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म्याँमार: धमकियों व हिंसा के माहौल में, सेना द्वारा 'थोपे गए चुनावों' पर चिन्ता

 - World News in Hindi

म्याँमार में व्यापक पैमाने पर धमकियों व हिंसा के माहौल के बीच सैन्य नेतृत्व द्वारा महीने, दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में चुनाव कराए जाने की योजना है, जिससे आम नागरिकों के लिए नई चुनौतियाँ पैदा होने का जोखिम है. मानवाधिकार मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (OHCHR) ने वर्तमान परिस्थितियों में निर्वाचन प्रक्रिया से पूरे देश में असुरक्षा, भय, ध़्रुवीकरण को और हवा मिलने की आशंका जताई है. म्याँमार में यूएन मानवाधिकार टीम के प्रमुख जेम्स रोडहैवर ने शुक्रवार को एक वीडियो लिन्क के ज़रिए जिनीवा में पत्रकारों को बताया कि लगभग पाँच वर्षों से देश, एक संकट का सामना कर रहा है और इस माहौल में चुनाव थोपे जाने से बड़ी चिन्ताएँ उभरी हैं.म्याँमार के सैन्य बलों द्वारा नियंत्रित चुनाव, हिंसा व धमकियों से भरे माहौल में हो रहे हैं. बढ़ती असुरक्षा और हालात में सुधार के लिए ज़रूरी उपायों के अभाव में आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए जोखिम हैं.आम नागरिकों पर मतदान में हिस्सा लेने के लिए सेना का दबाव है, जबकि हथियारबन्द विरोधी गुट उनकी भागेदारी रोकने के लिए आक्रामक ढंग से कोशिशें कर रहे हैं. Tweet URL

यूएन के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ये चुनाव एक ऐसे माहौल में आयोजित किए जा रहे हैं, जहाँ म्याँमार की सेना द्वारा, निर्वाचन प्रक्रिया में व्यापक भागेदारी को सक्रियता से दबाने की कोशिश की जा रही है.अनेक बड़ी राजनैतिक पार्टियों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखा गया है. सैन्य नेतृत्व के 30 हज़ार से अधिक राजनैतिक विरोधी वर्ष 2021 से हिरासत में हैं, जिनमें लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार के सदस्य और राजनैतिक प्रतिनिधि हैं.सैन्य बलों का देश के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण नहीं है और इस वजह से पूरे देश की भागेदारी के साथ सार्थक रूप से चुनाव सम्पन्न करा पाना सम्भव नहीं होगा. म्याँमार की 56 टाउनशिप में ‘मार्शल लॉ’ अब भी लागू है. पहले दौर के मतदान में ऐसी 31 टाउनशिप हैं, जहाँ उम्मीदवारों के न होने की वजह से कोई वोटिंग नहीं होगी.संकट से जूझ रहा है देश1 फ़रवरी 2021 को, म्याँमार की सेना ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था और राष्ट्रपति, स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची समेत सैकड़ों अधिकारियों, राजनैतिक नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था.इसके बाद से ही देश, मानवीय व मानवाधिकारों के संकट से जूझ रहा है, जोकि समय बीतने के साथ और अधिक गहरा हुआ है.सैन्य तख़्तापलट के चार वर्ष बाद, म्याँमार में हिंसक टकराव जारी है जिससे लाखों लोग विस्थापन का शिकार हुए हैं, खाद्य सुरक्षा व अर्थव्यवस्था बेहाल है, हवाई बमबारी में घर-परिवार तबाह हुए हैं और लोगों को जबरन सैनिकों के रूप में भर्ती किए जाने के मामले भी सामने आए हैं.इससे पहले भी, संयुक्त राष्ट्र ने हिंसक टकराव, मानवाधिकार उल्लंघन मामलों की पृष्ठभूमि में चुनाव कराए जाने पर चिन्ता व्यक्त की है और सचेत किया है कि ये परिस्थितियाँ आम लोगों को स्वतंत्रततापूर्वक, शान्तिपूर्ण ढंग से अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग करने की अनुमति नहीं देंगी.भेदभाव का सायायूएन कार्यालय के अनुसार, निर्वाचन प्रक्रिया पर स्थानीय समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव का भी साया है, चूँकि रोहिंज्या, तमिल, गुरखा और चीनी समुदायों को मतदान से बाहर रखा गया है.इसके अलावा नागरिक समाज व स्वतंत्र मीडिया को कोई आवाज़ नहीं दी गई है, जबकि सैन्य बलों ने बड़े पैमाने पर इलैक्ट्रॉनिक निगरानी का दायरा बढ़ा दिया है ताकि राजनैतिक असंतुष्टों की पहचान की जा सके.मानवाधिकार कार्यालय ने चिन्ता जताई कि इस निगरानी का इस्तेमाल मतदान केन्द्रों के बाहर किए जाने की आशंका है.यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क के अनुसार, म्याँमार को राजनैतिक संकट से स्थिरता व लोकतंत्र की पुनर्बहाली की दिशा में ले जाने के बजाय, इस प्रक्रिया से पूरे देश में असुरक्षा गहराने, और भय व ध्रुवीकरण को बल मिलने की आशंका है.इसके मद्देनज़र, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हिंसा पर विराम लगाना और बिना किसी अवरोध के मानवीय सहायता आपूर्ति को सुनिश्चित करना, सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.

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