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आरबीआई ने फिर बढ़ाई रेपो रेट, विकास दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान

RBI hikes repo rate by 50 basis points, pegs inflation at 6.7 percent & eco growth at 7 percent - India News in Hindi

चेन्नई । जैसा कि पहले से अनुमान था, भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने 5:1 के फैसले में शुक्रवार को रेपो दर को 50 आधार अंकों से बढ़ाकर 5.90 प्रतिशत कर दिया। एमपीसी के प्रमुख और आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने मुद्रास्फीति को कम करने के लिए बढ़ोतरी की घोषणा की।

दास ने कहा, "मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिति और उसके दृष्टिकोण के आकलन के आधार पर, एमपीसी के छह में से पांच सदस्यों ने तत्काल प्रभाव से रेपो रेट को 50 आधार अंकों से बढ़ाकर 5.9 प्रतिशत करने का निर्णय लिया।"

उन्होंने कहा, "एमपीसी ने इस बात पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया कि मुद्रास्फीति लक्ष्य के भीतर बनी रहे, साथ ही विकास की गति को समर्थन भी जारी रहे।"

मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक 28, 29 और 30 सितंबर को हुई थी।

आरबीआई गवर्नर ने कहा, "नतीजतन, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.65 प्रतिशत और सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसफ) दर और बैंक दर 6.15 प्रतिशत तक समायोजित हो गई है।"

नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के औचित्य के बारे में बताते हुए दास ने कहा कि वैश्विक आर्थिक परि²श्य काफी खराब है, मंदी की आशंका बढ़ रही है, और सभी क्षेत्रों में मुद्रास्फीति अधिक है।

उन्होंने आगे कहा, "उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाएं (ईएमई), विशेष रूप से, वैश्विक विकास को धीमा करने, खाद्य और ऊर्जा की ऊंची कीमतों, उन्नत अर्थव्यवस्था नीति के सामान्यीकरण, ऋण संकट और तेज मुद्रा मूल्यह्रास की चुनौतियों का सामना कर रही हैं।"

बड़े प्रतिकूल आपूर्ति झटकों, घरेलू मांग में कुछ मजबूती और वैश्विक वित्तीय बाजारों से स्पिलओवर के कारण उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति लक्ष्य के ऊपरी टोलरेंस बैंड से ऊपर बनी हुई है।

उन्होंने कहा कि कच्चे तेल सहित वैश्विक कॉमोडिटी कीमतों में हालिया सुधार, यदि जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में लागत दबाव कम हो सकता है। भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक वित्तीय बाजार की भावनाओं से उत्पन्न अनिश्चितताओं के साथ मुद्रास्फीति पर संकट के बादल छाए हुए हैं।

दास ने कहा, "इस पृष्ठभूमि में, एमपीसी का विचार था कि उच्च मुद्रास्फीति के बने रहने से मूल्य दबावों के विस्तार को रोकने, मुद्रास्फीति को स्थिर करने और दूसरे दौर के प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक समायोजन की और अधिक मात्रा में निकासी की आवश्यकता होती है। यह कार्रवाई मध्यम अवधि के विकास की संभावनाओं का समर्थन करेगी।"

दास ने कहा कि वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद 2022-23 की पहली तिमाही में 13.5 प्रतिशत (वर्ष-दर-वर्ष) की वृद्धि हुई, जो पूर्व-महामारी के स्तर को 3.8 प्रतिशत से अधिक कर देती है।

यह निजी खपत और निवेश मांग में मजबूत वृद्धि के कारण हुआ।

आर्थिक गतिविधि ठीक ठाक है और निवेश बढ़ रहा है। बैंक क्रेडिट भी बढ़ा है। विनिर्माण क्षेत्र में क्षमता उपयोग में वृद्धि हुई है जबकि व्यापारिक निर्यात कुछ प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहा है।

मुद्रास्फीति पर दास ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम घरेलू मुद्रास्फीति प्रक्षेपवक्र पर भारी पड़ रहे हैं। अगस्त में मुद्रास्फीति बढ़कर 7 प्रतिशत हो गई, जो जुलाई में 6.7 प्रतिशत थी।

आयातित मुद्रास्फीति (उच्च आयात कीमतों के कारण मूल्य वृद्धि) -- में थोड़ी कमी हुई है लेकिन अभी भी उच्च स्तर पर है। उन्होंने कहा कि प्रमुख उत्पादक देशों से आपूर्ति में सुधार और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से खाद्य तेल की कीमतों का दबाव कम रहने की संभावना है।

खाद्य कीमतों में तेजी के जोखिम की ओर इशारा करते हुए दास ने कहा कि खरीफ धान के कम उत्पादन की संभावना के कारण अनाज की कीमतों का दबाव गेहूं से चावल तक फैल रहा है।

मानसून की देरी से वापसी और विभिन्न क्षेत्रों में तेज बारिश ने सब्जियों की कीमतों, खासकर टमाटर की कीमतों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। खाद्य मुद्रास्फीति पर ये प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

कच्चे तेल की कीमतों के संबंध में, उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2023 की पहली छमाही में इसकी कीमत लगभग 104 डॉलर प्रति बैरल थी, जो दूसरी छमाही में 100 डॉलर प्रति बैरल होने का अनुमान है।

--आईएएनएस

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