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पीएम मोदी की दस्तक से खुले भारत के लिए बंद पड़े दरवाजे

PM Modis Arrival Opens Doors That Were Shut to India - World News in Hindi

नई दिल्ली। दृश्य की कल्पना कीजिए! जनवरी 2008, पर्थ। भारत के विशेष दूत एक अरब से अधिक आबादी वाले ऊर्जा-संकट से जूझ रहे देश के लिए यूरेनियम की मांग लेकर उस देश के पास पहुंचे जिसके पास दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडारों में से एक है। लेकिन उन्हें टका सा जवाब मिला 'नहीं।' भारत से कहा गया, 'पहले परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करें, वरना वापस जाएं।' भारत वापस लौट गया। अब स्थिति बदल चुकी है। साल 2026, महीना जुलाई और जगह ऑस्ट्रेलिया का मेलबर्न। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं और घोषणा करते हैं कि ऑस्ट्रेलिया भारतीय परमाणु रिएक्टरों को यूरेनियम देगा। इस बार कोई उपदेश नहीं, कोई शर्त नहीं, भारत द्वारा दशकों से सम्मानपूर्वक अस्वीकार की गई संधि पर हस्ताक्षर करने की मांग नहीं। केवल एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में भारत को दिया गया सम्मान। भारत के दूत के लिए जो दरवाजा कभी बंद कर दिया गया था, वही दरवाजा अब भारत के नेता के लिए खुला है। इन दोनों दृश्यों के बीच प्रधानमंत्री मोदी की जकार्ता, मेलबर्न और ऑकलैंड यात्रा की कहानी है। यह केवल यात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि उन दरवाजों की कहानी है जो दशकों तक भारत के लिए बंद रहे और अब एक-एक करके खुल रहे हैं।
वह ईंधन जिसे देने से इनकार किया गया था!
यूरेनियम का इतिहास पूरी तरह बताया जाना चाहिए, क्योंकि राजनीतिक सुविधा के कारण सबसे पहले स्मृति ही प्रभावित होती है।
2006 में जब अमेरिका भारत के साथ नागरिक परमाणु सहयोग को आगे बढ़ा रहा था, तब ऑस्ट्रेलिया ने इसका समर्थन नहीं किया। 2008 में ऑस्ट्रेलिया ने अपनी पहले की सैद्धांतिक सहमति से भी पीछे हट गया। पूरे यूपीए शासनकाल में यही स्थिति बनी रही। दिल्ली ने आग्रह किया, लेकिन कैनबरा ने इनकार किया। हैरानी की बात यह थी कि ऑस्ट्रेलिया लोकतांत्रिक भारत को यूरेनियम देने से इनकार करते हुए चीन को इसकी बिक्री पर चर्चा करता रहा।
जब यूपीए सरकार सत्ता से बाहर हुई, तब तक ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की भारत तक कानूनी आपूर्ति का कोई रास्ता नहीं बना था। सत्ता संभालने के लगभग 100 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री मोदी ने सितंबर 2014 में लंबे समय से लंबित नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
इस सप्ताह मेलबर्न में अंतिम प्रशासनिक बाधा भी दूर हो गई और आपूर्ति शुरू हो गई, जो भारत के 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में एक कदम है।
बदलाव को समझना जरूरी है। बदलाव भारत की उस संधि को लेकर स्थिति में नहीं आया जिसे भारत ने सही कारणों से स्वीकार नहीं किया। बदलाव दुनिया के भारत को देखने के नजरिये में आया और नियमों के पालन के तरीके में आया।
रक्षा क्षेत्र में भारत की नई भूमिका
अगर मेलबर्न ने यह बदला कि भारत क्या खरीद सकता है, तो जकार्ता ने यह बदला कि भारत अब क्या बेच सकता है।
सत्तर वर्षों तक भारत की रक्षा कहानी एक खरीदार की कहानी रही, जहां विदेशी राजधानियों के बाहर कतारों में खड़ा होना पड़ता था। जकार्ता में यह स्थिति बदल गई।
भारत और इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की आपूर्ति के लिए समझौते किए। इसके साथ इंडोनेशिया फिलीपींस और वियतनाम के बाद तीसरा देश बन गया जिसने भारतीय रक्षा तकनीक पर भरोसा जताया। इसके अलावा 'अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली' से संबंधित समझौते भी हुए।
ब्रह्मोस की विश्वसनीयता उसके वास्तविक युद्ध अनुभव से जुड़ी है। दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने बदलते सुरक्षा माहौल को देखते हुए भारतीय रक्षा क्षमता को चुना। यह केवल एक सौदा नहीं, बल्कि एक भरोसे और विश्वास का संकेत है।
भूगोल को रणनीति में बदलना
जकार्ता में हुआ बंदरगाह समझौता मिसाइलों से भी अधिक महत्वपूर्ण है। भारत और इंडोनेशिया मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार पर स्थित सबांग बंदरगाह के विकास में सहयोग करेंगे। यह भारत के आगामी ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट हब से लगभग 160 किलोमीटर दूर है।
दो बंदरगाह, दो झंडे, लेकिन एक ऐसा समुद्री मार्ग जो दुनिया के लगभग एक-तिहाई व्यापार को प्रभावित करता है।
दोनों देश महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा रहे हैं। इंडोनेशिया के पास दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत निकेल भंडार हैं।
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक और सैन्य सम्मान 'बिंतांग आदिपूर्णा' से सम्मानित किया।
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी योग्यकार्ता गए, जहां हजार वर्ष पुराने प्रम्बानन मंदिरों के बीच भारत ने इस महान हिंदू धरोहर के संरक्षण में सहयोग का संकल्प लिया।
वर्तमान के लिए मिसाइलें, भविष्य के लिए बंदरगाह और अनंत काल के लिए मंदिर एक ही यात्रा में कूटनीति के तीन स्तरों को जोड़ता है।
विश्वास की गति से व्यापार
व्यापार के क्षेत्र में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। 2022 के व्यापार समझौते के बाद भारत-ऑस्ट्रेलिया द्विपक्षीय व्यापार में 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) को जल्द पूरा करने का निर्देश दिया है।
ऑस्ट्रेलियाई निवेश संस्था 'ऑस्ट्रेलियन सुपर' ने भारत में 50 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के निवेश की घोषणा की। प्रधानमंत्री मोदी ने भी ऑस्ट्रेलिया के चार ट्रिलियन डॉलर के पेंशन फंड को भारत के बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए आमंत्रित किया।
चार दशक का अंतर एक सुबह झटके से खत्म
न्यूजीलैंड की कहानी भी इसी बदलाव को दर्शाती है। चार दशकों में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड गया। व्यापार वार्ताएं वर्षों से लंबित थीं, लेकिन वर्तमान सरकार ने तेजी से मुक्त व्यापार समझौते को पूरा किया।
ऑकलैंड में पारंपरिक 'माओरी पोविरी' स्वागत समारोह के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने नई रणनीतिक साझेदारी और 2030 रोडमैप की घोषणा की, जिसमें समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, साइबर रक्षा, 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर के व्यापार लक्ष्य और भारतीय नौसेना तथा न्यूजीलैंड रक्षा बल के बीच लॉजिस्टिक्स समझौता शामिल है।
अब भारतीय नौसेना का जहाज ऑकलैंड में सहायता और आपूर्ति प्राप्त कर सकता है। यह दर्शाता है कि भारत की समुद्री साझेदारी का विस्तार हिंद महासागर से दक्षिण प्रशांत तक हो रहा है।
एक रणनीति ने खोले कई दरवाजे
जब इन उपलब्धियों को साथ रखकर देखा जाता है तो एक तस्वीर सामने आती है। एक देश जिसे दो दशकों तक यूरेनियम से कोसों दूर रखने की कोशिश की गई, अब भारत तक पहुंच रहा है। जिन रक्षा प्रणालियों को भारत कभी आयात करता था, अब उनका निर्यात कर रहा है। वर्षों से अटके व्यापार समझौते तेजी से पूरे हो रहे हैं। जिस देश को कभी संधियों पर उपदेश दिए जाते थे, उसी देश के नेता को अब वही राजधानियां सम्मान दे रही हैं।
यह केवल संयोग नहीं है, बल्कि वर्षों से बनाई गई विश्वसनीयता का परिणाम है। देश उन लोगों का सम्मान करते हैं जिनकी भूमिका और प्रभाव को वे महत्व देते हैं। जब ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में भारतीय समुदाय की बड़ी सभा के सामने प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े होते हैं, तो यह केवल औपचारिक सम्मान नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की स्वीकृति है।
अंत में एक विचार
सदियों पहले कलिंग और चोल साम्राज्य के जहाज इन्हीं समुद्री मार्गों से व्यापार, संस्कृति और सभ्यता लेकर पूर्व की ओर गए थे। प्रम्बानन के पत्थर आज भी उस इतिहास की गवाही देते हैं। इस सप्ताह भारतीय प्रधानमंत्री ने उसी प्राचीन मार्ग को फिर से जोड़ा! विजय के लिए नहीं, बल्कि साझेदारी के साधनों के साथ, और फिर हर बंदरगाह को खुला पाया।
दरवाजे अपने आप नहीं खुलते। उन्हें खोलने के लिए किसी को अपनी क्षमता, धैर्य और सम्मान के साथ दस्तक देनी पड़ती है।
दशकों तक दुनिया ने भारत को इंतजार कराया। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में यह इंतजार समाप्त हुआ। भारत अब दुनिया के दरवाजों पर केवल दस्तक नहीं देता, बल्कि दुनिया भारत के लिए अपने दरवाजे खोल रही है।
(लेखक भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)
--आईएएनएस

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