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आपदाओं का अर्थव्यवस्था पर बढ़ता प्रहार, दो हज़ार अरब डॉलर तक के नुकसान की आशंका

 - World News in Hindi

बाढ़, चक्रवाती तूफ़ान, सूखा. हर साल, ऐसी आपदाओं के कारण दुनिया को 200 अरब डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ता है और यदि उनके व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जाए, तो यह आँकड़ा 2,000 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है. विकासशील देश तो इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं ही, लेकिन सम्पन्न देश भी इस हानि से जूझ रही हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने सोमवार, 13 अक्टूबर, को अन्तरराष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस पर आगाह किया है कि जैसे-जैसे जलवायु संकट में तेज़ी आ रही है, आपदाओं की संख्या और गहनता में भी बढ़ोत्तरी हो रही है.इन आपदाओं की क़ीमत दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन और विकास के लिए ख़राब विकल्पों को चुने जाने का असर दिखाई दे रहा है. चरम मौसम घटनाओं और जोखिम आकलन के बिना तैयार की गई योजनाओं की वजह से देशों को प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है. Tweet URL

वर्ष 1970 से 2000 तक, आपदाओं से होने वाली हानि औसतन 70-80 अरब डॉलर आंकी गई थी, जिनकी रोकथाम की जा सकती थी. मगर इस सदी में यह आँकड़ा बढ़कर, 180-200 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है.एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2024 में 4.6 करोड़ लोग आपदाओं के कारण विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए, जोकि अब तक की सबसे अधिक संख्या है. इस विकराल चुनौती के बावजूद आपदा जोखिम में कमी लाने के प्रयासों में पर्याप्त निवेश का अभाव है.महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने आगाह किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, आपदाओं की एक बड़ी क़ीमत चुका रही है. “जीवन व आजीविकाएँ तबाह हो रहे हैं और दशकों की विकास प्रगति पल भर में मिट रही है.”भूकम्प, बाढ़, तूफ़ान, सूखा, ताप लहरें, ये सभी आपदाएँ पिछले दो वर्षों में 95 प्रतिशत सीधे नुक़सान के लिए ज़िम्मेदार हैं.प्राकृतिक आपदाओं के परोक्ष प्रभावों में सामाजिक व पारिस्थितिकी तंत्रों को वृहद स्तर पर हुए नुक़सान को भी शामिल किया जाता है. यदि परोक्ष प्रभावों को शामिल किया जाए तो यह हर वर्ष दो ट्रिलियन डॉलर (दो हज़ार अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है.विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से दुनिया भर में देश अलग-अलग तरह से प्रभावित हैं. दक्षिण सूडान में, हर साल आने वाली बाढ़ से घर, खेत, स्कूल डूब जाते हैं, जिससे लोगों को अपना घर छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ता है और खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है.योरोप और अमेरिकी क्षेत्र में स्थित देशों में वनों में आग लगने से भीषण हानि हुई है, म्याँमार और अफ़ग़ानिस्तान में आए भूकम्पों से जान-माल की बड़ी हानि हुई है. वहीं भारत और पाकिस्तान में बाढ़ से देश के अनेक हिस्सों को भारी नुक़सान पहुँचा है.आपदा जोखिम प्रबन्धन में निवेशअन्तरराष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस की शुरुआत 1989 में हुई थी, ताकि जोखिमों और उनसे निपटने के लिए प्रयत्नशील समुदायों व उपायों के प्रति जागरुकता का प्रसार किया जा सके.महासचिव गुटेरेश ने ध्यान दिलाया कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद इन प्रयासों में पर्याप्त निवेश नहीं किया जा रहा है.विकास सहायता का केवल दो फ़ीसदी और सरकारी बजट में एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा आपदा जोखिम में कमी लाने के प्रयासों में आवंटित किया जाता है.यूएन प्रमुख ने सचेत किया कि यह केवल एक कमी भर नहीं है, यह एक ग़लत आकलन भी है. “विकासशील देशों में सहनसक्षम बुनियादी ढाँचे में किए गए हर एक डॉलर के निवेश से, आपदाएँ घटित होने पर चार डॉलर की बचत की जा सकती है.”समुचित योजना व निवेश के ज़रिए इन आपदाओं के प्रभावों में कमी लाई जा सकती है. इसी को ध्यान में रखते हुए, इस वर्ष अन्तरराष्ट्रीय दिवस की थीम में निवेश की अहमियत पर बल दिया गया है. यूएन प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा कि निजी व सार्वजनिक सैक्टर को अपने हर निर्णय में जोखिमों, सम्वेदनशीलता का आकलन करना होगा, और उनके अनुरूप क़दम उठाए जाने होंगे ताकि सर्वजन के लिए एक सुरक्षित भविष्य को आकार दिया जा सके.

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