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हाशिए पर जीवन जीने वालों के लिए, डिजिटल खाई व धन कटौती से बढ़ा संकट

 - World News in Hindi

आज की दुनिया में, डिजिटल उपकरण हर क्षेत्र में कामकाज के तरीके़ को बदल रहे हैं, चाहे वह शरणार्थियों की निगरानी हो या बुज़ुर्गों की देखभाल. मगर, जनसंख्या के भविष्य पर इस सप्ताह यूएन मुख्यालय में हो रही चर्चा के दौरान दो बड़ी चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं: वित्तीय कमी और नई तकनीक तक पहुँच रखने वालों व उससे वंचित लोगों के बीच बढ़ता अन्तर. संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में, 13 से 17 अप्रैल 2026 तक आयोजित जनसंख्या और विकास आयोग के नए सत्र की चर्चाओं का केन्द्र रहेगी: तकनीक की भूमिका.लगभग दो दशकों से नाइजीरिया अपने अशान्त पूर्वोत्तर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विस्थापन की समस्या से जूझ रहा है, जहाँ लगभग 20 लाख लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं.इस मानवीय संकट से निपटना एक बड़ी चुनौती है, जिसे जलवायु आपदाएँ, बीमारियों के प्रकोप और घटते सहायता बजट और जटिल बना रहे हैं.ऐतिहासिक रूप से, विस्थापित लोगों के बारे में विश्वसनीय जानकारी की कमी ने उनकी मदद के प्रयासों को बाधित किया है.प्रौद्योगिकी की बढ़ती अहमियतलेकिन, हाल के वर्षों में देशों की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र प्रवासन एजेंसी (IOM) द्वारा विकसित Displacement Tracking Matrix का उपयोग किया है, जिससे आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों की संख्या, उनके स्थान और उनकी विशेष ज़रूरतों का सटीक आकलन सम्भव हुआ है.आज यह उपकरण दुनिया के क़रीब 91 देशों में नीति-निर्माताओं और मानवीय सहायता कर्मियों की मदद कर रहा है, जो जनसंख्या से जुड़े शोध में तकनीक की बढ़ती अहमियत को दर्शाता है. © IOM/François-Xavier Ada हालाँकि, ऐसे डिजिटल उपकरण जानकारी तक पहुँच बढ़ा रहे हैं, लेकिन वे नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न कर रहे हैं, जिनमें बढ़ती डिजिटल खाई, डेटा गोपनीयता के ख़तरे, ग़लत जानकारी का प्रसार और तकनीक के ज़रिए होने वाली हिंसा शामिल है.इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी इस सत्र के दौरान चर्चा की जाएगी.जीवन में बदलावये चर्चाएँ, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश की तीन रिपोर्टों के इर्दगिर्द केन्द्रित रहेंगी.पहली रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल उपकरण किस तरह स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोज़गार और जानकारी तक पहुँच को बदल रहे हैं. चिकित्सा तकनीक, जीवन प्रत्याशा बढ़ा रही है, जबकि काम और संचार के बदलते तरीक़ों का असर इस बात पर पड़ रहा है कि लोग कहाँ रहते हैं, बच्चों का जन्म कब होता है और परिवार कैसे बनते हैं.यूए प्रमुख ने यह भी चेतावनी दी है कि अनेक लोग अब भी इंटरनैट, डिजिटल सेवाओं और आधुनिक स्वास्थ्य तकनीकों तक पहुँच से वंचित हैं, ख़ासकर कम आय वाले देशों, ग्रामीण क्षेत्रों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों तक.ये अन्तर देशों के बीच और उनके भीतर असमानता को और गहरा कर सकते हैं. महिलाओं, बुजु़र्गों और विकलांग व्यक्तियों पर इसका असर सबसे अधिक पड़ता है. UN Women बायोनिक्स टैक्नॉलॉजी से प्रोस्थेटिक्स को एआई टूल का उपयोग करके बनाया गया. दूसरी रिपोर्ट, वृद्ध होती आबादी व बुजु़र्गों की देखभाल सेवाओं और सहायक तकनीकों की बढ़ती ज़रूरत पर केन्द्रित है. इसके लिए देशों को अपनी इंटरनैट संरचना मज़बूत करनी होगी, डिजिटल उपकरणों का विस्तार करना होगा और विज्ञान व प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाना होगा.अनेक देशों ने महामारी और प्राकृतिक आपदाओं जैसे संकट के समय प्रवासन और मानवीय ज़रूरतों को बेहतर समझने के लिए नवाचारी डिजिटल स्वास्थ्य पहलें शुरू की हैं.उदाहरण के तौर पर, बांग्लादेश की mHealth परियोजना, एसएमएस के जरिए माताओं को स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह से जोड़ती है. भारत का eSanjeevani मंच, 15 करोड़ से अधिक टैलीमेडिसिन सत्रों का आयोजन कर चुका है, जबकि नेपाल का, UNFPA द्वारा विकसित - SITA AI, राष्ट्रीय आँकड़ों का तेज़ी से विश्लेषण करके, विस्तृत रिपोर्ट और संक्षिप्त जानकारी तैयार करता है.वित्तीय संकट2023 के बाद, से अन्तरराष्ट्रीय विकास के लिए वित्तीय सहायता में तेज़ गिरावट आई है, जिसका प्रभाव ख़ासतौर पर कम और मध्यम आय वाले देशों में जनसंख्या से जुड़े कार्यक्रमों पर पड़ा है.तीसरी रिपोर्ट इसी गिरावट को रेखांकित करती है, जिसमें तकनीक और शोध के लिए मिलने वाली सहायता में कमी भी शामिल है. यह एक चिन्ताजनक प्रवृत्ति है, जो ज्ञान, कौशल और नवाचार क्षमता में वैश्विक असमानताओं को और बढ़ा रही है.महासचिव ने चेतावनी दी है कि मौजूदा धन कटौती का स्तर, जनसंख्या और विकास पर आयोग के लक्ष्यों को हासिल करने और 2030 के सतत विकास एजेंडा को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.उन्होंने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य, जनसंख्या डेटा, शोध और तकनीक पर केन्द्रित अधिक मज़बूत और स्थिर वित्तीय समर्थन की अपील की है, विशेषकर सबसे निर्धन और संवेदनशील देशों के लिए.

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