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भारत में विश्व बैंक के समर्थन से जैव-प्रौद्योगिकी को मिली नई गति

 - World News in Hindi

भारत के जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnoligy) क्षेत्र में एक शान्त क्रान्ति चल रही है. युवा उद्यमी, नई वैज्ञानिक खोजों को ऐसे स्वास्थ्य समाधानों में तब्दील कर रहे हैं, जो आम लोगों के लिए अधिक सुलभ और किफ़ायती हैं. कर्नाटक के बेंगलुरु शहर के अर्जुन अरुणाचलम की नई कम्पनी वॉक्सेल ग्रिड्स (Voxel Grids) ने भारत का पहला स्वदेशी MRI स्कैनर विकसित किया है. यह मशीन हल्की है, कम ऊर्जा में चलती है, अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और आयातित स्कैनरों की तुलना में काफ़ी सस्ती भी है. ये स्कैनर अब मुंबई और असम के कैंसर अस्पतालों में इस्तेमाल हो रहे हैं, जिससे लाखों लोगों के लिए अत्याधुनिक जाँच सुलभ हो रही है.चेन्नई की लेविम लाइफ़टैक (LevimLifetech) कम्पनी के जतिन विमल ने, टाइप–2 डायबिटीज़ के लिए भारत का पहला biosimilar Liraglutide तैयार किया है, जिसकी क़ीमत आयातित दवा की तुलना में लगभग एक-तिहाई है. बायोलॉजिक दवा विकसित करना, एक जीवित कोशिका में आधारभूत बदलाव करने जैसी बेहद जटिल प्रक्रिया है, फिर भी उनकी कम्पनी इसे सफलतापूर्वक बनाने वाली, देश की पहली कम्पनी बनी और केवल एक साल में लागत से उबरकर सन्तुलन पर पहुँच गई.इसी तरह, निजी क्षेत्र की अनेक कम्पनियाँ भी तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं. UTI और निमोनिया के लिए नए एंटीबायोटिक दवाएँ विकसित की जा रही हैं. डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया के टीके, दुनिया की पहला हेपेटाइटिस–E वैक्सीन, और तीव्र लिम्फ़ोमा के लिए भारत की पहली सैल थेरेपी पर काम चल रहा है. © World Bank साथ ही एंडोस्कोप, हृदय वाल्व, दाँत और हड्डी के इम्प्लांट, और स्टैम–सैल आधारित उपचारों पर भी शोध और विकास जारी है.इन सभी नई उपलब्धियों के पीछे एक ही मज़बूत आधार है – राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन (NBM). इस मिशन को, भारत में समावेशन के लिए नवाचार परियोजना (Innovate in India for Inclusiveness project) के तहत, विश्व बैंक से वित्तीय और तकनीकी समर्थन मिला है, जिसने इन नवाचारों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.मिशन को लागू करने वाली संस्था BIRAC (Biotechnology Industry Research Assistance Council) के प्रबंध निदेशक डॉक्टर जितेन्द्र कुमार का कहना है कि राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन, भारत के स्वास्थ्य नवाचार तंत्र का एक शक्तिशाली उत्प्रेरक बन गया है. यह शोध को प्रयोगशाला से ज़मीन तक पहुँचाने में मदद करता है और एक मज़बूत, विश्वसनीय एवं वैश्विक स्तर का प्रतिस्पर्धी बायोफ़ार्मा क्षेत्र तैयार कर रहा है.भारत की वैज्ञानिक क्षमता मज़बूत है, लेकिन पहले यह अलग–अलग हिस्सों में बिखरी हुई थी. 2012 से BIRAC इन अन्तरालों को कम करने पर काम कर रहा है, और 2017 से विश्व बैंक समर्थित NBM ने, बायोफ़ार्मास्यूटिकल विकास की रफ़्तार को तेज़ कर दिया है. © World Bank प्रयोगशाला से बाज़ार तकउद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच साझेदारी को मज़बूत करना मिशन की प्रमुख प्राथमिकता रही है. विश्व बैंक के विशेषज्ञ दिनेश नायर और अमाडू डेम बताते हैं कि “नवाचार अलग-थलग रहकर आगे नहीं बढ़ सकता.” इसी सोच के साथ अब वैज्ञानिक परामर्श समूह (Scientific Advisory Group), शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालयों, उद्योग एवं सरकारी विशेषज्ञों को एक मंच पर लाता है, ताकि ऐसे शोध को चुना और आगे बढ़ाया जाए जो देश की असल स्वास्थ्य ज़रूरतों को पूरा करे.NBM ने वह माहौल तैयार किया जिसकी नई कम्पनियों को सबसे अधिक ज़रूरत थी - धन उपलब्धता, बुनियादी ढाँचा, नियमों के बारे में मार्गदर्शन और तकनीकी मदद. आज यह मिशन, बायो-आधारित नवाचार के लिए भारत का सबसे बड़ा शुरुआती वित्तीय सहारा बन गया है.2014 से अब तक लगभग 10 हज़ार बायोटैक कम्पनियाँ उभरी हैं, जिनमें से अनेक कम्पनियों को सीधे या परोक्ष रूप से मिशन से सहारा मिला है.BIRAC ने देशभर में लगभग 100 इन्क्यूबेशन केन्द्र बनाए हैं, जहाँ स्टार्टअप्स कम लागत पर साझा प्रयोगशालाओं में अपना शोध कर सकते हैं. इसके साथ ही 25 विशेष प्रोटोटाइप और पायलट-स्केल बायो–उत्पादन सुविधाएँ भी खड़ी की गई हैं.पुणे का वेंचर केन्द्र, बेंगलुरु का C-CAMP, विशाखापट्टनम का AMTZ, IIT कानपुर और IRSHA पुणे जैसे केन्द्र, नई कम्पनियों व व्यवसायों को उपकरण, विशेषज्ञ मार्गदर्शन एवं नैटवर्किंग के बेहतरीन अवसर उपलब्ध करा रहे हैं. © World Bank बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की सुरक्षानवाचार की इस पूरी श्रृंखला को मज़बूत करने के लिए 7 हज़ार से अधिक लोगों को राष्ट्रीय और वैश्विक बौद्धिक सम्पदा अधिकार (Intellectual Property) से जुड़े नियमों का प्रशिक्षण दिया गया है. इनमें 45 प्रतिशत महिलाएँ भी हैं.राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन की मदद से सात क्षेत्रीय तकनीक हस्तान्तरण कार्यालय स्थापित किए गए हैं. इन कार्यालयों ने अब तक 850 से ज़्यादा बौद्धिक सम्पदा आवेदन दाख़िल किए हैं और लगभग 120 तकनीक हस्तान्तरण में सहयोग दिया है. इससे नवप्रवर्तकों का आत्मविश्वास बढ़ा है और उन्हें अपना शोध सुरक्षित तरीक़े से बाज़ार तक ले जाने की क्षमता मिली है. © World Bank चिकित्सीय परीक्षण का संचालनभारत में उच्च-गुणवत्ता वाले क्लीनिकल अनुसन्धान स्थलों की कमी रही है. मिशन के सहयोग से अब अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप 30 अस्पताल-आधारित और 10 अन्य परीक्षण केन्द्र स्थापित किए गए हैं, जिनके पास लगभग 8 लाख स्वयंसेवकों का डेटाबेस उपलब्ध है.अब तक 100 से अधिक क्लीनिकल परीक्षणों को समर्थन दिया जा चुका है.जतिन के मामले में, राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन (NBM) की सहायता ने, उनके चिकित्सीय परीक्षण की लगभग 85 प्रतिशत लागत उठाई. साथ ही, हर तीन महीने पर होने वाली वैज्ञानिक व नियामकीय समीक्षा ने, उनके उत्पाद विकास को तेज़, सरल एवं किफ़ायती बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई. © World Bank भारत समेत विश्व के लिए वैक्सीन का विकासNBM की प्रमुख उपलब्धियों में एक है - दुनिया की पहली DNA - आधारित कोविड-19 वैक्सीन ZyCoV-D, जिसे ज़ाइडस कैडिला ने, मिशन से मिले महत्वपूर्ण वित्तीय और तकनीकी सहयोग से विकसित किया.इस मिशन के तहत, भारत बायोटैक की चिकनगुनिया वैक्सीन को भी समर्थन दिया जा रहा है. यह अपनी तरह की पहली वैक्सीन होगी, जिसका पूरी तरह से विकास व परीक्षण भारत में ही किया जा रहा है.डॉक्टर बद्री पटनायक, डॉक्टर राजश्री और 20-25 वैज्ञानिकों की टीम इस कार्यक्रम का नेतृत्व कर रही है. उन्हें अब तक लगभग 16 करोड़ रुपए की सहायता मिली है, जिसमें नियामकीय मार्गदर्शन भी शामिल हैं. © World Bank भारत के बायोफ़ार्मा भविष्य का ख़ाका35 युवा वैज्ञानिकों की टीम के साथ काम कर रहे अर्जुन कहते हैं कि भारत असाधारण प्रतिभा का धनी है. उनका मानना है कि अगर सही माहौल मिल जाए तो ये युवा वैज्ञानिक उत्कृष्ट काम कर सकते हैं.NBM के मिशन निदेशक डॉक्टर राज के शिरूमल्ला का मानना है कि भारत पहले ही जैनेरिक दवाओं और वैक्सीन के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में है, और 1.1 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक बायोफ़ार्मा उद्योग में, उच्च-गुणवत्ता वाले नवाचारों के ज़रिए एक मजबूत और निर्णायक शक्ति बन सकता है.भारत, उद्यमियों, वैज्ञानिकों और राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन द्वारा बनाए गए मज़बूत पारिस्थितिकी तंत्र के साथ, जैव-प्रौद्योगिकी के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. देश, लगातार निवेश, प्रगतिशील नीतियाँ और मज़बूत सार्वजनिक-निजी भागेदारी की मदद से, अपने वैज्ञानिक नवाचारों को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा सकता है तथा वैश्विक बायोफ़ार्मा क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है - ऐसा नेतृत्व जो न केवल देश, बल्कि पूरी दुनिया के लिए लाभकारी होगा.

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