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जलवायु संकट पर ICJ के आदेश के समर्थन में, महासभा में प्रस्ताव पारित

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संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में देशों के क़ानूनी दायित्वों के मुद्दे पर पारित ऐतिहासिक प्रस्ताव, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून, जलवायु न्याय और विज्ञान में भरोसे की शक्तिशाली अभिव्यक्ति है. यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने बुधवार को यह प्रस्ताव पारित होने के बाद यह बात कही है. यूएन महासभा में पेश किए गए इस प्रस्ताव का शीर्षक है: जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध में सदस्य देशों के दायित्वों पर अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की सलाहकार राय.इस प्रस्ताव को वानुआतु और अनेक अन्य देशों ने तैयार किया था, जिसके पक्ष में 141 वोट डाले गए, 8 देशों ने विरोध में मतदान किया और 28 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. Tweet URL

ईरान, इसराइल, लाइबेरिया, रूस, सऊदी अरब, संयुक्त राज्य अमेरिका, यमन, बेलारूस ने इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया.संयुक्त राष्ट्र के मुख्य न्यायिक अंग, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने जुलाई 2025 में अपने एक आदेश में कहा था कि देशों का यह दायित्व है कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से पर्यावरण की रक्षा करें. इसी आदेश पर पारित हुए प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि बढ़ते जलवायु संकट से अपने नागरिकों की रक्षा करने का दायित्व, सदस्य देशों का ही है.महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा कि यह प्रस्ताव, हमारे ग्रह के लिए एक विजय है.इस प्रस्ताव में सभी सदस्य देशों से जलवायु व पर्यावरण को बड़ी क्षति से बचाने के लिए हरसम्भव क़दम उठाने का आग्रह किया गया है. इसमें देशों की सीमाओं के भीतर होने वाले उत्सर्जन, और पेरिस जलवायु समझौते के तहत लिए गए संकल्पों को पूरा करना भी है.इसके अलावा, देशों की सरकारों से आग्रह किया गया है कि उन्हें सदभाव के साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए निरन्तर प्रयास करने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि जलवायु नीतियों में, जीवन, स्वास्थ्य और आवास के पर्याप्त मानकों की रक्षा की जाए.क़ानूनी दायित्वअन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि यदि कोई सदस्य देश इन दायित्वों का पालन नहीं करता है, तो फिर वे इसके लिए क़ानूनी रूप से ज़िम्मेदार होंगे और इस ग़लत आचरण को रोकना, क़ानूनी रूप से आवश्यक होगा.साथ ही, उन्हें ऐसा फिर न होने देने के लिए गारंटी देनी होगी और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण रूप से मुआवज़ा चुकाना होगा.हालांकि, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय की सलाहकार राय, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, मगर उनका क़ानूनी व नैतिक वज़न होता है, और उससे सदस्य देशों के लिए तयशुदा क़ानूनी दायित्वों को निर्धारित करने में मदद मिलती है.बुधवार को यूएन महासभा में यह प्रस्ताव इसी आदेश के बाद पारित हुआ है, जोकि यह सन्देश देता है कि जलवायु संकट से निपटना अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत एक क़ानूनी दायित्व है और केवल राजनैतिक चयन नहीं है.महासचिव गुटेरेश ने कहा कि विश्व की सर्वोच्च अदालत अपनी बात कह चुकी है. “आज, यूएन महासभा ने अपना जवाब दे दिया है.”लक्ष्य, पहुँच के भीतरयूएन महासभा में बुधवार को हुए मतदान के बाद, महासचिव गुटेरेश ने क्षोभ जताया कि जो देश, जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं, उन्हें इसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है.जलवायु न्याय के लिए रास्ता “एक त्वरित, न्यायसंगत और समतापूर्ण बदलाव से होकर जाता है, जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में.”यूएन महासचिव के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा सबसे सस्ती साबित हुई है और ऊर्जा का सबसे सुरक्षित रूप है. औद्योगिक काल से पहले की तुलना में वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य को अब भी हासिल किया जा सकता है.

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