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भारत: ओडिशा राज्य में ट्राँसजैंडर समुदाय की हरित आवास यात्रा

 - World News in Hindi

भारत के भुवनेश्वर शहर में प्रगति विहार इलाक़े की गलियों में कभी टीन की छतों वाले तपते घर दिखाई देते थे, अब यहाँ नई उम्मीदें भी नज़र आ रही हैं. कोई अपने नए घर में जाकर सिलाई की दुकान खोलने का सपना देख रहा है, कोई डेयरी की दुकान शुरू करना चाहता है, तो कोई अपने घर की ऊपरी मंज़िल पर ब्यूटी पार्लर खोलने की तैयारी में है. ट्राँसजैंडर समुदाय के लगभग 80 निवासियों को यहाँ नए घर मिले हैं, जोकि सिर्फ़ ईंट और दीवारें नहीं हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता और गरिमा की ओर बढ़ते क़दम भी हैं. भारत में ओडिशा राज्य के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने ट्राँसजैंडर समुदाय के सदस्यों को प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत 44 नए घरों के लिए कार्य आदेश सौंपे हैं. हर परिवार के लिए 2.5 लाख रुपए की मदद और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के समर्थन से, इस पहल को और मज़बूती मिली है.प्रगति विहार में झुग्गी बस्ती को नए सिरे से विकसित किए जाने पर केन्द्रित इस पहल से, ट्राँसजैंडर समुदाय अपने घरों को बेहतर ढंग से बना सकेंगे. सभी घरों को एक ही डिज़ाइन से बनाया जाएगा, जोकि हरित आवास का एक नया मॉडल भी पेश करेगा.एक स्थानीय निवासी, जो अपने नए घर में जाकर सिलाई की दुकान खोलने का सपना देख रही हैं, कहती हैं, “हम यहाँ दस साल से भी ज़्यादा समय से रह रहे हैं, हमेशा कुछ बेहतर की आस लगाए.”अब कोई डेयरी की दुकान शुरू करना चाहता है, तो कोई अपने घर की ऊपरी मंज़िल पर ब्यूटी पार्लर खोलने की सोच रहा है. लगभग 80 ट्राँसजैंडर निवासी अपने इन नए मकानों को आत्मनिर्भरता का स्रोत बनते हुए देखना भी चाहते हैं. © UNEP India हरित घर, नया भविष्यप्रगति विहार की नई बस्ती केवल पक्के मकानों की कहानी नहीं है, यह बदलाव की पहचान है. यहाँ बनने वाले घर न सिर्फ़ ट्राँसजैंडर समुदाय को सम्मान और आत्मनिर्भरता देंगे, बल्कि पूरे समाज को पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी निभाने का नया सन्देश भी पहुँचाएँगे.संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने ओडिशा सरकार के साथ मिलकर इस परियोजना को एक पायलट के रूप में शुरू किया है, ताकि यह साबित किया जा सके कि किस तरह कम-कार्बन और जलवायु-अनुकूल घरों का निर्माण किया जा सकता है.इन घरों में कोयला जलाने से निकली राख (fly ash) ईंटों, कॉन्क्रीट ब्लॉक, बायो-आधारित पैनलों और निर्माण से निकलने वाले मलबे का पुनः उपयोग किया जाएगा. डिज़ाइन इस तरह किया गया है कि प्राकृतिक हवा और रोशनी भरपूर मिले. साथ ही छतों पर परावर्तक पेंट और सौर पैनल लगाए जाएँगे. नतीजा यह होगा कि ये घर न केवल ठंडे और आरामदायक होंगे बल्कि बिजली का ख़र्च भी काफी कम कर देंगे.भारत में UNEP के देशीय निदेशक बालकृष्ण पिसुपती ने बताया, “निर्माण क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को घटाने के लिए केवल छोटे-छोटे उपाय पर्याप्त नहीं हैं. हमें यह बदलना होगा कि हम घरों को कैसे डिज़ाइन करते हैं, किस तरह से उनका निर्माण करते हैं, कौन-सी सामग्री चुनते हैं और पूरी आपूर्ति श्रृँखला में किस तरह काम करते हैं. हम प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत, ओडिशा सरकार के साथ मिलकर यही व्यापक बदलाव दिखाने के प्रयास कर रहे हैं.” © UNEP India केन्द्र में समुदायप्रगति विहार बस्ती की शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी. उस समय यहाँ केवल 20 घर थे, जो धीरे-धीरे बढ़कर 35 तक पहुँच गए, लेकिन ज़िन्दगी की मुश्किलें जस की तस बनी रहीं. असली बदलाव तब आया जब ओडिशा की जगा मिशन योजना के तहत निवासियों को भूमि के अधिकार मिले. इसके बाद यह समुदाय प्रधानमंत्री आवास योजना की सहायता राशि के लिए पात्र बना और पहली बार अपने भविष्य को अपनी ही शर्तों पर गढ़ने की राह पर चला.यहाँ की झुग्गीवासियों की समिति के आठ प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और अन्य सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर नए घरों की योजना तैयार की. हर फ़ैसला सामूहिक रूप से लिया गया - सभी घर एक जैसी रूपरेखा पर बनेंगे, सभी के लिए ज़मीन का आकार बराबर होगा और निर्माण का काम चरणबद्ध तरीक़े से होगा, ताकि किसी भी परिवार को पुराने घर टूटने के दौरान बेघर न होना पड़े.योजना में एक बहुउद्देशीय सामुदायिक केन्द्र भी शामिल है. आपदा के समय यह केन्द्र एक शरणस्थल बनेगा, जबकि सामान्य दिनों में यह क़ारीगरों और राजमिस्त्रियों को हरित निर्माण तकनीकों का प्रशिक्षण देगा. साथ ही यहाँ समुदाय और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित किए जा सकेंगे. © UNEP India कार्बन-न्यूनीकरण और समावेशन मौजूदा पर्यावरणीय चुनौती की गम्भीरता स्पष्ट है. भारत के कुल वार्षिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भवन निर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 22 प्रतिशत है. आने वाले दशक में जैसे-जैसे लाखों नए घर बनेंगे, यह आँकड़ा और तेज़ी से बढ़ेगा. अगर अब भी बदलाव नहीं किया गया, तो ये इमारतें 21वीं सदी के उत्तरार्ध तक उत्सर्जन को और गहराई से जकड़े रखेंगी.संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) में भवन और शीतलन समाधान के सलाहकार, राहुल अग्निहोत्री ने कहा, “कम-कार्बन भवनों की ओर बढ़ने के लिए पूरे जीवन-चक्र के विश्लेषण का दृष्टिकोण अपनाना ज़रूरी है. इसके लिए ‘किफ़ायत (कम सामग्री से निर्माण) – बदलाव (नई सामग्री व अन्य उपाय) – सुधार (बेहतर डिज़ाइन)’ की रणनीति अपनाना अत्यंत आवश्यक है.”प्रगति विहार के लिए इसका मतलब है कि पुराने घरों से निकले दरवाज़े, खिड़कियाँ, एस्बेस्टस की चादरें और अन्य सामान दोबारा इस्तेमाल किए जाएँगे. साथ ही फ़्लाई ऐश और ब्लास्ट फर्नेस स्लैग जैसे ओडिशा के औद्योगिक उपोत्पादों को भी निर्माण में उपयोग किया जाएगा. परिणामस्वरूप यहाँ बनने वाले घर न केवल किफ़ायती और मज़बूत होंगे, बल्कि धरती पर पर्यावरणीय बोझ भी कम करेंगे. © UNEP India वर्तमान आवास में केवल अस्थाई स्नानघर की व्यवस्था है. आवासीय भविष्य का संकेतप्रगति विहार के निवासियों के लिए यह परियोजना केवल घरों का निर्माण नहीं, बल्कि सपनों की नींव है. एक युवा निवासी ने कहा, “मैं पालतू पशुओं का एक छोटा सा फ़ार्म शुरू करने का सपना देखती हूँ.” एक अन्य ने अपने नए घर की ऊपरी मंज़िल पर बुज़ुर्गों के लिए आश्रम बनाने की इच्छा जताई. उनकी योजनाएँ दर्शाती हैं कि जब जीवन में स्थिरता मिले, तो कल्पनाओं और सम्भावनाओं के दरवाज़े अपने आप खुल जाते हैं.अगस्त-सितम्बर 2025 में, बरसात के बाद निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा. आधुनिक हरित निर्माण सामग्री का उपयोग करते हुए और समाज के सबसे हाशिये पर खड़े समुदाय को केन्द्र में रखकर तैयार की गई यह योजना एक सन्देश है कि भविष्य के घर केवल कम-कार्बन वाले ही नहीं होंगे, बल्कि समावेशी और गरिमा प्रदान करने वाले भी होने चाहिए.

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