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'हम बच्चों ने ऐसी चीज़ें देखीं, जो किसी भी इनसान को कभी नहीं देखनी पड़ें,' हॉलोकॉस्ट भुक्तभोगी

 - World News in Hindi

हॉलोकॉस्ट भुक्तभोगी मैरियॉन ब्लूमेनथाल लाज़ान ने नात्सी उत्पीड़न के तहत अपने बचपन के अनुभवों का अत्यन्त मार्मिक और हृदयविदारक वर्णन, यूएन मुख्यालय में दुनिया के सामने साझा किया है. उन्होंने 28 जनवरी को' हॉलोकॉस्ट स्मरण दिवस' पर दुनिया भर के लोगों से आग्रह किया कि वे ‘नकारात्मकता’ का सामना प्रेम, सम्मान और करुणा के साथ करें. लाज़ान ने, जर्मनी के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में स्थित होया शहर में अपने परिवार के ‘सुखद’ जीवन से लेकर नैदरलैंड्स के एक हिरासत शिविर, और फिर जनवरी 1944 में बर्गन-बेलसेन यातना शिविर में बन्द किए जाने तक की यात्रा की यादें बयान कीं. अमानवीय और चरम परिस्थितियों के बीच भी उनका अडिग साहस, प्रसिद्ध लेखक और हॉलोकॉस्ट से बचे विक्टर फ्रैंकल के शब्दों की याद दिलाता है, जिन्होंने कहा था, “मनुष्य से सब कुछ छीना जा सकता है, सिवाय एक चीज़ के…किसी भी परिस्थिति में अपने दृष्टिकोण को चुनने की स्वतंत्रता.”मैरियॉन लाज़ान ने आज की दुनिया को सम्बोधित करते हुए कहा, “हम एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, किस तरह पेश आते हैं और कैसे हाथ बढ़ाते हैं, यह पूरी तरह हमारे ऊपर निर्भर करता है.” UN Photo/Evan Schneider मैरियॉन लाज़ान के शब्दों में उनकी कहानी:1930 के शुरुआती वर्षों में, मैं जर्मनी के एक छोटे शहर होया में, अपने दादा-दादी, माता-पिता और भाई के साथ आरामदेह जीवन जी रही थी.1935 में, जब मैं केवल एक वर्ष की थी, न्यूरेम्बर्ग क़ानून बनाए गए, जिनके तहत यहूदियों के अधिकारों को गम्भीर रूप से सीमित कर दिया गया. इसके बाद हमारी ज़िन्दगी पूरी तरह बदल गई और मेरे माता-पिता ने देश छोड़ने का फै़सला किया.9 नवम्बर 1938 को क्रिस्टलनाख़्त (Kristallnacht) की घटना हुई. हमारे अपार्टमेंट में तोड़-फोड़ की गई, लेकिन सबसे भयावह यह था कि मेरे पिता को जबरन जर्मनी के बुचेनवाल्ड यातना शिविर ले जाया गया.तीन सप्ताह बाद मेरे पिता को रिहा किया गया, और वह भी केवल इसलिए क्योंकि अमेरिका प्रवास के लिए हमारे दस्तावेज़ पूरे थे.हॉलैंड में फँसेजनवरी 1939 में हम हॉलैंड चले गए, जहाँ से हमें अमेरिका के लिए जहाज़ की यात्रा करनी थी. लेकिन उसी वर्ष दिसम्बर में, हमें अमेरिका जाने की प्रतीक्षा में डच हिरासत शिविर वेस्टरबोर्क भेज दिया गया. डच प्रशासन के तहत वेस्टरबोर्क शिविर की परिस्थितियाँ किसी हद तक सहनीय थीं.लेकिन मई 1940 में जर्मनी ने हॉलैंड पर हमला कर दिया और हम वहीं फँस गए.नात्सी एसएस ने वेस्टरबोर्क की कमान सम्भाल ली. हमारे चारों ओर, काँटेदार तारों की 12 फुट ऊँची भयावह बाड़ लगा दी गई, जो हर समय डर का अहसास कराती थी. फिर 1942 में, पूर्वी योरोप के यातना और मृत्यु शिविरों के लिए, लोगों का भयानक निर्वासन शुरू हुआ.हर सोमवार रात, निर्वासन के लिए चुने गए लोगों की सूची लगाई जाती थी, जिससे शिविर में असहनीय बेचैनी, पीड़ा और भय फैल जाता था.और, फिर हर मंगलवार सुबह, पुरुषों, महिलाओं और छोटे बच्चों को पास के रेलवे प्लैटफॉर्म तक मार्च करवाकर ले जाया जाता था, जहाँ से उन्हें ट्रेन में भरकर भेज दिया जाता था. यह स्थान बाद में Boulevard de misère यानि दुख की सड़क के नाम से जाना गया.वेस्टरबोर्क से रवाना किए गए 1 लाख 20 हज़ार पुरुषों, महिलाओं और बच्चों में से, 1 लाख 2 हज़ार लोग कभी वापस नहीं लौटे.जनवरी 1944 में हमारी बारी आई. मुझे आज भी याद है…कड़ाके की ठंड, घोर अँधेरा और बारिश से भरी वह रात, जब हम जर्मनी के बर्गन-बेलसेन यातना शिविर पहुँचे. UN Photo/Mark Garten निरन्तर भय के साए में जीवनहमें मवेशियों के डिब्बों से घसीटकर बाहर निकाला गया और सामने जर्मन पहरेदार खड़े थे, जो हम पर चिल्ला रहे थे, हथियारों के साथ धमकी दे रहे थे और उनके साथ बेहद आक्रामक, डरावने कुत्ते थे.मैं उस समय सिर्फ़ 9 साल की बच्ची थी और बहुत डरी हुई थी. आज भी, जब कभी जर्मन शेफ़र्ड कुत्ता देखती हूँ, तो मेरे भीतर डर की एक लहर दौड़ जाती है.हममें से 600 लोगों को लकड़ी की कच्ची, बिना गर्मी वाली बैरकों में ठूँस दिया गया, जिन्हें मूल रूप से केवल 100 लोगों के लिए बनाया गया था. वहाँ तीन-तीन मंज़िल की चारपाइयाँ थीं और हर बिस्तर पर दो लोग सोते थे.जर्मनी की सर्दियाँ बेहद कठोर और लम्बी होती हैं. हर बिस्तर के लिए सिर्फ़ एक पतला कम्बल और भूसे से भरा एक गद्दा दिया गया था. मुझे एक वाहन याद है, जिसमें मुझे लगा कि लकड़ियाँ भरी हैं. मगर जल्द ही समझ में आ गया कि उसमें नग्न मृत शरीर एक-दूसरे के ऊपर फेंक दिए गए थे.वहाँ शौचालय लकड़ी के लम्बे तख़्तों जैसे थे, जिनमें एक के बाद एक छेद बने थे. कोई निजता नहीं थी, न टॉयलेट पेपर, न साबुन और न ही पर्याप्त पानी. बर्गन-बेलसेन में लगभग डेढ़ साल के दौरान हम एक बार भी दाँत नहीं ब्रश कर पाए.हर सुबह हमें एक बड़े मैदान में पंक्तियों में खड़ा होने का आदेश दिया जाता था, जिसे अपेलप्लात्स (appellplatz) कहा जाता था. हमें पाँच-पाँच की क़तारों में गिना जाता था. जब तक हर एक व्यक्ति की गिनती पूरी नहीं हो जाती, तब तक हमें वहीं खड़ा रहना पड़ता था…अकसर सुबह से देर रात तक, बिना भोजन, बिना पानी.गरमाहट के लिए मूत्र का प्रयोगमौसम चाहे जैसा भी हो, हमारे पास सुरक्षा के लिए कोई कपड़े नहीं होते थे. शीतदंश (Frostbite) आम बात थी. हम, ठंड से प्रभावित अपने पाँव की उँगलियों और हाथों की उँगलियों को अपने ही मूत्र की गरमाहट से ठीक करने की कोशिश करते थे.हमारे भोजन में, दिन भर में बस ब्रैड का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गरम, पानी जैसा पतला सूप मिलता था. बाद में ब्रैड भी कम कर दी गई और सप्ताह में सिर्फ़ एक बार दी जाने लगी…वह भी तब ही, जब हमारे रहने की जगह साफ़-सुथरी और व्यवस्थित मानी जाती.हमें, महीने में एक बार नहलाने के लिए एक जगह ले जाया जाता था. वहाँ पहरेदारों की कड़ी निगरानी में हमें कपड़े उतारने का आदेश दिया जाता. मैं बेहद डरी रहती थी…यह नहीं जानती थी कि नलों से पानी निकलेगा या गैस.हम हमेशा भूखे रहते थे, प्यासे रहते थे और दर्द में रहते थे, लेकिन मेरे लिए डर सबसे भयानक भावना थी, जिससे जूझना सबसे मुश्किल था.अँधेरी और भीड़भरी जगहों में अकसर हम मृत शरीरों पर ठोकर खा जाते थे, लाशों को इतनी जल्दी हटाया नहीं जा सकता था. हम बच्चे थे, और हमने ऐसी चीज़ें देखीं, जिन्हें किसी भी इनसान को, चाहे उसकी उम्र कुछ भी हो, कभी नहीं देखना पड़े.पीड़ा बयान करने का कोई तरीक़ा नहींआपने किताबें पढ़ी होंगी, फ़िल्में देखी होंगी, वास्तविक डॉक्यूमेंट्री देखी होंगी, लेकिन चारों ओर फैली लगातार बदबू, गन्दगी, बिना रुके जारी डरावनी स्थितियाँ और मौत से घिरे रहने का अनुभव शब्दों और तस्वीरों में बयान नहीं किया जा सकता. इसे सही तरह से व्यक्त करने का कोई तरीक़ा नहीं है.हमारे शरीर, बाल और कपड़े जुओं से भरे रहते थे. हमें यह भी समझ में आ गया था कि सिर की जुएँ और कपड़ों की जुएँ अलग-अलग होती हैं. उन्हें अपने अंगूठे के नाखूनों के बीच कुचलना ही मेरा मुख्य समय बिताने का काम बन गया था.मेरा बहुत-सा समय काल्पनिक खेलों में बीतता था. एक खेल…अन्धविश्वास पर आधारित…मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया. मैंने तय किया कि अगर मुझे लगभग एक-से आकार और शक्ल के चार कंकड़ मिल जाएँ, तो इसका मतलब होगा कि मेरे परिवार के चारों सदस्य जीवित रहेंगे. यह खेल खेलना बहुत मुश्किल था, लेकिन मुझे पूरा भरोसा था कि मैं हमेशा अपने चार कंकड़ ढूँढ लूँगी. मैंने इसे अपना उद्देश्य बना लिया था…उन चार कंकड़ों को ढूँढना. साहसी माँ का साथ…मेरी माँ, अदभुत आन्तरिक शक्ति और अटूट साहस से भरी हुई एक असाधारण महिला थीं. माँ का निधन 105 वर्ष की आयु से केवल 6 सप्ताह पहले हुआ. जब वह हमारे साथ थीं, तब हमारे परिवार में महिलाओं की पाँच पीढ़ियाँ एक साथ मौजूद थीं. मैं इसे जीवित रहने और निरन्तरता का प्रतीक मानती हूँ.मुझे ज़रा भी सन्देह नहीं है कि मेरा जीवित रहना मेरी माँ की वजह से ही सम्भव हो पाया. मैं बेहद सौभाग्यशाली रही कि उन कठिन वर्षों में मुझे कभी अपनी माँ से अलग नहीं किया गया.जिस रसोई में मेरी माँ काम करती थीं, एक दिन वह वहाँ से थोड़ा नमक और कुछ आलू चुपचाप निकाल लाईं. किसी तरह उन्होंने गुपचुप सूप पकाया. यह सब हमारे ही बिस्तर पर किया गया. मैं उनके साथ उसी बिस्तर पर बैठी थी, उन्हें छिपाने और उनके काम को ढकने की कोशिश कर रही थी. सूप लगभग तैयार ही था कि अचानक जर्मन पहरेदार निरीक्षण के लिए बैरक में घुस आए. जल्दबाज़ी में सब कुछ छिपाते हुए खौलता हुआ सूप मेरे पाँव पर गिर गया.हमें आत्म-संयम और अनुशासन बेहद कठोर तरीके़ से सिखाया गया था, क्योंकि मुझे यह पूरी तरह मालूम था कि अगर मैं दर्द से चीख पड़ती, तो हमारी जान चली जाती. यह घटना 1945 की वसंत ऋतु की है. उस समय मेरी आयु केवल 10 साल थी.इसके कुछ ही समय बाद, हमें पूर्वी योरोप के विनाश (extermination) शिविरों की ओर ले जाया गया. बिना भोजन, बिना पानी, बिना दवाइयों और बिना किसी स्वच्छता व्यवस्था के, 14 दिनों तक ट्रेन में यात्रा करने के बाद, रूसी सेना ने हमें पूर्वी जर्मनी के एक छोटे से गाँव ट्रोइबिट्ज़ के पास मुक्त कराया.ट्रेन में सवार 2500 लोगों में से 500 लोग रास्ते में या उसके तुरन्त बाद मर गए. ट्रोइबिट्ज़ के अनेक निवासी गाँव छोड़कर भाग चुके थे और हमने उनके घरों में शरण ली. रसोई में भरपूर खाना था…समृद्ध और स्वादिष्ट…लेकिन हमारे भूखे, कमज़ोर शरीर उस भोजन को सहन नहीं कर पा रहे थे. एक अपरिचित पोषण हमारे लिए ज़हर जैसा था.उस समय, साढ़े दस साल की उम्र में, मेरा वज़न केवल 16 किलो था. हम सभी टाइफ़स से पीड़ित थे. लेकिन हमारे आज़ाद होने के 6 सप्ताह बाद मेरे पिता इसी बीमारी से चल बसे… 6 साल से अधिक समय तक चले मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक यातनाओं को सहने के बाद…अमेरिका में नए जीवन की शुरुआत1948 में, जब मैं 13 वर्ष की थी, तीन सदस्यों का हमारा परिवार अमेरिका आ गया. हम 23 अप्रैल 1948 को न्यू जर्सी के होबोकेन इलाक़े में पहुँचे. संयोग से ठीक उसी दिन, जब हमारी मुक्ति को पूरे 3 वर्ष हो चुके थे.हिब्रू आप्रवासन मदद सोसाइटी ने, हमारे लिए इलिनॉइस प्रान्त के पियोरिया शहर में एक घर ढूँढा, जहाँ हमने एक बार फिर नए सिरे से जीवन शुरू किया.अंग्रेज़ी नहीं बोल पाने के कारण, 13 साल की उम्र में मुझे चौथी कक्षा में दाख़िल किया गया, जहाँ मेरे सहपाठी 9 साल के बच्चे थे. मेरे भाई और मैंने स्कूल के बाद लम्बे समय तक काम किया, ताकि माँ घर का ख़र्च चला सकें.साल भर अतिरिक्त कोर्स लेकर, गर्मियों की छुट्टियों में ग्रीष्म स्कूल जाकर और पढ़ाई में कड़ी मेहनत करके, मैंने पाँच साल बाद, 18 वर्ष की उम्र में पियोरिया सेंट्रल हाई स्कूल से शिक्षा पूरी की. मैं 267 छात्रों की कक्षा में 8वें स्थान पर रही.हाई स्कूल तक की शिक्षा पूरी करने के दो महीने बाद ही मेरा विवाह नथानियल लाज़ान से हुआ. मैं आभारी हूँ कि मैं शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से स्वस्थ बची रही, और हम अपनी विरासत को एक सुन्दर परिवार के रूप में आगे बढ़ा सके.हम एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान और करुणा के साथ शुरुआत कर सकते हैं…चाहे किसी का धर्म, त्वचा का रंग या राष्ट्रीयता कुछ भी हो.हमारे 3 वयस्क बच्चे हैं…तीनों सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे हैं. उन्होंने हमें 9 प्यारे पोते-पोतियाँ और 15 परपोते दिए हैं. निस्सन्देह, यह जीवित रहने और निरन्तरता की सच्ची कहानी है.प्रेम, सम्मान और करुणा…यह वही पीला सितारा है, जिसे पहनने के लिए मुझे मजबूर किया गया था. यह हमें अपमानित करने, समाज से अलग-थलग करने और बाक़ी लोगों से अलग चिन्हित करने का एक और तरीक़ा था. हम में से प्रत्येक का दायित्व है कि हम अपनी पूरी क्षमता से ऐसी घृणा, ऐसे विनाश और ऐसे आतंक को दोबारा लौटने से रोकें.दुनिया में फैली नकारात्मकता के ख़िलाफ़ हम बहुत कुछ नहीं कर सकते, लेकिन हम एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, किस तरह पेश आते हैं और कैसे हाथ बढ़ाते हैं. यह पूरी तरह हमारे अपने हाथ में है.

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