सीरिया में एक दशक से अधिक समय तक चले गृहयुद्ध के बाद, बीते एक वर्ष में, परिवर्तन सम्बन्धी मुद्दों पर न्याय के क्षे्त्र में ख़ासी प्रगति की है. इससे जवाबदेही तय होने और देश के पुनर्निर्माण की उम्मीदें मज़बूत हुई हैं. इन सबके बीच देश के सामने दरपेश वित्तीय चुनौतियों का सामना करने के लिए वैश्विक समर्थन की भारी ज़रूरत है. दिसम्बर 2024 में असद शासन के पतन के बाद, अपने देश को फिर से खड़ा करने के लिए सीरियाई लोगों के संकल्प की व्यापक सराहना हुई है. मगर विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बनी हुई मानवीय चुनौतियों के बीच इस बदलाव को सही दिशा में आगे बढ़ाने के लिए अन्तरराष्ट्रीय समुदाय का मज़बूत एवं निरन्तर समर्थन बेहद ज़रूरी है.क़ानून के शासन और संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के मुद्दों पर काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषज्ञ टीम, सीरिया में राष्ट्रीय संस्थाओं को युद्ध-सम्बन्धी यौन हिंसा की जाँच और दोषियों के खिलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई मज़बूत करने में सहयोग दे रही है. इसके साथ-साथ, यह टीम क़ानून के शासन से जुड़ी व्यापक व्यवस्थाओं को भी सशक्त बनाने में मदद कर रही है.इस टीम की न्यायिक मामलों की अधिकारी सोफ़िया कान्देयास ने हाल ही में यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में, अब तक हुई प्रगति का उल्लेख किया. साथ ही, उन्होंने उन गम्भीर चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जो अब भी बरक़रार हैं. इनमें सबसे बड़ी चुनौती, युद्ध के दौरान हुई यौन हिंसा के मामलों से निपटना है, चूँकि सीरिया के भीषण गृहयुद्ध में इसका व्यापक और सुनियोजित इस्तेमाल किया गया था.उन्होंने कहा, “यह सचमुच उल्लेखनीय है कि केवल एक वर्ष में सीरियाई लोग इतना कुछ स्थापित करने में सफल रहे.”लेकिन इस प्रगति के पीछे एक बहुत नाज़ुक हक़ीक़त भी है. कमज़ोर संस्थाएँ, गहरा मानसिक आघात, और यह चुनौती अब भी बनी हुई है कि किए गए वादों को समय रहते वास्तविक जवाबदेही में कैसे बदला जाए.संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2254 और 2799 के अनुरूप, सीरिया के नेतृत्व में और सीरियाई स्वामित्व वाली राजनैतिक प्रक्रिया के समर्थन में लगातार काम कर रहा है.नींव से पुनर्निर्माणसुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1888 के तहत वर्ष 2009 में गठित संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ टीम, दिसम्बर 2024 में असद शासन के पतन के बाद से सीरिया में काम कर रही है. उसका उद्देश्य, राष्ट्रीय संस्थाओं को यौन हिंसा और संघर्ष से जुड़े मामलों में क़ानून के शासन पर आधारित न्यायिक प्रतिक्रिया मज़बूत करने में सहयोग देना है.तीन बार तैनात की जा चुकी यह टीम, सीरिया की कई अहम संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर चुकी है. इनमें संक्रमणकालीन न्याय के लिए राष्ट्रीय आयोग, लापता व्यक्तियों के लिए आयोग, कई मंत्रालय और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं. © UNTOE राष्ट्रीय स्तर पर स्वामित्व को मज़बूत करते हुए तकनीकी सहयोग देना इसलिए अहम है, ताकि न्याय से जुड़े प्रयास टिकाऊ बन सकें.सोफ़िया कान्देयास ने कहा, “नागरिक समाज संगठन वास्तव में संक्रमणकालीन न्याय की रीढ़ हैं. पीड़ितों और बचे हुए लोगों की आवाज़ को सच में सुनने का यही एकमात्र रास्ता भी हैं.”सीरिया के नागरिक समाज समूह, वर्षों से मानवाधिकार उल्लंघन दर्ज करते रहे हैं. यही सामग्री भविष्य में मुक़दमों और अभियोजन की प्रक्रिया के लिए अहम साक्ष्य बन सकती है.सुनियोजित और अकल्पनीयसीरिया की न्याय प्रक्रिया के सामने सबसे बड़ी, और सबसे कम दिखाई देने वाली, चुनौतियों में से एक है युद्ध से जुड़ी यौन हिंसा के वास्तविक पैमाने को समझना.सोफ़िया कान्देयास ने कहा, “ईमानदारी से कहें तो हमें इस समस्या के पूर्ण स्तर का अन्दाज़ा ही नहीं है, और शायद कभी पूरी तरह लग भी नहीं पाएगा.”लेकिन जो कुछ सामने आया है, वह बेहद चिन्ताजनक है. उनके अनुसार, पूरे अशान्ति के दौरान हिरासत केन्द्रों में, चौकियों पर और विस्थापन के समय यौन हिंसा का व्यापक और सुनियोजित ढंग से इस्तेमाल किया गया. यह कोई बिखरी हुई या आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि एक जानबूझकर अपनाई गई रणनीति थी.उन्होंने कहा कि दर्ज मामलों से कहीं अधिक घटनाएँ वास्तव में हुई होंगी. सामाजिक कलंक अब भी एक बड़ी रुकावट है, जो भुक्तभोगियों को सामने आने से रोकता है.सोफ़िया कान्देयास ने बल देकर कहा, “यह एक सुनियोजित तंत्र था, और यौन हिंसा का इस्तेमाल नागरिकों को अपमानित करने और दंडित करने के लिए एक सोची-समझी रणनीति के रूप में किया गया.”पुरुष और लड़के भी बने निशानाहालाँकि महिलाओं और लड़कियों पर इसका असर कहीं अधिक पड़ा, लेकिन पुरुषों और लड़कों को भी बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया, ख़ासतौर पर हिरासत के दौरान.एक सीरियाई साझीदार संगठन के आँकड़ों के अनुसार, उसके रिकॉर्ड में शामिल हिरासत में रखे गए 98 प्रतिशत पुरुषों और लड़कों ने यौन हिंसा का सामना करने की बात कही. यह संख्या शायद फिर भी पूरी वास्तविकता नहीं दर्शाती, क्योंकि यह केवल दर्ज मामलों पर आधारित है. © UNOCHA/Ali Haj Suleiman चुप्पी की दीवारसामाजिक कलंक को न्याय के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा माना जाता है.यह कई स्तरों पर असर डालता है. एक तरफ, भुक्तभोगी भीतर ही भीतर शर्म और डर से जूझते हैं. वहीं दूसरी ओर, समुदाय में सच सामने लाने पर अस्वीकार किए जाने का भय होता है. और सामाजिक स्तर पर, चुप्पी अक्सर बनी रहती है. नतीजतन, बहुत से पीड़ित अपनी बात कह ही नहीं पाते.इससे निपटने के लिए, संयुक्त राष्ट्र और उसके साझीदार, ऐसे हालात बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं, जहाँ पीड़ित ख़ुद को सुरक्षित महसूस करें और मदद लेने के लिए आगे आ सकें. इसकी शुरुआत सार्वजनिक स्वीकार्यता एवं एक सक्रिय दृष्टिकोण से होती है, यानि पीड़ितों तक पहुँच बनाना और यह सुनिश्चित करना कि उनके पास सामने आने की सुरक्षित परिस्थितियाँ हों.सोफ़िया कान्देयास ने कहा, “यौन हिंसा की गम्भीरता को स्वीकार करना, और यह मानना कि यह एक अपराध है, सबसे पहले यह स्पष्ट करता है कि दोष पीड़ितों का नहीं, बल्कि अपराध करने वालों का है.”इसके साथ ही, “सुरक्षित स्थानों” का निर्माण भी बेहद ज़रूरी है, जहाँ पीड़ित बिना किसी कलंक या प्रतिशोध के डर के चिकित्सकीय देखभाल, मनोसामाजिक सहयोग और क़ानूनी सहायता प्राप्त कर सकें. हालाँकि, सुरक्षित स्थान का अर्थ हर समुदाय में अलग हो सकता है, इसलिए स्थानीय स्तर पर जुड़ाव और समझ बेहद अहम है.क्षमता के बिना प्रगतिसंस्थागत स्तर पर प्रगति के बावजूद, न्याय दिलाने की सीरिया की क्षमता अब भी बहुत सीमित है. वर्षों के संघर्ष ने देश की चिकित्सकीय, फोरेंसिक और न्यायिक व्यवस्थाओं को गम्भीर रूप से कमज़ोर कर दिया है.पर्याप्त फोरेंसिक क्षमता के बिना, साक्ष्यों को ठीक तरह से एकत्र या सुरक्षित नहीं रखा जा सकता. प्रशिक्षित जाँचकर्ताओं और अभियोजकों के बिना, मामलों को आगे बढ़ाना सम्भव नहीं होता. साथ ही, मनोसामाजिक मदद के अभाव में, पीड़ितों के सामने आने की सम्भावना भी कम हो जाती है.सोफ़िया कान्देयास ने कहा, “हमारी कोशिश है कि नागरिक अपने अधिकारों के लिए न्याय पा सकें, क्योंकि कोई व्यक्ति केवल पीड़ित नहीं होता, वह एक नागरिक भी होता है और बदलाव लाने की क्षमता भी रखता है.”सिमटते अवसरइन चुनौतियों को और गम्भीर बना रही है अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता में हो रही कटौती.पिछले एक वर्ष में नागरिक समाज संगठनों के लिए समर्थन घटा है. इनमें से कई संगठन साक्ष्य जुटाने का काम करते हैं और पीड़ितों तक सीधे सहायता पहुँचाते हैं. राष्ट्रीय संस्थाओं के लिए वित्तीय मदद भी अब भी सीमित बनी हुई है.सोफ़िया कान्देयास के लिए यह रुझान बेहद चिन्ताजनक है.उन्होंने कहा, “एक वर्ष में इतनी प्रगति हुई है, अब ज़रूरी है कि तकनीकी समर्थन भी उपलब्ध हो. बुनियादी काम सीरियाई लोगों ने कर दिया है, लेकिन अब हमें और सेवाओं की आवश्यकता है.” © UNFPA Syria ख़तरा केवल ठहराव का नहीं, बल्कि अब तक हुई प्रगति के उलट जाने का भी है.यदि ज़रूरी संसाधन उपलब्ध नहीं होते, तो साक्ष्य खो सकते हैं, पीड़ित इस प्रक्रिया से दूर हो सकते हैं, और नई उभरती संस्थाओं पर शुरुआती भरोसा भी कमज़ोर पड़ सकता है. इससे जवाबदेही तय करने के प्रयास कई वर्ष पीछे जा सकते हैं.निर्णायक क्षणसीरिया इस समय एक बेहद अहम मोड़ पर खड़ा है.संक्रमणकालीन न्याय के क्षेत्र में बीते समय में हुई तेज़ प्रगति, वर्षों के टकराव के बाद जवाबदेही तय करने का एक दुर्लभ अवसर देती है. लेकिन यह अवसर अब भी नाज़ुक है, और इसकी सफलता लगातार मिलते रहने वाले समर्थन पर निर्भर करती है.सोफ़िया कान्देयास ने कहा, “निवेश करने का समय यही है. सीरियाई लोगों ने जो नींव रखी है, उसे ठोस नतीजों तक पहुँचाने में हम विफल नहीं हो सकते.”
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