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शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए ज़रूरी हैं समझदारी, न्याय और मानवाधिकार

 - World News in Hindi

अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था, “शान्ति को ताक़त के बल क़ायम नहीं रखा जा सकता, शान्ति को केवल समझ के माध्यम से ही हासिल किया जा सकता है.” आज, 28 जनवरी को शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर इसी सन्देश पर ज़ोर दिया जा रहा है. शान्ति का अर्थ है: भिन्नताओं व भिन्न विचारों के बीच साथ रह सकने की क्षमता. चाहे ये भिन्नताएँ लिंग, नस्ल, भाषा, धर्म या संस्कृति से जुड़ी हों, लेकिन शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व तब ही सम्भव है जब न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए. ऐसे समय में, जबकि वैश्विक स्तर पर युद्ध, अस्थिरता और हिंसा के हालात लगातार गहराते जा रहे हैं, यह दिवस, शान्ति की उस व्यापक अवधारणा की याद दिलाता है, जो केवल युद्ध की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है.यह कोई एक-दिवसीय लक्ष्य नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है, जिसे बनाए रखने के लिए निरन्तर सजगता, सम्वाद और समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागेदारी आवश्यक है.संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडा के पाँच प्रमुख स्तम्भों यानि इनसान, पृथ्वी, समृद्धि, साझेदारी और शान्ति में शान्ति को केन्द्रीय स्थान दिया गया है.एजेंडा की प्रस्तावना स्पष्ट करती है कि भय और हिंसा से मुक्त, शान्तिपूर्ण, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के बिना सतत विकास की कल्पना अधूरी है.हर वर्ग की सक्रिय भागेदारी ज़रूरीवैश्विक स्तर पर बढ़ते युद्धक माहौल के बीच, शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का यह अन्तरराष्ट्रीय दिवस, विविध संस्कृतियों, मूल्यों, जीवन-शैलियों और विश्वासों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का एक अहम मंच प्रदान करता है.साथ ही, यह सहिष्णुता और आपसी समझ को मज़बूत करने में शिक्षा की भूमिका का भी ज़िक्र करता है.यह दिवस अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक उद्देश्यों और सिद्धान्तों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर भी देता है.वे सिद्धान्त, जिन्हें वर्षों में विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय समझौतों और घोषणाओं के माध्यम से स्थापित किया गया है. © UNIFIL नीली रेखा, इसराइल और लेबनान के बीच शान्ति बलों द्वारा निगरानी वाला क्षेत्र है. आपसी सम्मान और सहिष्णुता को बढ़ावाइसी क्रम में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने, 4 मार्च 2025 को एक प्रस्ताव (A/RES/79/269) अपनाते हुए, 28 जनवरी को ‘शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया था.प्रस्ताव में सदस्य देशों और अन्य हितधारकों की भूमिका पर विशेष ज़ोर दिया गया है, ताकि धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता, मानवाधिकारों, आपसी सम्मान और सहिष्णुता को बढ़ावा दिया जा सके.इसके साथ ही, सभी देशों, अन्तरराष्ट्रीय संगठनों, नागरिक समाज और मीडिया से अपील की गई है कि वे इस दिवस को सार्थक गतिविधियों के माध्यम से मनाएँ, जिससे शान्ति, समावेशन, आपसी समझ और एकजुटता की संस्कृति को मज़बूती मिल सके.ऐसे दौर में, जब विभाजन और टकराव की आवाज़ें तेज़ होती जा रही हैं, शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का यह दिवस याद दिलाता है कि टिकाऊ शान्ति का रास्ता शक्ति से नहीं, बल्कि सम्वाद, समझ और साझा मानवीय मूल्यों से होकर ही गुज़रता है.

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