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कला के रंगों में उम्मीद - रोहिंग्या महिलाओं की बदलती दुनिया

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बांग्लादेश में कॉक्सेस बाज़ार के शरणार्थी शिविरों में जीवन आसान नहीं है. वर्षों से विस्थापन, संसाधनों की कमी और अनिश्चितता के बीच रह रही रोहिंग्या महिलाएँ और लड़कियाँ अपने दैनिक जीवन में नई चुनौतियों का सामना करती हैं. फिर भी इन कठिन हालात में उन्होंने उम्मीद का एक अनोखा रास्ता खोज लिया है: कला. कॉक्सेस बाज़ार में रोहिंग्या शरणार्थी, क़रीब 9 वर्षों से मानवीय संकट से जूझ रहे हैं और सहायता प्रयासों के लिए धनराशि की भारी कमी बनी हुई है, जबकि वहाँ विशाल ज़रूरतें हैं. महिलाओं और लड़कियों की संख्या शरणार्थी आबादी में 50 फ़ीसदी से अधिक है और वे सबसे अधिक असुरक्षित समूहों में हैं. अकेले बच्चों की देखभाल करने वालों में 96 प्रतिशत महिलाएँ हैं. जोखिम का सामना कर रहे बच्चों में 91 प्रतिशत लड़कियाँ हैं, जबकि ऐसे बुज़ुर्गों में 70 प्रतिशत महिलाएँ हैं. गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों में 57 प्रतिशत महिलाएँ हैं.ऐसे हालात में कला, उनके लिए उम्मीद और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन गई है. शरणार्थी शिविरों की खाली दीवारें अब रंगीन भित्ति-चित्रों से भर गई हैं. इन चित्रों में दर्द, यादें, सपने और भविष्य की आकांक्षाएँ एक साथ दिखाई देती हैं.महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था (UN Women) 8 बहुउद्देश्यीय महिला केन्द्रों और एक महिला बाज़ार के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा और सशक्तिकरण सेवाएँ मुहैया करा रहा है. यह पहल ऑस्ट्रेलिया सरकार के विदेश मामलों और व्यापार विभाग तथा बांग्लादेश में स्विट्ज़रलैंड व स्वीडन के दूतावासों के सहयोग से चल रही है. इन्हीं स्थानों पर 25 नवम्बर से 10 दिसम्बर 2025 तक लिंग आधारित हिंसा के विरुद्ध 16 दिनों के अभियान के दौरान भित्ति-चित्र कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसमें प्रतिभागियों को ऑनलाइन सुरक्षा की जानकारी दी गई और उन्हें खुलकर अपनी बात रखने का अवसर मिला. © UN Women/Sanjida Rahman कॉक्सेस बाज़ार के बहुउद्देश्यीय महिला केन्द्र में रोहिंग्या किशोरियाँ, भित्ति-चित्र बनाने की गतिविधि में भाग लेती हुई. सामुदायिक भागेदारीयह पहल पूरी तरह सामुदायिक भागेदारी पर आधारित थी. महिलाओं ने चरणबद्ध तरीक़े से रंग भरना, रंग मिलाना और बारीक़ विवरण तैयार करना सीखा. साथ ही उन्हें सन्देश देने वाली कला एवं कौशल विकास का प्रशिक्षण मिला. इससे उनमें आत्मविश्वास, स्वामित्व और नेतृत्व की भावना बढ़ी.UN Women से जुड़ी छह युवा पेशेवर कलाकारों ने 42 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया. उन्होंने आपस में मिलकर तीन स्थानों पर 12 भित्ति-चित्र बनाए. प्रवेश द्वारों, प्रशिक्षण कक्षों, बैठक कक्षों, भोजन क्षेत्र और बाहरी दीवारों पर बने ये चित्र अब शिविर की पहचान बन चुके हैं. © UN Women/Sanjida Rahman कॉक्सेस बाज़ार में महिला बाज़ार के प्रशिक्षण कक्ष के प्रवेश द्वार पर लगभग पूरे हो चुके भित्ति-चित्र के पास खड़ी एक रोहिंग्या महिला दुकानदार. 20 वर्षीय स्वयंसेविका सूफ़िया (सुरक्षा कारणों से बदला हुआ नाम) कहती हैं. “मैं हमेशा सोचती थी कि बड़े पैमाने पर पेंटिंग करना पुरुषों का काम है.” प्रशिक्षण के बाद उनका दृष्टिकोण बदल गया. वे बताती हैं. “अब हर रंग की रेखा मेरे लिए आत्मविश्वास और अपनत्व का प्रतीक है. इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि मैं वास्तविक और ऑनलाइन दोनों जगहों पर किस तरह से सुरक्षित रह सकती हूँ.”महिला बाज़ार में काम करने वाली एक दुकानदार के लिए यह पहल सिर्फ़ कला ही नहीं, बल्कि जीवन का नया अवसर है. “मैं सप्ताह में पाँच दिन यहाँ काम करती हूँ. यह जगह मेरे लिए सुरक्षित है. हममें से कई ने पहले कभी पेंटिंग नहीं की थी, लेकिन यह अनुभव बहुत मज़ेदार रहा. हमने मिलकर बाज़ार को सुन्दर बनाया और मैंने मोबाइल फोन का सुरक्षित इस्तेमाल करना भी सीखा.” © UN Women/Sanjida Rahman कॉक्सेस बाज़ार के महिला बाज़ार के कैफ़े में एक दुकानदार, कलाकार से भित्ति-चित्र की आधार परत लगाना सीखती हुई. नया आत्मविश्वासमहिला बाज़ार अब सिर्फ़ रोज़गार का स्थान नहीं रहा. यह रचनात्मकता, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक जुड़ाव का केन्द्र बन गया है. भित्ति-चित्रों ने न केवल दीवारों को बदला, बल्कि महिलाओं की सोच और आत्मविश्वास को भी नया रंग दिया.यह पहल दिखाती है कि कला किस तरह से सामाजिक बदलाव का माध्यम बन सकती है. खाली दीवारों से रंगीन चित्रों तक का सफ़र, महिलाओं के साहस, रचनात्मकता और सामूहिक शक्ति की कहानी कहता है. यूएन वीमैन के सहयोग से चल रहे ‘गर्ल शाइन’ कार्यक्रम की किशोरियों ने भी इसमें हिस्सा लिया. शुरुआत में झिझक थी, आत्मविश्वास कम था. लेकिन साथ काम करने से उनमें अपनत्व और सामूहिक ताक़त की भावना पैदा हुई. रंगों और चित्रों के ज़रिए उन्होंने अपनी यादों और भावनाओं को व्यक्त करना सीखा. पेशेवर कलाकारों के साथ काम करना उनके लिए उत्साहजनक अनुभव रहा. आज ये भित्ति-चित्र फोटो खिंचवाने की पसन्दीदा पृष्ठभूमि बन चुके हैं.इन दीवारों पर बने रंग सिर्फ़ सजावट नहीं हैं. वे आवाज़ हैं, पहचान हैं, उम्मीद हैं. वो याद दिलाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी रचनात्मकता और एकजुटता, बदलाव की राह खोल सकती है.यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ. © UN Women/Sanjida Rahman कॉक्सेस बाज़ार के बहुउद्देश्यीय महिला केन्द्र की स्वयंसेविकाएँ, बाहरी दीवार पर भित्ति-चित्र बनाती हुई.

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