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2050 तक कैंसर मामलों के लगभग दोगुना होने की आशंका - WHO

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेतावनी दी है कि अगर देशों ने रोकथाम, शुरुआती पहचान और उपचार को मज़बूत करने के लिए तत्काल क़दम नहीं उठाए, तो 2050 तक दुनिया भर में कैंसर के नए मामलों की संख्या हर साल लगभग 3 करोड़ 50 लाख तक पहुँच सकती है. WHO की एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि अमीर और ग़रीब देशों में कैंसर से बचने की सम्भावनाओं में बड़ा अन्तर है. इसी रिपोर्ट के आधार पर यह चेतावनी दी गई है.हर साल एक करोड़ मौतेंविश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की विशेष एजेंसी, कैंसर पर शोध के लिए अन्तरराष्ट्रीय एजेंसी (IARC) के साथ तैयार की गई ‘कैंसर पर वैश्विक स्थिति रिपोर्ट 2026’ में बताया गया है कि कैंसर के कारण पहले ही हर दिन 26 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो रही है. Tweet URL

रिपोर्ट के अनुसार, हर साल कैंसर के अनुमानित 2 करोड़ 6 लाख नए मामले सामने आते हैं और लगभग एक करोड़ लोगों की मौत होती है. इस तरह,हृदय सम्बन्धी बीमारियों के बाद कैंसर दुनिया में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है.रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तम्बाकू नियंत्रण, टीकाकरण और कैंसर की रोकथाम में प्रगति के बावजूद, लाखों लोग अब भी जीवनरक्षक देखभाल तक पहुँच में गहरी असमानताओं का सामना कर रहे हैं.WHO महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस एडहेनॉम घेब्रेयेसस ने कहा, “कैंसर एक बेहद निजी बीमारी है, जो लगभग हम सभी के जीवन को किसी न किसी रूप में छूती है. लेकिन कोई व्यक्ति कैंसर से बच पाएगा या नहीं, यह कभी भी इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि उसका जन्म कहाँ हुआ या उसकी आमदनी कितनी है.”उन्होंने कहा कि “इस रिपोर्ट में दर्ज असमानताएँ अपरिहार्य नहीं हैं. ये नीतिगत विकल्पों का परिणाम हैं और मज़बूत व एकजुट कार्रवाई के ज़रिये इन्हें बदला जा सकता है.”गहरी असमानताएँरिपोर्ट के अनुसार, अमीर और ग़रीब देशों में कैंसर से जीवित रहने की दरों में बड़ा अन्तर है. उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर से पीड़ित 87 प्रतिशत महिलाएँ निदान के बाद कम से कम पाँच वर्ष तक जीवित रहती हैं, जबकि निम्न आय वाले देशों में यह आँकड़ा घटकर लगभग 42 प्रतिशत रह जाता है.वर्तमान में तीन में से एक से भी कम देश अपने सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज पैकेजों में कैंसर देखभाल को शामिल करते हैं. इसके कारण अनेक मरीज़ आवश्यक निदान, उपचार या सहायक देखभाल तक पहुँच से वंचित रह जाते हैं.WHO ने इस बीमारी के भारी सामाजिक और आर्थिक बोझ को भी रेखांकित किया है. कैंसर से प्रभावित लोगों पर किए गए अपने पहले वैश्विक सर्वेक्षण में WHO ने पाया कि -कम से कम 45 प्रतिशत लोग वित्तीय कठिनाइयों का सामना करते हैं.आधे से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों की बात करते हैं.लगभग सभी देखभालकर्ताओं पर भारी दबाव पड़ता है, जिनमें बिना वेतन देखभाल की ज़िम्मेदारियाँ और सामाजिक अलगाव शामिल हैं.महाद्वीपों के बीच अन्तर2024 में दुनिया भर में कैंसर के कुल मामलों और मौतों में आधे से अधिक एशिया में दर्ज किए गए. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि दुनिया की आबादी का बड़ा हिस्सा एशिया में रहता है.योरोप में दुनिया की केवल लगभग नौ प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन वहाँ कैंसर के 21 प्रतिशत मामले और 20 प्रतिशत मौतें दर्ज की गईं. इससे पता चलता है कि वहाँ आबादी के अनुपात में कैंसर का बोझ काफ़ी अधिक है.वहीं, अफ़्रीका के कई देशों और एशिया के कुछ हिस्सों में कैंसर के मामले अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन उनसे होने वाली मौतों की दर काफ़ी अधिक है.फेफड़ों का कैंसर सबसे घातकदुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण अब भी फेफड़ों का कैंसर है. पुरुषों में फेफड़ों, प्रोस्टेट और कोलोरेक्टल कैंसर के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं, जबकि महिलाओं में स्तन, फेफड़ों और कोलोरेक्टल कैंसर के मामले अधिक हैं.2024 में दुनिया भर में अनुमानित 24 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर का निदान हुआ और 6 लाख 94 हज़ार मौतें दर्ज की गईं.स्तन कैंसर दुनिया के हर देश में पाया जाता है. यह यौवन के बाद किसी भी उम्र की महिलाओं को प्रभावित कर सकता है, हालाँकि उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ जाता है.रोकथाम अहमWHO का अनुमान है कि कैंसर के हर 10 में से लगभग चार मामले ऐसे जोखिम कारकों से जुड़े हैं, जिनकी रोकथाम की जा सकती है. इनमें तम्बाकू सेवन, शराब का सेवन, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, अस्वस्थ आहार और ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) तथा हेपेटाइटिस बी और सी जैसे संक्रमण शामिल हैं. © UNICEF/Dawali David नाइजीरिया के लागोस में, अफ़्रीका के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान के तहत, एक स्वास्थ्यकर्मी एक लड़की को HPV वैक्सीन लगा रही है. यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने ज़ोर देकर कहा कि रोकथाम के प्रयासों को नए और बढ़ते जोखिमों के अनुरूप तेज़ करना होगा.IARC की निदेशक, डॉक्टर एलिसाबेते वाइडरपास ने कहा, “जिन देशों ने रोकथाम नीतियाँ लागू की हैं, वहाँ कुछ प्रकार के कैंसर की दरों में कमी देखी जा रही है, लेकिन प्रगति अब भी बहुत धीमी है.”उन्होंने कहा, “कैंसर की स्थिति बदल रही है. मोटापे, शारीरिक निष्क्रियता, अस्वस्थ आहार और वायु प्रदूषण की बढ़ती दरें इसमें बड़ी भूमिका निभा रही हैं. कैंसर की रोकथाम को राजनैतिक प्राथमिकता बनाए रखना होगा.”प्रगति और अन्तरालरिपोर्ट में पिछले दशक की कई अहम उपलब्धियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जिनमें दुनिया भर में तम्बाकू सेवन में गिरावट, टीकाकरण कार्यक्रमों का विस्तार और मज़बूत राजनैतिक प्रतिबद्धता शामिल हैं.अब 82 प्रतिशत देश राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजनाओं की जानकारी दे रहे हैं, जबकि 2010 में यह आँकड़ा 50 प्रतिशत था. वैज्ञानिक शोध में भी तेज़ी आई है, लेकिन आवश्यक दवाओं तक पहुँच अब भी बेहद असमान है.कैंसर की 20 प्राथमिकता वाली दवाओं की उपलब्धता निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में केवल 9 से 54 प्रतिशत के बीच है, जबकि उच्च आय वाले देशों में यह 68 से 94 प्रतिशत तक है.लोगों को केन्द्र में रखना ज़रूरीWHO ने कहा कि कैंसर नियंत्रण को केवल चिकित्सा उपचार तक सीमित नहीं रखना चाहिए. स्वास्थ्य प्रणालियों में कैंसर से पीड़ित लोगों और उनके परिवारों को केन्द्र में रखना होगा.WHO के वैश्विक सर्वेक्षण का नेतृत्व करने में मदद करने वाली, बचपन में कैंसर से उबर चुकीं क्लैरिसा शिल्स्ट्रा ने कहा, “कैंसर केवल एक चिकित्सीय निदान नहीं है. यह किसी व्यक्ति व उसके परिवार के जीवन के हर पहलू को गहराई से और लम्बे समय तक प्रभावित करता है.”उन्होंने नीति-निर्माताओं से आग्रह किया कि वे अधिक न्यायसंगत और प्रभावी स्वास्थ्य नीतियाँ बनाने के लिए कैंसर का अनुभव कर चुके लोगों के साथ और नज़दीकी से काम करें.

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