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ईरान युद्ध की आर्थिक मार, क़र्ज़ और अर्थव्यवस्था पर संगठित हुए विकासशील देश

 - World News in Hindi

विकासशील देश, अब क़र्ज़ सम्बन्धी वार्ताओं में अपनी आवाज़ को मज़बूती मिलने की उम्मीद कर रहे हैं. दरअसल, अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) - विश्व बैंक के वार्षिक वसन्त सत्र के दौरान, बुधवार को एक नई पहल शुरू की गई है, जोकि ज्ञान के आदान-प्रदान, बेहतर समन्वय और ऋण से जुड़े विषयों पर सामूहिक रुख़ को बढ़ावा देने पर केन्द्रित है. कैरीबियाई देशों से लेकर प्रशान्त क्षेत्र के द्वीपीय देशों तक, मध्य पूर्व युद्ध के आर्थिक झटके दूर-दूर तक महसूस किए जा रहे हैं, जहाँ तेल की बढ़ती क़ीमतें खाद्य और अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत पर असर डाल रही हैं. इससे कम आय वाले परिवार सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.संयुक्त राष्ट्र के एक विश्लेषण के अनुसार, यह सैन्य टकराव दुनिया भर में 3 करोड़ से अधिक लोगों को ग़रीबी में धकेल सकता है, जिससे वर्षों की विकास प्रगति पर पानी फिर सकता है.इसी सन्दर्भ में, Borrowers’ Platform की स्थापना समयानुकूल मानी जा रही है. यह सदस्य देशों की पहल है, जिसे व्यापार एवं विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (UNCTAD) का समर्थन प्राप्त है.11.7 ट्रिलियन डॉलर का ऋणपिछले एक दशक में विकासशील देशों के लिए क़र्ज़ चुकाने की क़ीमत तेज़ी से बढ़ी है. सबसे कम विकसित देश अपनी आय का लगभग एक-चौथाई हिस्सा बाहरी क़र्ज़दाताओं को चुकाने में ख़र्च कर रहे हैं.कुल 3.4 अरब की आबादी वाले 54 देश ऐसे हैं, जो अब स्वास्थ्य या शिक्षा से अधिक अपनी क़र्ज़ अदायगी पर ख़र्च कर रहे हैं. वर्ष 2024 में, विकासशील देशों पर बाहरी ऋण का बोझ बढ़कर 11.7 ट्रिलियन डॉलर (11 हज़ार 700 अरब डॉलर) तक पहुँच गया.बुधवार को जिस प्लैटफ़ॉर्म को शुरू किए जाने की घोषणा की गई है, वह अपनी विकास प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से गुज़र रहे देशों के लिए उपलब्ध है, जहाँ उनके लिए ज्ञान को साझा करना और सामूहिक आवाज़ व अपेक्षाओं को बुलन्द करना सम्भव होगा. इससे उन्हें अपनी क़र्ज़ सम्बन्धी चुनौतियों से निपटने की क्षमता में भी मदद मिलेगी. UN Women/Ryan Brown विकासशील देशों में खाद्य वस्तुओं में भारी उछाल दर्ज किया गया है. एक 'बड़ी उपलब्धि'...संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने वॉशिंगटन डीसी में इसका उदघाटन करते हुए इसे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक “बड़ी उपलब्धि” क़रार दिया. वर्ष 2025 में, महासचिव द्वारा गठित एक 'ऋण विशेषज्ञ समूह' ने इस मंच का विचार रखा था.यूएन प्रमुख ने इस प्लैटफ़ॉर्म की तुलना ऋणदाता देशों के पुराने समूहों जैसेकि पेरिस क्लब, लंदन क्लब और इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल फ़ाइनेंस से भी की.उन्होंने बताया कि ऋण लेने वाले देशों को अक्सर क़र्ज़ से जुड़ी चर्चाओं से बाहर रखा जाता रहा है, और उन्हें विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में औसतन दोगुने से भी अधिक ब्याज़ दर चुकानी पड़ती है. महासचिव ने कहा कि इससे विकासशील देश आवश्यक वित्तीय संसाधनों तक पहुँच बनाने में स्पष्ट रूप से नुक़सान में रहते हैं, जोकि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के भीतर मौजूद गहरी असमानता का एक और उदाहरण है.यूएन प्रमुख ने मध्य पूर्व युद्ध की वजह से “बढ़ते दबावों” की ओर भी ध्यान केन्द्रित किया. ईंधन क़ीमतों के बढ़ने की वजह से कच्चे माल की लागत बढ़ रही हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि धीमी हो रही है और आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव बढ़ रहा है.उन्होंने कहा कि यह मंच, ऋण लेने वाले देशों को क़र्ज़ पुनर्गठन से जुड़ी विशेषज्ञ जानकारी साझा करने में मदद करेगा, उन्हें अपने ऋणदाताओं के साथ समान स्तर पर बातचीत करने के माध्यम देगा और आगे की चर्चाओं में उन्हें केन्द्र में लाएगा.महासचिव ने कहा कि “विकासशील देश उभरते हुए आर्थिक पक्षकार हैं और वैश्विक व्यवस्था को उसी के अनुसार ढलना होगा.”

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