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भुखमरी से बेबस, ग़ाज़ा के परिवारों की, इस मुसीबत से मुक्ति या मौत की प्रार्थना

 - World News in Hindi

"मैं अपने बेटे को भूख से बिलबिलाते हुए बेबस देख रही थी. मेरे पास इस बेकसी में रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था, और मैंने अपने बेटे को अपनी भूख मिटाने के लिए, हमारे पास बहुत थोड़े से बचे-खुचे पानी में से चन्द घूँट पीने के लिए कहा." ग़ाज़ा पट्टी की की एक बेसहारा और बेबस माँ ज़ीनत ने अपनी व्यथा, यूएन न्यूज़ से बात करते हुए, कुछ इन्हीं शब्दों बयान की. ज़ीनत और उनके पति मोआमेन अबू अस्र, अपने बच्चों के साथ एक छोटे तम्बू में रहते हैं, जो कि ग़ाज़ा के तट पर मौजूद हज़ारों तम्बुओं में से एक है.कभी आराम और मौज-मस्ती की जगह रहा यह समुद्र तट, लगातार इसराइली बमबारी और सैन्य हमलों से विस्थापित फ़लस्तीनी जन के लिए, अन्तिम शरणस्थली बन गया है.इसराइल के बेदख़ली आदेश, लोगों को जैसे-जैसे विस्थापन के बाद, ज़मीन के छोटे-छोटे हिस्सों में धकेल रहे हैं, ग़ाज़ा के बन्दरगाह के आसपास का यह तटीय इलाक़ा एक अस्थाई शिविर में तब्दील हो गया है.इसके शरणार्थी बस्ती के फटे-पुराने तम्बू और भीड़-भाड़ वाली स्थिति, मानवीय संकट की गम्भीरता के दायरे को दर्शाती है जो इसराइली सेना और हमास के बीच 600 दिनों से ज़्यादा चले युद्ध के बाद अभूतपूर्व गहराई तक पहुँच गया है.यह बन्दरगाह कभी ग़ाज़ा की, मछली पकड़ने की अर्थव्यवस्था का केन्द्र था, मगर अब बंजर भूमि बन गया है. सभी नावें नष्ट हो गई हैं, और उनकी जगह एक विशाल शिविर खड़ा है - एक कठोर और बंजर वातावरण, जिसमें जीवित रहने के लिए लगभग कोई भी बुनियादी ज़रूरतें नहीं हैं. UN News उनके पास कुछ भी नहीं बचामोआमेन और उनका परिवार लगभग दो महीने से शिविर में रह रहे हैं, पास के मलबे से बरामद की गई टूटी-फूटी चटाई और टूटे बर्तनों से बने एक तम्बू में किसी तरह अपनी साँसें संभाले हुए हैं.वह अपने बच्चों के साथ बाहर बैठे हैं, अपने फ़ोन पर तस्वीरें देख रहे हैं, जिनमें नज़र आते हैं - ग़ाज़ा शहर के पूर्वी इलाक़े में शुजाइया में पीछे छूटे पिछले जीवन के बिखरे हुए टुकड़े, जब वहाँ के निवासियों को इसराइली अधिकारियों ने, कोई चेतावनी दिए बिना ही, इलाक़े को ख़ाली करने का आदेश दिया था.उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया, "ऐसे दौर भी आए हैं जब हम हर दो महीने में एक बार विस्थापित हुए हैं. हमारे लिए हर दिन पीड़ादाई है. हम ग़ाज़ा बन्दरगाह पर बिना भोजन, बिना पानी के आए थे - यहाँ तक कि हम अपना स्टील का तम्बू भी नहीं ला पाए."उन्होंने कहा, "हमें जीवन की बुनियादी चीज़ें भी मयस्सर नहीं हैं. हमारी स्थिति बहुत कठिन है, और हम नहीं जानते कि क्या करें. ईश्वर की क़सम, यह जीवन नहीं है. ऐसे हालात से तो बेहतर, हम मरना पसन्द करेंगे."मोआमेन अपने परिवार का पेट पालने के लिए पाँच शेकेल - लगभग $1.43 – में पानी के छोटे टैंकों की मरम्मत करते हैं. ये छोटी सी रक़म उस जगह पर, कोई भी चीज़ ख़रीदने के लिए मुश्किल से पर्याप्त है, जहाँ कीमतें आसमान छू रही हैं. "एक किलो आटे की क़ीमत लगभग सौ शेकेल यानि लगभग $28.60 है. UN News 'हम पानी पीकर जीवित रहते हैं'मार्च के बाद से मानवीय स्थिति और भी ख़राब हो गई है, जब इसराइली अधिकारियों ने, ग़ाज़ा में सहायता आपूर्ति पर प्रवेश पर पूर्ण नाकाबन्दी लगा दी थी.हालाँकि हाल के सप्ताहों में इस पाबन्दी में थोड़ी ढील दी गई थी, लेकिन सहायता सामग्री की सीमित मात्रा, भारी मांग को पूरा नहीं कर सकती है. हताश, भूखे और भयभीत लोग, जो भी सहायता सामग्री आती है उसे लूटने का सहारा लेते हैं.अपने तम्बू में, ज़ीनत खाना पकाने के कुछ बर्तन धोती हैं. उन्हें सामुदायिक अस्थाई रसोई से कुछ खाद्य सामग्री मिलने की आस है. उनके पास अधिकांश दिनों में, खाना बनाने के लिए कुछ नहीं होता है.ज़ीनत कहती हैं, "कल मैं अपने बेटे के बारे में बहुत रोई. उसने मुझसे कहा था, 'माँ, मुझे खाना चाहिए.' मैं असहाय खड़ी थी, समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ. खाना चैरिटी किचन से नहीं आया था. अब हम पानी पीकर जी रहे हैं. मैं अपने बच्चों को पेट भरने के लिए पानी को पीने की सलाह देती हूँ. आज, अल्लाह का शुक्र है, हमें एक प्लेट भर खाना मिला और हम उसे खा सके." UN News 'बस, बहुत हो गया'शिविर में हालात बहुत ख़राब हैं. हर जगह मक्खियों के झुंड हैं, और आवारा कुत्ते - दुबले-पतले और भूखे - आस-पास घूम रहे हैं. "कल, एक कुत्ता टैंट में दाख़िल हो गया और उस तिरपाल को खींच रहा था जिस पर मेरा बेटा सो रहा था. मुझे लगा कि वह मेरे बच्चे को खींच रहा है. मैं चिल्लाई और मेरे पति ने कुत्ते को बाहर निकाल दिया.""हमें नहीं मालूम कि कहाँ जाना है या क्या करना है. उन्होंने हमें उखाड़ फेंका. हमारा दिल टूट चुका है. हम अब और सब्र नहीं कर सकते. हमारा धैर्य पूरी तरह ख़त्म हो चुका है."ग़ाज़ा के तट पर बिखरे हुए टैंट, गहराती मानवीय त्रासदी के स्पष्ट प्रतीक हैं. भूख से बिलखते लोगों की चीखों के सामने, किसी भी उम्मीद की आवाज़ें फीकी पड़ रही हैं. अब कोई आश्रय नहीं बचा है - केवल समुद्र बचा है.जीनत की अंतिम अपील से ज़्यादा निराशा को और कुछ नहीं समझा सकता: “युद्ध खत्म हो जाए. हमें आराम करने दो. नहीं तो, सभी देश एक साथ आएं और हम पर परमाणु बम गिरा दें और हमारी तकलीफ़ें खत्म कर दें, क्योंकि हम इस ज़िंदगी से थक चुके हैं. बस बहुत हो गया.”

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