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रोज़गार की बदलती ज़रूरतों के बीच, अधिकांश वयस्क कौशल से वंचित

 - World News in Hindi

आज के दौर में तेज़ी से बदलते रोज़गार बाज़ार के लिए, अधिकांश वयस्कों के पास ज़रूरी प्रशिक्षण नहीं है. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक नई रिपोर्ट बताती है कि कामकाज करने की आयु के केवल 16 प्रतिशत वयस्क ही, प्रासंगिक व संगठित प्रशिक्षण में भाग लेते हैं. ऐसे समय में, जब अर्थव्यवस्था को तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एक नया रूप दे रही है, तब ILO ने चेतावनी दी है कि समावेशी शिक्षा के बिना असमानता और गहरी होती जाएगी. Tweet URL

ज़रूरतमन्द वयस्कों के लिए प्रशिक्षण की उपलब्धता में भारी असमानता है.एक तरफ़ जहाँ पूर्णकालिक कर्मचारियों में से लगभग आधी संख्या को प्रशिक्षण का सहारा मिलता है, वहीं, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले या कम शिक्षित लोग अक्सर इससे बाहर रह जाते हैं, जिससे देशों के भीतर और उनके बीच विभाजन और बढ़ रहा है.अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की ‘जीवनभर सीखना और भविष्य के लिए कौशल’ नामक रिपोर्ट में पाया गया है कि कम औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाले, अनौपचारिक रोज़गार में काम करने वाले और छोटे उद्यमों से जुड़े श्रमिक मुख्यतः “करके सीखना” (learn-by-doing) पर निर्भर रहते हैं, जबकि अन्य लोग अधिकतर अनुभवी सहकर्मियों से सीखते हैं और संगठित प्रशिक्षण तक पहुँच पाते हैं.यह स्थिति इस आवश्यकता को रेखांकित करती है कि सीखने के ऐसे तंत्र विकसित किए जाएँ, जो लोगों के पूरे कार्य जीवन के दौरान कौशल अर्जित करने के वास्तविक तरीक़ों को बेहतर ढंग से दर्शा सके.रिपोर्ट के मुताबिक़, नियोक्ता अब डिजिटल कौशल के साथ-साथ संचार, टीमवर्क और समस्या-समाधान जैसी क्षमताओं की भी मांग कर रहे हैं. कुछ क्षेत्रों में माँगे जाने वाले कौशल में इनकी हिस्सेदारी आधे से भी अधिक है.निम्न आय वाले देश अधिक प्रभावितइसके बावजूद निवेश कम बना हुआ है. उच्च-आय वाले अनेक देशों में से, 34 प्रतिशत देश अपने शिक्षा बजट का एक प्रतिशत से भी कम वयस्क शिक्षा पर ख़र्च करते हैं, जबकि निम्न-आय वाले देशों में यह आंकड़ा 63 प्रतिशत तक पहुँच जाता है.रिपोर्ट के अनुसार, उच्च-आय वाले देशों में आमतौर पर अधिक विकसित संस्थागत ढाँचे होने का लाभ मिलता है, लेकिन फिर भी कई तरह की चुनौतियाँ बनी रहती हैं, जैसेकि संस्थानों के बीच कमज़ोर समन्वय और सीखने के अवसरों तक असमान पहुँच.वहीं, निम्न-आय वाले देशों में वित्तीय संसाधनों की कमी और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे जैसी संरचनात्मक बाधाएँ सीखने की प्रणालियों की पहुँच और प्रभावशीलता को और सीमित कर देती हैं.सीखने को दी जाए प्राथमिकताफ़िलहाल, एआई-विशिष्ट कौशल, कुल कौशल मांग का केवल एक छोटा हिस्सा हैं. हालाँकि, इस मांग के बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन यह इस तथ्य को भी दर्शाता है कि अनेक कर्मचारी ऐसे प्रयोग के लिए तैयार (ready-to-use) एआई उपकरणों या साधनों का उपयोग कर रहे हैं, जिनके लिए विशेषज्ञ ज्ञान की ज़रूरत नहीं होती है.इसके बजाय, वे मज़बूत बुनियादी कौशलों पर निर्भर रहते हैं, जैसेकि डिजिटल साक्षरता, आलोचनात्मक सोच और सामाजिक कौशल.ILO के महानिदेशक गिलबर्ट होंग्बो ने कहा कि “आजीवन सीखना (Lifelong learning) आज के रोज़गार और भविष्य के अवसरों के बीच एक सेतु है.” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सीखने को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि वैश्विक कार्यबल का कोई भी हिस्सा पीछे नहीं छूटे. © ILO/Berke Arakli तुर्की में एक युवक को रोज़गार प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है. सरकारों की अहम भूमिकारिपोर्ट में ज़ोर दिया गया है कि देशों की सरकारों, नियोक्ता संगठनों और श्रमिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका है. साथ ही, सीखने के अवसरों तक व्यापक और समान पहुँच सुनिश्चित करने, प्रशिक्षण प्रणालियों को मज़बूत बनाने और लोगों के जीवन के अनुरूप आजीवन सीखने (lifelong learning) की नीतियाँ विकसित करने की अपील की गई है.इसके अलावा, इसमें मज़बूत शासन व्यवस्था, बेहतर समन्वय, पर्याप्त वित्तपोषण और सामाजिक सम्वाद की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है.रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि निर्णायक क़दम नहीं उठाए गए, तो भविष्य के कार्यक्षेत्र में हो रहे बदलाव, वैश्विक कार्यबल के बड़े हिस्से को पीछे छोड़ सकते हैं.

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