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मानवाधिकार परिषद: 'हिंसा के महिमामंडन' और क़ानून के राज पर हमले की कड़ी निन्दा

 - World News in Hindi

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) वोल्कर टर्क़ ने दुनिया भर में ‘हिंसा के महिमामंडन’ और जन्मसिद्ध अधिकारों को कमज़ोर करने के ‘संगठित प्रयासों’ की कड़ी निन्दा की है. उन्होंने सोमवार को मानवाधिकार परिषद के सत्र को सम्बोधित करते हुए कहा कि देशों के लिए यह समय नीन्द से जागने और तुरन्त कार्रवाई करने का है. मानवाधिकार प्रमुख ने कहा कि, “जब मानवाधिकारों पर हमला हो रहा हो, तब कोई भी सुरक्षित नहीं है.” उन्होंने चेतावनी दी कि युद्ध के नियमों को “तार-तार किया जा रहा है,” और “कुछ देश अपने शासकों की व्यक्तिगत सत्ता का विस्तार मात्र बनते जा रहे हैं.”उच्चायुक्त टर्क ने जिनीवा में मानवाधिकार परिषद के नए सत्र की शुरुआत पर चिन्ता जताई कि युद्ध समर्थक प्रोपेगेंडा हर जगह फैल रहा है...सैन्य परेड से लेकर नेताओं की भड़काऊ बयानबाज़ी तक. Tweet URL

उन्होंने अफ़सोस जताया कि, “दुर्भाग्य से न तो कोई शान्ति परेड है और न ही शान्ति मंत्रालय.” साथ ही, देशों का आह्वान किया कि वे अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के बढ़ते क्षरण के विरुद्ध मज़बूती से खड़े हों.मानवाधिकार उच्चायुक्त ने बहुपक्षीय समझौतों को समर्थन देने का आग्रह करते हुए कहा कि ये हमारी शान्ति, वैश्विक व्यवस्था, व्यापार नियमों से लेकर वैश्विक इन्टरनैट, बुनियादी अधिकारों समेत हमारे दैनिक जीवन की आधारशिला हैं.”विश्व व्यवस्था पर संकटउच्चायुक्त टर्क़ ने चेतावनी दी है कि आज देशों की सरकारें उस नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की “अनदेखी, अनादर और उससे दूरी” बना रही हैं, जिसे वर्ष 1945 के बाद एक और विश्व युद्ध रोकने के लिए स्थापित किया गया था.उन्होंने इस प्रवृत्ति को बेहद ख़तरनाक क़रार देते हुए जवाबदेही सुनिश्चित किए जाने की अपील की.“जब देश क़ानून के उल्लंघनों को नज़रअन्दाज़ करते हैं, तो यह सामान्य हो जाता है. जब देश क़ानून को असंगत ढंग से लागू करते हैं, तो वे हर जगह क़ानूनी व्यवस्था को कमज़ोर करते हैं. अब समय है कि देश जागें और कार्रवाई करें.”उन्होंने यमन में संयुक्त राष्ट्र कर्मचारियों को अवैध ढंग से हिरासत में लिए जाने की कड़ी निन्दा करते हुए इसे “यूएन व्यवस्था पर सीधा हमला” क़रार दिया. साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पेरिस जलवायु समझौते और मानवाधिकार परिषद समेत अन्य वैश्विक संस्थाओं से बाहर निकलने के निर्णय पर गहरा खेद जताया.उन्होंने आगाह किया कि अब अन्य देश भी इसी राह पर चल रहे हैं.मानवाधिकार उच्चायुक्त ने बारूदी सुरंगों पर प्रतिबन्ध लगाने वाली ओटावा सन्धि से एस्तोनिया, फ़िनलैंड, लातविया, लिथुएनिया और पोलैंड द्वारा क़दम पीछे खींचने और उसके नकारात्मक नतीजों पर चिन्ता व्यक्त की.वोल्कर टर्क ने सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा की बढ़ती उपेक्षा और उसे कमतर आंकने की प्रवृत्ति पर भी क्षोभ जताया, जिसमें एक बेहतर दुनिया के निर्माण का ब्लूप्रिन्ट प्रस्तुत किया गया है.मानवाधिकारों की स्थिति पर चिन्ता संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने परिषद के नए सत्र के उदघटन सम्बोधन में दुनिया भर में चिन्ताजनक हालातों पर भी रौशनी डाली.उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों को सार्वजनिक जीवन से लगभग पूरी तरह “मिटा” दिया गया है. हेती निरन्तर अराजकता में “और गहराई तक डूबता” जा रहा है. नाइजीरिया में बोको हराम की उग्रवादी गतिविधियाँ दोबारा सिर उठा रही हैं. वहीं, सीरिया में शान्ति की ओर क़दम बढ़ रहे हैं लेकिन हालात अब भी ‘नाज़ुक’ हैं. © UNICEF/Oleksii Filippov यूक्रेन की राजधानी कीव में हमलों के बाद एक रिहायशी इमारत से मलबे को हटाया जा रहा है. (फ़ाइल) यूक्रेन में, हाल ही में अब तक के सबसे बड़े ड्रोन हमले के बाद रूसी सैन्य बलों का पूर्ण स्तर पर आक्रमण “और भी घातक” हो गया है. जबकि, सूडान में नॉर्थ दारफ़ूर प्रान्त की राजधानी अल-फ़शर पर लगातार बमबारी हो रही है, जहाँ लाखों लोग पिछले कई महीनों से घेराबन्दी में फँसे हैं और अत्याचारों का शिकार होने का जोखिम झेल रहे हैं.म्याँमार में, सैन्य तख़्तापलट के चार साल बीत जाने के बाद भी लोग “मानवाधिकारों की भयावह त्रासदी” में फँसे हुए हैं. काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य के पूर्वी हिस्से में, ‘चौंकाने वाले सबूत’ दर्शाते हैं कि युद्ध में शामिल सभी पक्षों ने मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघन और दुर्व्यवहार मामलों को अंजाम दिया है और ये अब भी जारी हैं.उच्चायुक्त टर्क ने ग़ाज़ा को “कब्रिस्तान” बताते हुए कहा कि वहाँ इसराइल द्वारा फ़लस्तीनी लोगों की “सामूहिक हत्याएँ” की जा रही हैं.“हम ग़ाज़ा के लोगों को निराश कर रहे हैं… जनसंहार रोकने के लिए ठोस क़दम कहाँ हैं? देश इन अत्याचारों को रोकने के लिए और ज़्यादा प्रयास क्यों नहीं कर रहे? इसराइल तक ऐसे हथियारों की आपूर्ति बन्द की जानी चाहिए, जिनसे युद्धक़ानून के उल्लंघन का ख़तरा है.” IOM 2021/Paula Bonstein अफ़ग़ानिस्तान की आधी से ज़्यादा आबादी, जीवित रहने के लिये, मानवीय सहायता पर निर्भर है, और उनके मानवाधिकारों पर भी जोखिम है. मानवाधिकार प्रमुख ने कहा कि चीन में उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए OHCHR द्वारा वांछित प्रगति ‘अभी तक हासिल नहीं हो सकी है.’पश्चिम अफ़्रीका में स्थित कुछ देशों में, आपसी सहमति से बने समलैंगिक रिश्तों को अपराध घोषित करने पर विचार हो रहा है, जिससे LGBTQ+ लोगों पर पाबन्दियाँ और बढ़ रही हैं. इसी तरह, प्रवासियों और शरणार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन भी तेज़ हो रहा है.आश्रय पर ख़तरामानवाधिकार प्रमुख ने कहा, “ईरान और पाकिस्तान ने लाखों अफ़ग़ानों को जबरन उनके देश वापिस भेज दिया है और भारत ने भी रोहिंग्या मुसलमानों के समूहों को ज़मीनी और समुद्री रास्तों से निर्वासित किया है.”इसी तरह जर्मनी, ग्रीस, हंगरी और अन्य योरोपीय देशों ने भी “आश्रय लेने के अधिकार को सीमित करने की कोशिश की है.”संयुक्त राज्य अमेरिका ने कथित तौर पर ऐल सल्वाडोर, दक्षिण सूडान, रवांडा और अन्य देशों के साथ तीसरे देशों के नागरिकों को निर्वासित करने का समझौता किया है.साथ ही, उन्होंने कुवैत के उस निर्णय पर चिन्ता जताई जिसके तहत हाल के वर्षों में हज़ारों लोगों की नागरिकता रद्द कर दी गई, जिससे कई लोग राष्ट्रविहीन हो गए. © UNICEF/Shehzad Noorani सूडान के उत्तरी दारफ़ूर प्रान्त की राजधानी अल-फ़शर शहर में, लाखों विस्थापित लोग रह रहे हैं. (फ़ाइल) चुनावी अपीलमानवाधिकार प्रमुख ने अफ़्रीका के कई देशों में आगामी चुनाव के मद्देनज़र, कैमरून, आइवरी कोस्ट, गिनी, गिनी-बिसाउ, मलावी, तंज़ानिया और युगांडा में चुनावी तैयारियों पर गम्भीर चिन्ता जताई.उन्होंने कहा कि इनमें से कई देशों में विपक्षी नेताओं को उत्पीड़न, बहिष्कार या हिरासत में लेने का शिकार बनाया जा रहा है, मीडिया की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है, शान्तिपूर्ण प्रदर्शन पर प्रतिबन्ध थोपे गए हैं, और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई करने जैसे तरीक़ों का सहारा लिया जा रहा है.वोल्कर टर्क़ ने इथियोपिया में मनमाने ढंग से पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की ख़बरों के बीच, सरकार से स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव सुनिश्चित किए जाने का आग्रह किया.उन्होंने सभी देशों से और अधिक प्रयास करने की अपील की, ताकि भविष्य में किसान, डिजिटल कार्यकर्ता, डॉक्टर या दुकानदार या कुछ और बनने वाला हर बच्चा यह समझ सके कि मानवाधिकार हमारे जन्मसिद्ध अधिकार हैं.

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