धि ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को तेज़ी से बदल रही है. हिमनदों के पिघलने और स्थाई रूप से जमी भूमि (permafrost) के गलने से, पहले बर्फ़ के सहारे टिकी चट्टानें अस्थिर हो सकती हैं. वहीं, पिघलती बर्फ़ से बढ़ता पानी पर्वतीय ढलानों को और कमज़ोर कर सकता है.इसका असर केवल पर्वतीय गाँवों तक सीमित नहीं है. हिन्दूकुश हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली 10 प्रमुख नदी घाटियों पर क़रीब 2.1 अरब लोग पानी, भोजन, ऊर्जा और आजीविका के लिए निर्भर हैं. © UNICEF अचानक आई विनाशकारी बाढ़ के बाद मध्य-उत्तरी नेपाल का रसुवा ज़िला मिट्टी और कीचड़ से ढका हुआ है. जब लोग ख़तरे के और क़रीब बसने लगते हैंकेवल पहाड़ ही नहीं बदल रहे हैं. उनके नीचे लोगों के रहने और बसने के तरीक़े भी बदल रहे हैं.डॉक्टर दीपेश चापागाईं ने बताया कि उनके बचपन में नेपाल के कई पहाड़ी इलाक़ों में लोग अपने घर ढलानों पर ऊँचाई पर बनाते थे, जबकि धान और दूसरी फ़सलें नदियों के पास समतल ज़मीन पर उगाई जाती थीं. उनके अपने परिवार का घर और बगीचा पहाड़ की चोटी पर था, जबकि धान के खेत नीचे नदी के पास थे.समय के साथ नदी घाटियों में सड़कें, व्यवसाय, होटल और जलविद्युत परियोजनाएँ बढ़ती गईं, जहाँ निर्माण आसान है तथा रोज़गार व कारोबार के अवसर भी अधिक हैं. डॉक्टर दीपेश चापागाईं के अनुसार, ऊँचाई पर बसे कुछ इलाक़ों में जल स्रोत सूखने से भी लोग नीचे की ओर बसने लगे.इससे ख़तरा और बढ़ गया है. एक ओर बढ़ता तापमान पहाड़ों को बदल रहा है, वहीं दूसरी ओर अधिक लोग और बुनियादी ढाँचा उन घाटियों में केन्द्रित हो रहे हैं, जिनसे पानी और मलबा नीचे की ओर बहता है.बुधवार की बाढ़ से तबाह हुई घाटी इसी बढ़ते जोखिम का एक उदाहरण है. भोटे कोशी-त्रिशूली गलियारा काठमांडू की ओर जाने वाले एक प्रमुख व्यापार मार्ग का हिस्सा है. इसके आसपास जलविद्युत संयंत्र, पुल, सड़कें, होटल और बस्तियाँ हैं. बाढ़ से बिजली उत्पादन सुविधाओं को नुक़सान पहुँचा और पूरे क्षेत्र में परिवहन व संचार सम्पर्क टूट गए.यह ख़तरा पहले से ही स्पष्ट था. पिछले वर्ष इसी नदी तंत्र में हिमनदीय झील फटने से बाढ़ आई थी, जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी और 24 लोग लापता हो गए थे. © UNICEF/Laxmi-Prasad-Ngakhusi नेपाल के बागमती प्रान्त में विनाशकारी अचानक आई बाढ़ के बाद इमारतें अब भी कीचड़ से ढकी हुई हैं. जब हर मिनट मायने रखता हैडॉक्टर दीपेश चापागाईं के अनुसार, बुधवार की आपदा ने एक बड़ी कमज़ोरी भी उजागर की है: ऊँचे पहाड़ों में शुरू हुई आपदा के नीचे बसे इलाक़ों तक पहुँचने से पहले, लोगों को चेतावनी देने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है.उन्होंने बताया कि नेपाली अधिकारियों को बाढ़ की जानकारी तब मिली, जब वह सीमा के क़रीब पहुँच चुकी थी. इसके बाद निचले इलाक़ों में लोगों को फ़ोन पर लिखित सन्देशों, सोशल मीडिया, फ़ोन कॉल और अलार्म के ज़रिए सतर्क किया गया.डॉक्टर दीपेश चापागाईं का कहना है कि ख़तरे को कम करने के प्रयास पहाड़ों की ऊँचाइयों से ही शुरू होने चाहिए. इसके लिए हिमनदों एवं अस्थिर ढलानों की लगातार निगरानी, उपग्रहों से नज़र, मौसम और नदियों के जलस्तर की निगरानी तथा ऐसी पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ ज़रूरी हैं, जो लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचने के लिए पर्याप्त समय दे सकें. चूँकि नदियाँ और हिमनद राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार फैले हैं, इसलिए चीन, नेपाल व निचले इलाक़ों में स्थित अन्य देशों के बीच तेज़ी से आँकड़े साझा करना भी बेहद अहम है.लेकिन चुनौती इससे भी बड़ी है. डॉक्टर चापागाईं के अनुसार, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेज़ी से कमी आने पर भी हिमनद आने वाले दशकों तक बर्फ़ खोते रहेंगे, क्योंकि अब तक हुई तापमान वृद्धि का असर लम्बे समय तक बना रहेगा. अन्ततः कितनी बर्फ़ बचेगी, यह अब भी मानवता के हाथ में है. मगर निकट भविष्य में होने वाले बदलावों को रोकने की गुंजाइश बहुत कम है.उनका मानना है कि बदलती जलवायु के अनुरूप ढलना अब भविष्य की तैयारी भर नहीं रह गया है. हिमालय के नीचे बसे समुदायों के लिए वह भविष्य बुधवार को ही हक़ीक़त बन गया.

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