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67 करोड़ लोग आज भी भूखे पेट सोने के लिए क्यों मजबूर हैं?

 - World News in Hindi

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया की आबादी के आठ प्रतिशत से अधिक हिस्से, यानि 67 करोड़ से अधिक लोगों को पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध नहीं है और वे भूखे पेट रहने के लिए मजबूर हैं. टकराव, हिंसा, जलवायु परिवर्तन और असमानता इसकी बड़ी वजह हैं, लेकिन “खाद्य असुरक्षा” के और भी कई कारण हैं.हर वर्ष 16 अक्टूबर को मनाए जाने वाले विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर, पाँच सरल तथ्यों के ज़रिए यह समझा जा सकता है कि आठ अरब से अधिक लोगों के लिए पर्याप्त भोजन होने के बावजूद, दुनिया में अब भी इतनी विशाल संख्या में लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है.1. हिंसक टकराव और राजनैतिक अस्थिरतायूक्रेन, सूडान और ग़ाज़ा जैसे सशस्त्र टकरावों के कारण खाद्य उत्पादन रुक जाता है, आपूर्ति श्रृंखलाएँ टूट जाती हैं और बाज़ारों तक पहुँच मुश्किल हो जाती है. नतीजा यह कि लाखों लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर होते हैं और उन्हें भोजन की भारी कमी का सामना करना पड़ता है.हेती में अनुमानित 57 लाख लोग - यानी कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा - हिंसा के कारण घर छोड़ चुके हैं और बिगड़ती खाद्य सुरक्षा की स्थिति से जूझ रहे हैं. इनमें से लगभग 19 लाख लोग भूख के आपात स्तर का सामना कर रहे हैं. © WFP/Tanya Birkbeck संयुक्त राष्ट्र, संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में, मुख्यत: विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के ज़रिए गम्भीर खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे लोगों को तात्कालिक खाद्य सहायता प्रदान करता है.प्रभावित समुदायों को बीज, पशुधन और कृषि उपकरण भी दिए जाते हैं ताकि वे अपने लिए भोजन उगा सकें और बाहरी मदद पर निर्भर न रहें.2. जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमसूखा, बाढ़ और लू जैसी बढ़ती जलवायु अस्थिरता किसानों की उत्पादन क्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर रही है. इसका सीधा असर कृषि उत्पादकता और खाद्य उपलब्धता पर पड़ता है, ख़ासतौर पर उन इलाक़ों में जो पहले से ही सम्वेदनशील हैं.सोमालिया, सूडान, दक्षिण सूडान, माली, बुर्किना फ़ासो, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), नाइजीरिया और इथियोपिया में संघर्ष, सूखा, बाढ़ व मरुस्थलीकरण मिलकर गम्भीर खाद्य असुरक्षा पैदा कर रहे हैं.उदाहरण के तौर पर, सोमालिया पिछले चार दशकों के सबसे भीषण सूखे से जूझ रहा है, जिससे वहाँ लम्बे समय से जारी टकराव एवं विस्थापन की स्थिति और भी गम्भीर हो गई है. © UNICEF/Zerihun Sewunet संयुक्त राष्ट्र, पर्यावरणीय झटकों के असर को कम करने और बदलते जलवायु रुझानों के अनुकूल होने के लिए जलवायु-सहनसक्षम कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है. उदाहरण के लिए, अफ़्रीका के सहेल क्षेत्र में “हाफ़-मून” कृषि तकनीक अपनाई जा रही है.3. आर्थिक झटके और महंगाईवैश्विक और क्षेत्रीय मन्दी, भोजन व ऊर्जा की बढ़ती क़ीमतें और महंगाई ने एक साथ मिलकर लोगों की क्रय क्षमता घटा दी है. ख़ासतौर पर निर्धन देशों में, इससे पौष्टिक खाना हासिल कर पाना और मुश्किल हो गया है.कोविड-19 महामारी, यूक्रेन युद्ध और जलवायु झटकों के कारण 2020 से 2024 के बीच खाद्य क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं. जैसे-जैसे दाम बढ़े और वेतन में गिरावट आई, महंगाई ने लोगों की जेब पर असर डाला. नतीजा यह कि निर्धन देशों में लोग पौष्टिक भोजन ख़रीदने में असमर्थ हो गए और उन्हें खाने में कटौती करनी पड़ी है. © WFP/Arete/Damilola Onafuwa संयुक्त राष्ट्र आर्थिक झटकों और महंगाई के दौर में खाद्य राशन एवं पौष्टिक सामग्री की आपूर्ति बढ़ाता है, साथ ही परिवारों को स्थानीय बाज़ार से भोजन ख़रीदने के लिए नक़द सहायता प्रदान करता है. इससे पोषण में सुधार होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलती है.4. संरचनात्मक निर्धनता और असमानतागहरी जड़ें जमाई हुई ग़रीबी और सामाजिक असमानता, भोजन एवं संसाधनों तक पहुँच को सीमित करती हैं, ख़ासतौर पर ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदायों में, जिससे दीर्घकालिक भूख की समस्या बनी रहती है.कम आय, कमज़ोर बुनियादी ढाँचा और स्थानीय सेवाओं की कमी के कारण, महिलाओं और आदिवासी समेत हाशिए पर मौजूद समुदायों व अन्य लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता है.संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 70 करोड़ लोग अत्यधिक निर्धनता में जी रहे हैं, जिनमें से दो-तिहाई सब-सहारा अफ़्रीका में रहते हैं.संयुक्त राष्ट्र विभिन्न एजेंसियों के ज़रिए, सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को मज़बूत करने तथा संकट-केन्द्रित सहायता से आगे बढ़कर ऐसे मॉडल को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है, जिसमें निम्न-आय वाले देश स्वयं सहनसक्षम, समावेशी एवं टिकाऊ खाद्य प्रणालियाँ विकसित कर सकें.यह पहल समुदायों को सशक्त बनाती है ताकि वे भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में कमी ला सकें, अपनी स्थानीय क्षमता बढ़ा सकें और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें.5. व्यापार में व्यवधान और बाज़ार अस्थिरतानिर्यात पाबन्दियों, आयात शुल्क (टैरिफ़) और वस्तुओं की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव से खाद्य बाज़ारों में अस्थिरता पैदा होती है, जिससे भोजन महँगा हो जाता है व खाद्य-अभाव वाले देशों में उसकी कमी हो जाती है. © IFAD/GMB Akash बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका, खाद्य क़ीमतों की अस्थिरता एवं ऋण संकट से जूझ रहे हैं. व्यापार नीतियों की अनिश्चितता, वैश्विक टैरिफ़ तथा महंगाई ने स्थिति और बिगाड़ दी है. नतीजा यह कि लोगों की सस्ती और पौष्टिक भोजन तक पहुँच सीमित हो गई है.ब्राज़ील और मैक्सिको में भी व्यापारिक तनाव और महंगाई के कारण आर्थिक विकास की रफ़्तार धीमी हुई है. इससे लोगों की ख़रीद क्षमता घटी है और निम्न-आय वाले समुदायों में खाद्य असुरक्षा बढ़ी है.संयुक्त राष्ट्र विभिन्न तरीक़ों से प्रभावित देशों की मदद करता है.वह वैश्विक क़ीमतों पर नज़र रखता है, नीतिगत मार्गदर्शन देता है और खाद्य, ऊर्जा व वित्त से जुड़ी आपसी संकटों से निपटने के लिए अन्तरराष्ट्रीय समन्वय करता है. इन प्रयासों का लक्ष्य बाज़ारों को स्थिर रखना और कमज़ोर वर्गों की रक्षा करना है.

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