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तीन पीढ़ियाँ, एक बदलाव: परिवार नियोजन और अधिकार

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तकनीक और नवाचार ने दुनिया भर में लोगों के जीवन को गहराई से बदला है. सूचना प्रौद्योगिकी ने अभिव्यक्ति, कामकाज और विचारों के आदान-प्रदान के नए रास्ते खोले हैं, जबकि स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रगति ने जीवन बचाए हैं व लोगों की उम्र बढ़ाई है. लेकिन मानवाधिकारों, विकास और आबादी पर सबसे गहरा असर डालने वाले साधनों में से एक, कोई नई तकनीक नहीं बल्कि - वह परिवार नियोजन है, जो लोगों को अपने शरीर, स्वास्थ्य एवं भविष्य के बारे में निर्णय लेने का अधिकार और विकल्प देता है. परिवार नियोजन का असर सबसे बुनियादी है. यह लोगों को यह अधिकार व साधन देता है कि वे कब, कितने बच्चे और कितने अन्तराल पर पैदा करना चाहते हैं.परिवार नियोजन को 1969 में मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी. 1994 में जनसंख्या और विकास पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में इसे राष्ट्रीय विकास और मानवीय प्रगति के लिए ज़रूरी माना गया. आज, जब कई जगह लैंगिक समानता को लेकर चिन्ताएँ बढ़ रही हैं, परिवार नियोजन को केवल स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि अधिकारों और विकल्पों की बुनियाद के रूप में देखना ज़रूरी है.तीन पीढ़ियों की कहानीभारत के बिहार प्रदेश में सरस्वती देवी का विवाह, 16 वर्ष की उम्र में हो गया था. 30 वर्ष की आयु तक, उनके पाँच बच्चे पैदा हो चुके थे. 1970 के दशक में उनके गाँव में यह कोई असामान्य बात नहीं थी.उन्होंने UNFPA को बताया, “हमें उस समय गर्भनिरोधक के बारे में जानकारी नहीं थी. हमें नहीं मालूम था कि गर्भधारण को कैसे टाला या रोका जाए, और हम पूछने से भी डरते थे.”उस समय बड़े परिवार को आर्थिक सहारे के रूप में देखा जाता था. सरस्वती बताती हैं, “मेरी सास हमेशा कहती थीं, ‘जितने अधिक बच्चे होंगे, खेतों में काम करने के लिए उतने अधिक हाथ होंगे.’लेकिन यह फ़ैसला उनका अपना नहीं था. उन्होंने कहा, “जब मैं बच्चे पैदा करना बन्द करना चाहती थी, तो मेरी सास ने कहा कि मुझे जारी रखना चाहिए, और मैं उनकी बात नहीं टाल सकती थी.”सरस्वती कहती हैं कि अगर उन्हें फिर से जीवन जीने का अवसर मिले, तो वह कम बच्चे पैदा करना चाहेंगी. “मैं बेटियाँ चाहती थी, लेकिन मेरी सभी सन्तानें बेटे हुए. लड़के और लड़कियाँ दोनोंका होना अच्छा है. मैं अपने बच्चों से प्यार करती हूँ, लेकिन अब वे सब अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हैं.” © UNICEF/Vineeta Misra जैसे-जैसे ज़मीन पर पानी लौटा, वैसे-वैसे महिलाएँ भी नए उत्साह और उद्देश्य के साथ अपने खेतों की ओर लौटीं. परिवार नियोजन की जानकारीअगली पीढ़ी में कुछ बदलाव आया, लेकिन पूरी तरह नहीं.सरस्वती की बहू अनीता देवी की शादी 18 वर्ष की उम्र में, 1990 के दशक के अन्त में हुई. जब स्वास्थ्यकर्मी उनके गाँव आए, तो उन्हें परिवार नियोजन सेवाओं और गर्भनिरोधक के बारे में जानकारी मिली.उन्होंने कहा, “मैं शुरू में केवल एक या दो बच्चे चाहती थी, एक लड़की और एक लड़का. हम ग़रीब हैं, और बड़ा परिवार पालना मुश्किल होता है.”लेकिन गर्भनिरोधक उपलब्ध होने के बावजूद निर्णय पूरी तरह अनीता के हाथ में नहीं था. उन्होंने कहा, “परिवार में परिवार नियोजन पर बात करना आसान नहीं था, और मेरे पति गर्भनिरोधक के ख़िलाफ़ थे.”बेटे की चाहत के दबाव में वह फिर गर्भवती हुईं. चौथी बेटी के बाद वह और बच्चे नहीं पैदा करना चाहती थीं, लेकिन उनकी इच्छा को अधिक महत्व नहीं मिला.उन्होंने कहा, “मेरे पति और सास और बच्चे चाहते थे, ख़ासतौर पर बेटा. मैं थक चुकी थी, लेकिन मेरी बात बहुत कम सुनी जाती थी.”अनीता के छह बच्चे हुए. वह उनसे बहुत प्यार करती हैं. उन्होंने कहा, “संघर्षों के बावजूद, मैं अपने परिवार से खुश हूँ. “मेरे सभी बच्चों को कुछ न कुछ शिक्षा मिली है. मैं अपना समय घर के काम और खेत में अपने पति की मदद के बीच बाँटती हूँ.”लेकिन उनकी बेटियों के लिए हालात बदलने लगे. अब परिवार नियोजन के साथ शिक्षा, जानकारी और कुछ हद तक लैंगिक समानता भी जुड़ने लगी थी.बेहतर जीवन की योजनाअनीता की बेटी पूजा कुमारी ने शादी से पहले विश्वविद्यालय की शिक्षा पूरी की. 22 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ और 23 वर्ष की उम्र में उनका पहला बच्चा हुआ. इसके बाद उन्होंने तीन वर्षों तक गर्भनिरोधक का इस्तेमाल किया और 26 वर्ष की उम्र में दूसरा बच्चा करने का निर्णय लिया.पूजा ने अपने प्रजनन अधिकारों और स्वास्थ्य के बारे में रात्रि चौपालों से सीखा, जहाँ स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी गाँव के लोगों को जानकारी देते हैं. इन बैठकों से उन्हें अपने पति के साथ बच्चों की संख्या और गर्भधारण के समय पर खुलकर बात करने का आत्मविश्वास मिला.उन्होंने कहा, “मेरे पति और मैंने तय किया है कि हमारे केवल दो बच्चे होंगे. हम उन्हें अच्छी तरह पालना चाहते हैं, उन्हें अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं और अपने परिवार का सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना चाहते हैं.”पूजा भारत की उस नई पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिनके पास न केवल साधन हैं, बल्कि अपने प्रजनन सम्बन्धी फ़ैसले लेने की शक्ति भी है.उन्होंने कहा, “मैं अपने बच्चों को बेहतर जीवन देना चाहती हूँ, और अपने स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता देना चाहती हूँ. अगर मेरे बहुत अधिक बच्चे होंगे, तो मैं यह नहीं कर पाऊँगी.” © UNFPA 50 वर्षीय हीरमी बाई ने अपनी 20 वर्षीय बहू दुर्गा को परिवार नियोजन के बारे में सही जानकारी दी, ताकि वह सोच-समझकर निर्णय ले सके. अधिकारों और विकल्पों का भविष्य1960 में, जब सरस्वती का जन्म हुआ था, भारत में महिलाएँ औसतन लगभग छह बच्चों को जन्म देती थीं. उस समय आधी से भी कम लड़कियाँ प्राथमिक स्कूल जाती थीं.आज भारत में महिलाओं के औसतन लगभग दो बच्चे हैं, और 10 में से नौ से अधिक लड़कियाँ, प्राथमिक शिक्षा पूरी कर माध्यमिक स्तर तक पहुँच रही हैं.अब महिलाएँ डॉक्टर, वकील, सांसद और इंजीनियर के रूप में सामने आ रही हैं. वे नई पीढ़ी की तकनीकों और समाधानों को भी आकार दे रही हैं, जिनमें परिवार नियोजन शामिल है.यह बदलाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. पूजा की कहानी दिखाती है कि परिवार नियोजन और महिलाओं का सशक्तिकरण पुरुषों, बच्चों और पूरे परिवार के लिए फ़ायदेमन्द है.पूजा ने, यूएनएफ़पीए के साथ बातचीत में कहा, “मेरे पति मेरी महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हैं, और हम साथ मिलकर एक स्थिर भविष्य की योजना बना रहे हैं.”यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ है.

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