संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और उनके साझीदारों ने कहा है कि सूडान आज भी दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय और विस्थापन संकट बना हुआ है. एजेंसियों ने देश में युद्धरत प्रतिद्वन्द्वी सैन्य बलों के बीच जारी युद्ध को तत्काल समाप्त करने की अपील की. ध्यान रहे कि सूडान में युद्ध चौथे वर्ष में दाख़िल होने वाला है और इसके रुकने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.
आपात राहत मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र समन्वयक टॉम फ़्लैचर ने, बर्लिन से जारी एक वक्तव्य में कहा है, “आत्ममन्थन के लिए मजबूर करने वाला यह दुख़द पड़ाव, एक और ऐसे वर्ष की याद दिलाता है जब दुनिया सूडान की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी.”उन्होंने यह बात बुधवार को युद्ध समाप्त करने के प्रयासों के तहत होने वाली अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की एक अहम बैठक के सन्दर्भ में कही.15 अप्रैल 2023 को सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) और उनके पूर्व सहयोगी त्वरित समर्थन बलों (RSF) के बीच शुरू हुए घातक युद्ध के कारण, देश में लगभग 3 करोड़ 40 लाख लोग, यानि आबादी का क़रीब 65 प्रतिशत, तत्काल मानवीय सहायता पर मोहताज हो गए हैं.
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विस्थापन का विशाल संकटलगभग 1 करोड़ 40 लाख लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं. इनमें से 90 लाख लोगों ने देश के भीतर ही दूसरी जगहों पर शरण ली है, जबकि 44 लाख लोग सीमा पार चाड, मिस्र और दक्षिण सूडान जैसे पड़ोसी देशों में चले गए हैं.संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी, UNHCR के अनुसार ये पड़ोसी देश अब अपनी “क्षमता के कगार” तक पहुँच चुके हैं.हालाँकि लगभग 40 लाख लोग अपने समुदायों में लौटना शुरू कर चुके हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र प्रवासन एजेंसी IOM की ज़ोई ब्रेनन ने जिनीवा में पत्रकारों से कहा कि लौटने पर उन्हें टूटी हुई जल प्रणालियाँ, भारी तबाही, और बुनियादी आश्रय व स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है.‘कोई अन्त नज़र नहीं आ रहा’विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी कहा है, “सूडान का संकट लगातार गहराता जा रहा है और इसका कोई अन्त नज़र नहीं आ रहा.”वहीं विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के आपात तैयारी और जवाबी कार्रवाई निदेशक रॉस स्मिथ ने रोम से कहा, “देश के कुछ हिस्सों में अकाल जैसी स्थिति को दो वर्ष हो चुके हैं, और आज के दौर में यह पूरी तरह अस्वीकार्य है.”उन्होंने कहा, “लाखों सूडानी लोग हर दिन भोजन, सुरक्षा और बुनियादी गरिमा के लिए संघर्ष कर रहे हैं. परिवारों के पास हालात से निपटने के साधन लगभग ख़त्म हो चुके हैं. माता-पिता को बच्चों को भोजन खिलाने के लिए ख़ुद भूखे पेट रहना पड़ा रहा है - बच्चे भूखे रह रहे हैं.”मध्य पूर्व युद्ध का असरउन्होंने कहा कि दारफ़ूर और कोर्दोफ़ान के उन इलाक़ों में अकाल की पुष्टि हो चुकी है, जहाँ लड़ाई सबसे ज़्यादा भयंकर है. लेकिन सूडान का यह व्यापक संकट अब दुनिया भर में बढ़ती अस्थिरता और मध्य पूर्व में हाल में भड़के युद्ध के कारण और भी गहरा रहा है.उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान युद्ध के कारण समुद्री आपूर्ति मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिससे खाद्य पदार्थों, ईंधन और उर्वरकों की लागत बढ़ रही है. सूडान इन अहम वस्तुओं का आयात करता है और इन पर उसकी भारी निर्भरता है.उन्होंने कहा, “ईंधन की क़ीमतें औसतन 24 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं. कुछ दूरदराज़ इलाक़ों में यह बढ़ोतरी इससे भी कहीं ज़्यादा है. इसका असर ज़रूरी वस्तुओं और खाद्य सामग्री की क़ीमतों पर पड़ेगा, जिससे और अधिक लोग भूख की चपेट में आ सकते हैं.”महिलाओं के ख़िलाफ़ युद्धसंयुक्त राष्ट्र की लैंगिक समानता एजेंसी, UN Women के अनुसार सूडान के सशस्त्र युद्ध के भीतर एक और लड़ाई चल रही है, जिसका सबसे गहरा असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ रहा है.पूर्वी और दक्षिणी अफ़्रीका के लिए क्षेत्रीय निदेशक एन्ना मुतावाती ने बर्लिन में कहा, “जब हम सूडान में युद्ध के चौथे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तो यह स्पष्ट रूप से कहना ज़रूरी है कि इसके महिलाओं और लड़कियों के लिए क्या मायने हैं, क्योंकि अन्ततः इसका ख़ामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ता है.”UN Women की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यौन एवं लैंगिक आधारित हिंसा से जुड़ी सहायता की आवश्यकता 1 करोड़ 27 लाख लोगों को है, जिनमें अधिकतर महिलाएँ और लड़कियाँ हैं. वर्ष 2023 में यह संख्या 31 लाख थी.एन्ना मुतावाती ने कहा कि व्यापक हत्याएँ, बड़े पैमाने पर विस्थापन, और विशेष रूप से यौन हिंसा का इस्तेमाल, सूडान के युद्ध की बुनियादी संरचना का हिस्सा बन चुका है.
© UNICEF/Ahmed Elfatih Mohamdee
बच्चों पर गहराता संकटइस बीच, यूनीसेफ़ की संचार प्रमुख ईवा हाइंड्स ने कहा कि सूडान में बच्चों के लिए हालात हर घंटे और भी बदतर होते जा रहे हैं.युद्ध शुरू होने के बाद से 4,300 से अधिक बच्चे मारे गए हैं या घायल हुए हैं, और बच्चों के ख़िलाफ़ गम्भीर उल्लंघन के 5,700 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं.इस युद्ध की सबसे भारी मार छोटे बच्चों पर पड़ रही है. बच्चों की मौत और घायल होने के 80 प्रतिशत मामलों के लिए ड्रोन हमले ज़िम्मेदार हैं.इस वर्ष के पहले तीन महीनों में ऐसे कम से कम 245 मामले दर्ज किए गए, जिनमें अधिकतर दारफ़ूर और कोर्दोफ़ान में सामने आए. यह संख्या 2025 की इसी अवधि की तुलना में बहुत अधिक है.ड्रोन हमलों से बढ़ती पीड़ाउन्होंने कहा कि युद्ध क्षेत्र से दूर भी ड्रोन हमले जारी हैं. लड़कियाँ और लड़के अपने घरों में, बाज़ारों में, सड़कों पर, स्कूलों और स्वास्थ्य केन्द्रों के पास मारे जा रहे हैं या घायल हो रहे हैं. ये वे जगहें हैं, जिन्हें कभी निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए.संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, इस वर्ष के पहले तीन महीनों में ड्रोन हमलों में लगभग 700 नागरिकों के मारे जाने की ख़बर है.अफ़्रीका में अन्तरराष्ट्रीय रैड क्रॉस समिति के उप-क्षेत्रीय निदेशक जेम्स रेनॉल्ड्स ने कहा कि नागरिकों को नुक़सान पहुँचाने के अलावा, ड्रोन और अन्य नई तकनीकें “महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रही हैं और मानवीय राहत कार्यों में भी बाधा डाल रही हैं.”उन्होंने कहा कि युद्ध प्रभावित इलाक़ों में स्वास्थ्य ढाँचे का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा या तो काम नहीं कर रहा है, या फिर संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहा है. साथ ही, संचार नैटवर्क का बड़ा हिस्सा भी तबाह हो चुका है.कूटनैतिक प्रयास और सहायता की अपीलयुद्ध लगातार जारी है, और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश तत्काल युद्धविराम, निर्बाध मानवीय पहुँच, और अपने घरों से सुरक्षित निकलना चाहने वाले लोगों के लिए सुरक्षित मार्ग मुहैया करवाने की अपील दोहराते रहे हैं.उनके निजी दूत पेक्का हाविस्तो कूटनैतिक प्रयासों में जुटे हुए हैं. वह पिछले सप्ताह केनया में थे, जहाँ उन्होंने सूडानी सशस्त्र समूहों, नागरिक राजनैतिक पक्षों और अन्य सम्बन्धित पक्षों के साथ बातचीत की, जो उपयोगी रही.वह बर्लिन सम्मेलन में भी शामिल होंगे. संयुक्त राष्ट्र के मानवीय राहत प्रमुख टॉम फ़्लैचर भी इसमें भाग लेंगे. उन्होंने अपने वक्व्य में सूडान तक जीवनरक्षक सहायता पहुँचाने के लिए अधिक समर्थन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया.मानवीय संगठनों का लक्ष्य इस वर्ष 2 करोड़ लोगों तक सहायता पहुँचाने का है, जबकि 2025 में यह लक्ष्य 1 करोड़ 70 लाख लोगों का था. लेकिन इसके लिए बनाई गई लगभग 3 अरब डॉलर की योजना अब भी गम्भीर रूप से धन की कमी से जूझ रही है.उन्होंने तत्काल कार्रवाई की अपील करते हुए कहा कि अब समय है “हिंसा रोकने, नागरिकों की रक्षा करने, सबसे अधिक ख़तरे में फँसे समुदायों तक पहुँच सुनिश्चित करने, और राहत कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने की.”
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