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विरोधियों के साथ अपनों की भी खिलाफत झेलनी पड़ रही है सीएम मनोहर लाल को

Opponents are also facing the challenge of the opponents, CM Manohar Lal - Chandigarh News in Hindi

चंडीगढ। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल को इन दिनों कई मार्चों पर जूझना पड़ रहा है। विरोधियों के साथ-साथ उन्हें अपनों की खिलाफत भी झेलनी पड़ रही है। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को मिली जीत के बाद मुख्यमंत्री को उम्मीद है कि पार्टी आलाकमान हरियाणा के नाराज विधायकों को ज्यादा तवज्जो नहीं देगा। ऐसे में आने वाले दिनों में भाजपा के असंतुष्ट विधायकों को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ सकता है। सतलुज-यमुना जोड़ नहर (एसवाईएल) निर्माण मामले में सुप्रीम कोर्ट का हरियाणा के हक में फैसला आने के बाद इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) ने मनोहर सरकार के खिलाफ अभियान चलाया हुआ है। नहर की खुदाई के मुद्दे पर इनेलो कार्यकर्ताओं ने पंजाब-हरियाणा की सीमा प्रदर्शन किया और गिरफ्तारियां दीं। इसी मसले को लेकर दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और संसद के घेराव की कोशिश में दिल्ली पुलिस की लाठियां खाई। इस दौरान कई बुजुर्ग और महिलाएं भी पुलिस की लाठियों से जख्मी हो गए। इनेलो आने वाले विधानसभा चुनावों तक इस मुद्दे को गर्म रखेगा। विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला राज्य के लोगों के बीच यह संदेश भेजना चाह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद मुख्यमंत्री मनोहर लाल नहर निर्माण की दिशा में कोई कदम नहीं उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री नहर के मामले में चार महीने के इंतजार के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने तक का समय नहीं ले पाए हैं।
इस मामले में मुख्यमंत्री का कहना है कि नहर निर्माण के मसले पर सरकार गंभीर है और हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दशकों से उलझे इस मुद्दे पर श्रेय लेने की राजनीति नहीं होनी चाहिए। जहां जो जरूरी होगा, उनकी सरकार सही कदम उठाएगी।
जाटों के आरक्षण के मामले में 20 मार्च के दिल्ली कूच के ऐलान ने भी मनोहर सरकार की चिंता बढ़ा दी है। आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने आंदोलनकारी जाटों से कहा है कि दिल्ली कूच के दौरान पुलिस उन्हें जहां भी रोके, हिंसा का रास्ता अपनाने के बजाय वे वहीं अपने तंबू गाड़ कर बैठ जाएं। हालांकि, दिल्ली कूंच को देखते हुए हरियाणा में सशस्त्र बलों की 101 कंपनियां तैनात कर दी गई हैं। भारी सुरक्षा इंतजाम के बावजूद जाटों की तरफ से दिल्ली घेराव की तैयारियां जारी है।
पिछले जाट आंदोलन के दौरान हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बाद 31 युवाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी थीं। करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ा था। इस बार हिंसा का रास्ता अपनाने के बजाय जाटों ने धैर्य का परिचय दिया है। आरक्षण सहित कुछ अन्य मांगों को ले कर चल रहे आंदोलन को एक महीने से ज्यादा समय हो गया है। दिल्ली कूच की तारीख नजदीक आने पर मनोहर सरकार ने एक बार फिर आंदोलनकारियों से बातचीत की पहल की है। मुख्यमंत्री को उम्मीद है कि बातचीत के माध्यम से 20 मार्च से पहले ही दिल्ली कूंच का मसला सुलझा लिया जाएगा।
मुख्यमंत्री को न केवल विरोधियों से लोहा लेना पड़ रहा है, बल्कि इन दिनों उनकी अपनी ही पार्टी के विधायकों ने भी उन्हें परेशान कर रखा है। ग्वाल पहाड़ी घोटाले, मेट्रो के रूट में बदलाव और बिजली मीटरों की खरीद में गड़बड़ी के मुद्दे विरोधियों ने नहीं, बल्कि उन्हीं की पार्टी के असंतुष्ट विधायकों ने उठाए हैं। बजट सत्र में इस बार असंतुष्ट विधायकों का रवैया मौजूदा सरकार के प्रति सकारात्मक नहीं था। भाजपा आलाकमान ने भी इस नाराजगी को गंभीरता से लिया है। यही वजह है कि पार्टी के राष्ट्रीय सह महामंत्री वी.सतीश को नाराज विधायकों की आवाज सुनने की जिम्मेदारी दी गई है।
इस संबंध में नाराज विधायकों के अलावा पार्टी के पदाधिकारियों ने भी मनोहर सरकार के कामकाज पर असंतुष्टि जाहिर की है। भाजपा के 17 जिला अध्यक्षों का आरोप है कि उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है और भ्रष्ट अफसरों को मंत्री ही बचाने में लगे हुए हैं। सभी से बातचीत के बाद वी. सतीश पार्टी आलाकमान को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे। उनकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई होगी, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर लाल आश्वस्त हैं कि आपसी बातचीत से मसले सुलझा लिए जाएंगे। असंतुष्ट विधायकों का दबी जुबान में मानना है कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के पक्ष में आए चुनाव नतीजों के कारण शायद उनके विरोध की आवाज को दबा दिया जाए।

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