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सूडान युद्ध से बचकर निकलने के बाद, युगांडा में जीवन पटरी पर लाने में जुटे शरणार्थी

 - World News in Hindi

युगांडा के बियाले नगर के बाहरी छोर पर, धूल भरी सड़कों के पास खुले मैदानों पर लगाए गए टैंट, दूर-दूर तक देखे जा सकते हैं. युगांडा के सबसे बड़े शरणार्थी शिविरों में से एक, क्रिएनडोंगो में आश्रय लेने वाले लोग बर्बादी भरे अतीत को पीछे छोड़कर, अपने लिए एक नए जीवन को फिर से आकार देने की कोशिश कर रहे हैं. यहाँ रह रहे लोगों की कहानी, केवल युद्ध में जान बचाने के लिए भाग जाने पर समाप्त नहीं होती है. उनके जीवन का एक और चरण शुरू हुआ है, जहाँ दिनों को घंटों में नहीं, बल्कि बहुत कुछ खो देने के बोझ और जीवन जारी रखने के प्रयास में मापा जाता है.अप्रैल 2023 में सूडान में परस्पर विरोधी सैन्य बलों के बीच हिंसक टकराव भड़क उठा था, जिसके बाद से अब तक 6 लाख से अधिक सूडानी शरणार्थी इस शिविर में पहुँचे हैं. बहुत से लोगों ने यहाँ तक पहुँचने के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में, थका कर चकनाचूर कर देने वाली यात्राएँ की हैं. उनके पास सामान बहुत कम है और स्मृतियाँ बहुत अधिक, और वे भारी उथलपुथल का शिकार हुए अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने का प्रयास कर रहे हैं. UN News/Abdelmonem Makki युगांडा के बियाले नगर के पास स्थित क्रिएनडोंगो शिविर में लगभग 6 लाख सूडानी शरणार्थियों ने आश्रय लिया है. क्रिएनडोंगो शरणार्थी कैम्प, युगांडा की राजधानी कम्पाला से लगभग 275 किलोमीटर दूर है, जहाँ दक्षिण सूडान, बुरुंडी, केनया, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य और रवांडा से आने वाले विस्थापित और मेज़बान समुदाय के लोग रहते हैं.उन सभी को जो कुछ भी जोड़ता है, वो उनके बीच के अन्तर से कहीं विशाल है: बहुत कुछ खो देने का अनुभव और जीवन फिर से शुरू करने की आवश्यकता.यूएन न्यूज़ ने इस शरणार्थी शिविर में आश्रय लेने वाले लोगों के जीवन को नज़दीक से देखा और उन असाधारण चुनौतियों को सुना-समझा, जिनका सामना युद्ध से जान बचाकर यहाँ आने वाले लोगों ने किया है.इंजीनियरिंग कक्ष से कैम्प तक UN News/Abdelmonem Makki हुसैन हाशिम तइमान क्रिएनडोंगो शिविर में एक ऐसा जीवन जी रहे हैं जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. हुसैन हशीम तइमान एक सिविल इंजीनियर हैं. उन्होंने मास्टर्स की डिग्री हासिल की है और एक समय वह सूडान के दारफ़ूर क्षेत्र में यूएन मिशन (UNAMID) के साथ सिविल इंजीनियरिंग विभाग में सेवारत थे.मगर, अब हुसैन अब एक ऐसा जीवन जी रहे हैं, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी. वह एक टैंट के भीतर बैठते हैं और युगांडा मे सूडानी शरणार्थी समुदाय के प्रमुख का दायित्व सम्भाल रहे हैं. मई 2023 में, हुसैन ने अपने बच्चों के साथ ओमदुरमान को छोड़ दिया था और वहाँ से पहले दक्षिण सूडान तक की यात्रा की और फिर युगांडा पहुँचे. उन्होंने बताया कि यह यात्रा भय, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार से भरी हुई थी. “यहाँ, जब आप शिकायत करते हैं, तो आपको पता चलता है कि किसी अन्य का दुर्भाग्य आपसे कहीं अधिक बड़ा है, इसलिए आप अपना दुख भूल जाते हैं और उनका कम करने की कोशिश करते हैं.”“हम एक दूसरे से हिम्मत लेते हैं. कभी-कभी, हम पेशेवर कर्मियों की तरह एक साथ बैठते हैं और अपने अतीत की बातें करते हैं. मैं अब एक टैंट में रह रहा हूँ, लेकिन युद्ध के नतीजे में यही होता है.”हालात जस के तस15 अप्रैल को, सूडान में हिंसक टकराव शुरू हुए तीन वर्ष पूरे हो रहे हैं लेकिन आशाओं के बावजूद स्थिति में कोई ख़ास सुधार नहीं आया है. मानवीय सहायता का स्तर घटा है और जिन टैंट को छह महीने के लिए तैयार किया गया था, वे तीन वर्ष बाद अब मानो लोगों के लिए स्थाई आश्रय स्थल बन गए हैं.पर्याप्त स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल सेवाएँ उपलब्ध नहीं हैं, शिक्षा अनियमित है और भोजन व जल, यहाँ के निवासियों के लिए एक साझा दायित्व बन गया है.हुसैन हशीम ने आगाह किया कि एक पूरी पीढ़ा का भविष्य दाँव पर लगा हुआ है, और इसलिए संयुक्त राष्ट्र व अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को युगांडा में सूडानी शरणार्थियों पर ज़्यादा ध्यान केन्द्रित करना होगा.भोजन: जीवन-मरण का प्रश्नमुतासिम मोहम्मद अहमद, मूलत:, सूडान के दक्षिण दारफ़ूर प्रान्त में न्याला से हैं, राजधानी ख़ारतूम में रहते थे और सूडान, चीन व दुबई में व्यापार कर रहे थे. देश में लड़ाई भड़कने के बाद उनका जीवन अस्तव्यस्त हो गया और उन्होंने वर्ष 2023 में युगांडा में शरण ली, जहाँ अब वह सामुदायिक रसोइयों के सचिव के रूप में काम कर रहे हैं.क्रिएनडोंगो शिविर में जब कटु वास्तविकताओं से सामना हुआ, तो फिर सरल समाधान भी उभरे, जिनमें सामुदायिक रसोई भी हैं.भोजन, खाद्य वस्तुओं की तात्कालिक आवश्यकता के परिणामस्वरूप इन रसोइयों को शुरू किया गया और यह ऐसा जीवनरक्षक प्रयास साबित हुआ है, जिससे क्रिएनडोंगो शिविर में शरणार्थियों को भुखमरी से बचाने में मदद मिली है.फ़िलहाल, इस शिविर में ऐसी 20 रसोइयाँ संचालित की जाती हैं, जिनके ज़रिए भूख पर नियंत्रण पाने और सूडानी निवासियों में सामाजिक रिश्ते बनाने के प्रयास हो रहे हैं.मुतासिम मोहम्मद अहमद ने बताया कि विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) से शरणार्थियों को मिलने वाली खाद्य रसद में कटौती की गई थी, जिसके बाद इन रसोइयों को स्थापित किया गया.“हमने यहाँ के निवासियों को कुपोषण का शिकार होते हुए देखा. भूख की वजह से मौतें हो रही थीं और गर्भपात भी.” सामुदायिक रसोइयों ने उन्हें बदल दिया है. “सामुदायिक किचन में काम करने के अनुभव ने मुझे मनुष्य होने के मायने समझाए हैं.”“आप लोगों को यहाँ भूखा देखते हैं और यदि आपमें मानवता नहीं है, तो आप उसे महसूस नहीं कर सकते हैं. मैंने अपने सूडानी नागरिकों के लिए ऐसा महसूस करता हूँ, जो मेरे ही हाड-माँस का हिस्सा हैं.”दूसरों की मदद © MDPD डॉक्टर विदाद मक्की सूडान में एक युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और ख़ारतूम प्रान्त में विशेष शिक्षा विभाग की निदेशक रह चुकी हैं, मगर बमबारी की वजह से उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा. डॉक्टर विदाद मक्की अब कम्पाला में रहती हैं और वह लम्बी दूरी तय करके इस शिविर तक पहुँची हैं, ताकि यहाँ रहने वाले लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त कर सकें.डॉक्टर मक्की, पहले एक युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और ख़ारतूम प्रान्त में विशेष शिक्षा विभाग की निदेशक रह चुकी हैं, मगर बमबारी की वजह से उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा.उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि गोलीबारी, धुँए, जलती हुई गाड़ियों, सड़कों पर पड़े हुए शवों के बीच से होकर अपने बच्चों के साथ गुज़रना बहुत मुश्किल था. “मैं उनसे अपने चेहरे ढंकने के लिए कहती थी, ताकि उन्हें यह सब नज़र न आए.”डॉक्टर विदाद अब कम्पाला में रहती हैं और शान्ति व विकास के लिए समर्पित अल-मलाम दारफ़ूर नामक संस्था के लिए कार्यरत हैं.वह अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर इन सामुदायिक रसोइयों को समर्थन देती हैं और शिविर में शरणार्थियों के लिए भोजन की व्यवस्था में जुटी हैं. “हम जीवित बच गए और यहाँ युगांडा में सुरक्षित पहुँचे. और अब हम इस शिविर में अपने सूडानी भाइयों व बहनों की मदद कर रहे हैं.”लेकिन, वह सूडान में संकट के लम्बा खिंचने से चिन्तित भी हैं. “हमारा सबसे बड़ा डर यह है कि यह युद्ध लम्बे समय तक जारी रहेगा. यहाँ इतनी अधिक चुनौतियाँ हैं.”“शिक्षा, रहने का किराया, जीवन व्यापन की क़ीमतें, और न कोई आय या रोज़गार. हम हर दिन सपना देखते हैं कि यह युद्ध रुक जाए और सूडान वापिस लौटें.”शरणार्थी डॉक्टर, सदैव मुस्तैद UN News/Abdelmonem Makki डॉक्टर अब्दुल जब्बार अहमद ऐडम को युगांडा में अपनापन महसूस होता है. डॉक्टर अब्दुल जब्बार अहमद ऐडम, एक चिकित्सक हैं और अब युगांडा के कम्पाला में एक अस्पताल में काम कर रहे हैं.इन शरणार्थी शिविरों से दूर, कम्पाला में तस्वीर बिलकुल अलग नज़र आती है, जहाँ कुछ सूडानी नागरिकों ने अपने करियर को फिर से खड़ा किया है.2023 में युगांडा पहुँचने से पहले, वह ख़ारतूम में एक अस्पताल में काम करते थे. “युगांडा ने मुझे गर्मजोशी से अपनाया. यहाँ काम अच्छा है और कोई भेदभाव नहीं है. हमें अजनबी जैसा महसूस नहीं हुआ है, और हमें सूडान जैसा ही लगता है.”वह अकेले नहीं हैं. सूडान के अनेक चिकित्साकर्मियों को अपने मेज़बान देश में काम करने का अवसर मिला है. कुछ ने अपने क्लीनिक भी खोल लिए हैं.अब्दुल जब्बार ने बताया कि “युगांडा में अच्छे अस्पताल हैं, लेकिन यहाँ कर्मचारियों की क़िल्लत है.” इसलिए, सूडानी चिकित्सकों का यहाँ अहम योगदान रहा है. अनेक राष्ट्रीयताओं के लिए लोग अस्पताल में हमारे पास आते हैं.वह एक आम धारणा को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. “यहाँ आने वाला हर एक व्यक्ति मदद पर निर्भर नहीं है. यहाँ पेशेवर, व्यापारी और विभिन्न क्षेत्रों में हुनर रखने वाले लोग हैं.”व्हाईट हार्ट होटल UN News/Abdelmonem Makki इब्राहिम ज़कारिया याहया, युगांडा में एक आइसक्रीम की दुकान के बाहर बैठे हैं. इब्राहिम ज़कारिया याहया ने विस्थापन के बाद एक लम्बी यात्रा की और फिर जीवन बसाने में जुटे हैं. विस्थापन की नई लहर से पहले ही वह युगांडा के बियाले में आ चुके थे.उन्होंने 2007 के आख़िर में दक्षिण दारफ़ूर को छोड़ा, 2008 में वह युगांडा पहुँचे और फिर कम्पाला में 5 साल रहने के बाद बियाले आए. उनका कहना है कि वह यहाँ पहुँचने वाला पहला सूडानी परिवार था. शुरुआती वर्ष, बहुत कठिन थे. “यहाँ पहुँचने के बाद मुझे बहुत पीड़ा झेलनी पड़ी.” लेकिन धीरे-धीरे, खेती-बाड़ी, व्यापार और सम्पत्ति व्यवसाय से उनका कामकाज बढ़ा है.तीन वर्ष बाद, उन्होंने व्हाईट हार्ट नाम से एक होटल खोला. यह नाम रखने की वजह थी, दिलों व चेतना को शुद्ध करने के लिए एक निमंत्रण, ताकि सूडानी लोग अपनी कड़वाहट भूल सकें, जिससे वह बार-बार होने वाले युद्धों के दौरान गुज़रे हैं.“जो कोई भी यहाँ आता है, वह सच्चे दिल के साथ आता है. हम युद्ध से भागकर चले गए, और हमें एक साथ मिलकर रहना है, ताकि फिर हम एक दिन, सुरक्षित ढंग से घर लौट सकें.”इब्राहिम, युगांडा के प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं. उन्होंने कहा कि भविष्य अनिश्चित है, सेवाओं की क़िल्लत है और बेचैनी कम नहीं होती है, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में.जब तक सूडान में युद्ध का अन्त नहीं होता, लोग इस शरणार्थी शिविर में उसी सादगी, कठिनाई और अन्तहीन कहानियों के साथ अपना जीवन जी रहे हैं.

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