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डिजिटल प्रणालियाँ नाकाम हो जाएँ तो... तैयारियों की पुकार

 - World News in Hindi

जब कभी हमारे फ़ोन का नैटवर्क यानि डेटा ग़ायब हो जाता है या फिर घर या कार्यालय में WiFi कनेक्शन ठप हो जाता है तो झुंझलाहट होना स्वभाविक है. मगर सोचें कि जिन डिजिटल साधनों पर हम रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में पूरी तरह निर्भर हैं, वो अगर पूरी तरह ठप हो जाएँ तो क्या होगा. डिजिटल प्रणालियों में उपग्रहों से लेकर अस्पतालों के जीवन-रक्षक उपकरणों तक के साधन शामिल हैं और उनका अचानक ठप हो जाना एक भयानक आपदा होगी. संयुक्त राष्ट्र ने इस आशंकित “डिजिटल महामारी” को रोकने के लिए, सदस्य देशों से बढ़ते तकनीकी जोखिमों का मिलकर मुक़ाबला करने का आग्रह किया है.ये ख़तरे पहले से ही देखे जा रहे हैं. वर्ष 2012 में एक सौर तूफ़ान पृथ्वी से टकराने से बाल-बाल बच गया; यदि वह सीधे टकराता, तो महाद्वीपों में फैले बिजली ग्रिड और संचार प्रणालियाँ नष्ट हो सकती थीं. इसके अलावा, अन्तरिक्ष मलबे की तेज़ी से बढ़ती समस्या हमें अन्तरिक्ष से बाहर करने देने का जोखिम उत्पन्न कर रही है जिससे उपग्रह छोड़ना मुश्किल हो जाएगा, और अन्ततः नैविगेशन, वित्त और मौसम पूर्वानुमान ख़तरे में पड़ सकते हैं.अन्तरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) की प्रमुख डोरीन बोगदान-मार्टिन आगाह करते हुए कहती हैं कि ऐसे व्यवधान शायद ही कभी किसी एक क्षेत्र तक सीमित रहते हैं. “इन व्यवधानों का साझा गुण यह है कि ये एक साथ वित्त, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में एक साथ प्रभाव डालते हैं.” © UNICEF/Oleksii Filippov एक रेलवे स्टेशन पर, बिजली कटौती के दौरान यात्रियों को, कुछ ऐसे हालात का सामना करना पड़ता है. जिससे उजागर होता है कि बिजली में व्यवधान किस तरह परिवहन, संचार और दैनिक जीवन को तुरन्त प्रभावित कर सकता है. कड़ी से कड़ी का ख़तरासंयुक्त राष्ट्र का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी 89% डिजिटल बाधाएँ, प्रारम्भिक झटके की बजाय, उसके परिणामों के कारण होती हैं. आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNDRR) के प्रमुख कमल किशोर बताते हैं कि ये जोखिम प्रणालियों से ज़रिए आपस में जुड़े हुए हैं और इनकी आपसी निर्भरताएँ अक्सर दिखाई नहीं देतीं:“अगर बिजली चली जाए, तो दूरसंचार टावर नौ घंटे तक चलते हैं. जब वे बन्द हो जाते हैं, तो एटीएम काम करना बन्द कर देते हैं, और लोगों को नक़दी तक पहुँच नहीं रहती.”नतीजतन, डिजिटल विफलता से प्रभावित लोगों की संख्या उन लोगों से दस गुना तक अधिक हो सकती है जो शुरुआती तौर पर जोखिम में थे.डिजिटल नाकामी कभी भी हो सकती हैविशेषज्ञों का कहना है कि समाधान, तकनीक प्रयोग को छोड़ना नहीं है, बल्कि डिजिटल विफलता की स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहना है, जोकि कभी भी हो सकती है.कमल किशोर कहते हैं कि अब यह सवाल नहीं बचा है कि क्या कोई डिजिटल आपदा हो सकती है, सवाल ये है कि कब हो सकती है. रिपोर्ट में कार्रवाई के लिए छह प्राथमिक क्षेत्र बताए गए हैं:जोखिम मानचित्रण और अन्तरराष्ट्रीय मानकों में सुधार.विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय को मज़बूत करना.समाज की झटकों को सहन करने और उनसे उबरने की क्षमता का निर्माण.वैश्विक सहयोग और प्रारम्भिक चेतावनी प्रणालियों को सशक्त बनाना.लक्ष्य जागरूकता से कार्रवाई की ओर बढ़ना है, ताकि जब प्रणालियाँ विफल हों, तो समाज उनके साथ ढह नहीं जाए.

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