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वो रात जब पहाड़ दहल उठे: अफ़ग़ानिस्तान में भूकम्प पीड़ितों की सेवा में जुटे एक डॉक्टर की आपबीती

 - World News in Hindi

मध्य रात्रि के क़रीब आए भूकम्प के पहले झटके ने ​डॉक्टर अब्दुल मतीन सहक को उनके बिस्तर से नीचे गिरा दिया. दूसरा तेज़ झटका महसूस होने के बाद, उन्होंने लपक कर अपना फ़ोन उठा लिया. ये 31 अगस्त को हुआ, जब पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान का पर्वतीय क्षेत्र रिक्टर पैमाने पर 6.0 की तीव्रता वाले भूकम्प से दहल उठा. उसके बाद भी रुक-रुककर अनेक झटके महसूस किए जाते रहे. भूकम्प के केन्द्र से क़रीब 50 किलोमीटर दूर जलालाबाद में अपने घर में, डॉक्टर सहक और उनकी पत्नी अपने शयन कक्ष से तेज़ी से बाहर निकल गए. उन्होंने देखा कि उनके आठ बच्चे पहले ही कमरों से बाहर आ चुके थे.अफ़ग़ानिस्तान में एक चिकित्सक के रूप में काम करने वाले डॉक्टर सहक ने कहा कि उन्होंने तुरन्त हेरात के बारे में सोचा. देश के पश्चिमी प्रान्त में 2023 में आए भूकम्प से भारी बर्बादी हुई थी. “मैं समझ चुका था कि इसका भी विशाल असर होगा.”जलालाबाद का निवासी होने के नाते, उन्हें पता था कि यह आपदा, देश के पूर्वोत्तर हिस्से को किस तरह से प्रभावित करेगी, जहाँ संयुक्त परिवार, दूरदराज़ के इलाक़ों में एक ही छत के नीचे रहते हैं. कुछ ही पलों में, मिट्टी, पत्थरों और गारे से बने घर ढह गए. सड़कें, मलबे में ग़ायब हो गईं. परिवार सोते समय ही मलबे में जीवित ही दब गए.तबाही की तस्वीरडॉक्टर सहक, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के स्थानीय आपात कार्यालय का नेतृत्व करते हैं. उन्होंने तुरन्त अपने व्हाट्सऐप ग्रुप का रुख़ किया, जोकि पूरे क्षेत्र के अस्पतालों, क्लीनिक और राहत संगठनों को एक साथ जोड़ता है. धीरे-धीरे, भूकम्प से हुई तबाही की ख़बरें आनी शुरू हो गईं.पड़ोसी कुनार प्रान्त की राजधानी असदाबाद से भी, जो पाकिस्तान की सीमा के पास सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र था. वहाँ के मुख्य अस्पताल ने उन्हें सूचित किया कि भूकम्प बहुत तीव्रता से महसूस किया गया था, और कुछ निवासियों के घायल होने की सम्भावना है. लेकिन रात 1 बजे तक, हालात और भी अधिक गम्भीर होते चले गए."हमें अलग-अलग इलाक़ों से कई घायलों की सूचना मिली और पता लगा कि स्थिति ठीक नहीं है. यदि सम्भव हो तो हमें सहायता प्रदान करें."मानसून की मुश्किलेंडॉक्टर सहक ने अपनी टीम को जलालाबाद स्थित संगठन के गोदाम में मिलने के लिए कहा. जैसे ही वह अपने सहकर्मियों के साथ अंधेरे में वाहन से निकले, बारिश शुरू हो गई. मॉनसून के मौसम की इस बारिश ने मानवीय सहायता प्रयासों में अपार रुकावटें पैदा कर दी. हेलीकॉप्टर के उतरने से लेकर ऐम्बुलेंस की आवाजाही, सभी कुछ जटिल होता चला गया.जल्द ही, मानवीय राहत आपूर्ति के लिए प्रयास शुरू हो गए. WHO के डिपो में एक ट्रक में चिकित्सा सामग्री लादी गई, फिर उसे जलालाबाद के हवाई अड्डे पर स्थानांतरित किया गया, जोकि लगभग पाँच किलोमीटर दूर था. इसके बाद अफ़ग़ान रक्षा मंत्रालय के एक हेलीकॉप्टर ने वो सामग्री नुरगल ज़िले की ओर पहुँचा दी. ये असदाबाद और जलालाबाद के बीच स्थित है और भूकम्प का केन्द्र था. डॉक्टर सहक ने कहा कि "भाग्यवश, हम सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र तक बहुत जल्दी पहुँचने में सफल रहे." © WHO विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) में डॉक्टर अब्दुल मतीन सहक और उनकी टीम ने कुनार प्रान्त में भूकम्प से प्रभावित हुए लोगों से मुलाक़ात की और आपात स्वास्थ्य सेवाओं का आकलन किया. नुरगल ज़िले की ओरउनकी आरम्भिक फ़ील्ड टीम में केवल चार लोग थे: वह स्वयं, एक तकनीकी सलाहकार, एक आपातकालीन सम्पर्क, और एक सुरक्षा सहायक. कुछ ही घंटों में, उन्होंने दो स्थानीय ग़ैर-सरकारी संगठनों से कर्मचारियों को शामिल किया, और 18 डॉक्टर, नर्स और फ़ार्मेसिस्ट की एक टीम बना ली. “इनमें से छह महिलाएँ डॉक्टर और दाई थीं. यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने पहले ही दिन, 23 मीट्रिक टन दवाएँ नुरगल ज़िले में हवाई मार्ग से पहुँचाईं. इस बीच, हताहतों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी. डॉक्टर सहक ने बताया कि “ख़बरें मिल रही थीं कि 500 या शायद 600 लोग मारे गए हैं. हज़ारों घायल हुए थे और हज़ारों घर ध्वस्त हो गए थे.” आपदा के कुछ दिन बीत जाने के बाद, आधिकारिक आँकड़े और भी भयावह हैं: 2,200 से अधिक मृतक, 3,640 घायल और 6,700 घर क्षतिग्रस्त. डॉक्टर सहक और उनकी टीम सोमवार की दोपहर एक बख़्तरबंद वाहन में नुरगल ज़िले में पहुँचे. कई रास्ते बन्द थे, चूँकि पहाड़ों से बड़े पत्थर गिर रहे थे. जो रास्ते खुले थे, वहाँ भी भीड़ की वजह से यातायात धीमा हो गया था. हज़ारों आम नागरिक, पैदल सफ़र तय करके पीड़ितों की मदद करने के लिए पहुँच रहे थे.‘मेरा बच्चा कहाँ है?’डॉक्टर सहक वहाँ पहुँचने के बाद, तबाही के पैमाने को देखकर स्तब्ध रह गए. “हमने सड़कों पर शव देखे. वे लोगों का इंतज़ार कर रहे थे ताकि उन्हें दफ़नाया जा सके.” पड़ोसी ज़िलों से स्वयंसेवक राहतकर्मी मलबा हटाने, घायलों को ले जाने और मृतकों की देखभाल करने के लिए पहुँच चुके थे. इस आपदा में बचने वालों में एक 60 वर्षीय व्यक्ति मोहम्मद थे, जिनका घर पूरी तरह नष्ट हो गया था. “मैं उस आदमी की आँखों से आँखे नहीं मिला सका. वह रो रहा था.” डॉ. सहक ने बताया कि उस व्यक्ति के साथ “कुल 30 पारिवारिक सदस्य रहते थे… जिनमें से 22 की भूकम्प में मृत्यु हो गई... मैं यह सुनकर स्तब्ध रह गया.” स्थानीय क्लीनिक की दीवारों में दरारें आ चुकी थीं, और मेडिकल स्टाफ़ ने बाहर तम्बुओं के नीचे मरीज़ों का इलाज करना शुरू कर दिया, जिनकी संख्या बढ़ती जा रही थी. डॉक्टर सहक ने बुरी तरह चोटिल एक महिला को देखा, जिनकी हड्डियाँ व पसलियाँ टूटी हुई थीं. वह साँस नहीं ले पा रही थी और रोए जा रही थी. वो बार-बार कह रही थी: “मेरा बच्चा कहाँ है! मुझे मेरा बच्चा चाहिए! कृपया मुझे मेरा बच्चा ला दो!” उसने अपना बच्चा खो दिया था. अपने पूरे परिवार को खो दिया था. © WHO अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी हिस्से में आए भूकम्प से चार प्रान्त बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जहाँ राहत कार्य जारी है. महिलाओं ने पहुँचाई मददएक ऐसे देश में जहाँ सार्वजनिक जीवन में सख़्त लैंगिक नियम लागू हैं, भूकम्प ने अस्थाई रूप से कुछ दीवारें गिरा दीं. डॉक्टर सहक के अनुसार, “पहले कुछ दिनों में, हर कोई – पुरुष और महिलाएँ – लोगों को बचा रहा था.” अफ़ग़ानिस्तान में महिला डॉक्टर और दाई अब भी काम कर सकती हैं, लेकिन केवल तभी जब उनके साथ कोई पुरुष रिश्तेदार अस्पताल जाए. डॉक्टर सहक ने कहा कि उन्होंने किसी महिला मरीज़ को इलाज से वंचित होते नहीं देखा. उनका मानना है कि असली संकट तो वर्ष 2021 में तालेबान की वापसी के बाद महिला पेशेवरों द्वारा देश छोड़ देने से आया है. “अधिकाँश विशेषज्ञ डॉक्टर, ख़ासकर महिलाएँ, देश छोड़ चुके हैं... हमें पेशेवर स्टाफ़ ढूँढने में मुश्किल हो रही है.” इसका असर उनके अपने घर तक पहुँचा. उनकी बड़ी बेटी काबुल में मेडिकल स्कूल के पाँचवें वर्ष में थी, जब नई सरकार ने महिलाओं को उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया. “अब दुर्भाग्य से, वह घर पर है... वह कुछ नहीं कर सकती; उसकी पढ़ाई पूरी होने का कोई अवसर नहीं है.”एक परिवार का डरWHO का दायित्व शुरू से ही क्लीनिक में कामकाज जारी रखना था, जिसके लिए तकनीकी मार्गदर्शन, मेडिकल सामान की आपूर्ति और स्पष्ट दिशानिर्देश अहम हैं. इसमें मेडिकल स्टाफ़ को हौसला देना भी शामिल था. डॉक्टर सहक जब स्थानीय चिकित्सकों का मनोबल बढ़ा रहे थे, उस समय उनके परिजन जलालाबाद में चिन्ता के साथ समाचार देख रहे थे. उन्होंने अपने करियर में अफ़ग़ानिस्तान के अनेक हिस्सों में अस्पतालों और आपात स्वास्थ्य स्थितियों से जूझते हुए समय बिताया है, लेकिन यह आपदा बहुत नज़दीक थी. उस पहली रात, जब वह अन्ततः अपनी पत्नी और बच्चों के पास लौटे, तो सबसे पहले उनकी 85 वर्षीय माँ उनसे लिपट गई. “उन्होंने मुझे 10 मिनट से भी ज़्यादा देर तक गले लगाया.” उन्होंने डॉक्टर सहक को हल्के से डाँटा भी और उनसे यह वादा करने के लिए कहा कि वह फिर से प्रभावित इलाक़ों में नहीं जाएँगे. लेकिन नुरगल, चॉके, दारा-इ-नूर और अलिन्गर के निर्धन इलाक़ों में, हज़ारों लोग WHO पर निर्भर थे. इसलिए वह अगले ही दिन सुबह फिर निकल पड़े. © WHO विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) में डॉक्टर अब्दुल मतीन सहक और उनकी टीम ने कुनार प्रान्त में भूकम्प से प्रभावित हुए लोगों से मुलाक़ात की और आपात स्वास्थ्य सेवाओं का आकलन किया. जीवन और मृत्यु की डायरीमैंने शुक्रवार दोपहर जब उनसे बात की, तो डॉक्टर सहक की डायरी के आँकड़े इस आपात स्थिति की कहानी बयाँ कर रहे थे: 46 मीट्रिक टन चिकित्सा सामग्री पहुँचाई गई है; लैक्टेट, ग्लूकोज़ और सोडियम क्लोराइड की 15,000 से अधिक बोतलें वितरित की गई हैं. चोट लगने और पानी की कमी होने की स्थिति में उपचार के लिए ये आवश्यक तरल हैं. WHO की 17 निगरानी टीमें प्रभावित इलाक़ों में बीमारियों के फैलाव पर नज़र रखने के लिए तैनात की गईं, जो पेयजल और स्वच्छता प्रणालियों के बर्बाद होने के कारण जल्द फैल सकते हैं. यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने जीवनरक्षक स्वास्थ्य सेवाओं को पहुँचाने और सचल सेवाओं का स्तर बढ़ाने के लिए 40 लाख डॉलर की माँग की है. गम्भीर स्थिति वाले क़रीब 800 मरीजों को पहले ही जलालाबाद अस्पताल पहुँचाया जा चुका था. कुछ अन्य को असदाबाद के क्षेत्रीय अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर सहक और उनकी टीम मंगलवार को पहुँची.एक माँ के शब्दउन्होंने अस्पताल के बाहर एक वृद्ध महिला और उसकी बेटी को देखा जो इस आपदा में जीवित बच गए थे. वे धूप से बचने के लिए एक दीवार के पास छाया में बैठे थे. कुछ ही समय पहले, दोनों की अस्पताल से छुट्टी हुई थी, और परिवार में बस वही बचे थे. डॉक्टर सहक ने कहा कि “वे जीवित थे, लेकिन उनके परिवार के 13 सदस्यों की मौत हो चुकी थी.” उन्हें ले जाने वाला अब कोई नहीं था. लगभग 20 साल की युवती पूरी तरह टूट चुकी थी: “वह बोल भी नहीं पा रही थी. उसके चेहरे पर बस आँसू बह रहे थे.” डॉक्टर सहक ने अस्पताल से अनुरोध किया कि उन दोनों को एक या दो हफ़्तों के लिए एक बिस्तर में रखा जाए. स्थानीय निदेशक ने हामी भर दी. वह उस रात जब घर लौटे, तो उन्होंने इस घटना को अपने परिवार के साथ साझ किया. “यह सुनकर वे सभी रो पड़े और रात का खाना भी नहीं खा सके.”​ उसके बाद, उनकी माँ ने उन्हें रोकना छोड़ दिया था. उन्होंने कहा, “कृपया वहाँ जाओ और लोगों की मदद करो.”

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