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परंपरागत गमछा उद्योग संकट में : रानाघाट के बुनकरों की बदहाली

Traditional Gamchha industry in crisis: Plight of Ranaghat weavers - Nadia News in Hindi

नदिया। गमछा—सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की ग्रामीण संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है। खेतों में पसीना पोछने से लेकर पूजा-पाठ तक, यह एक बहुप्रचलित वस्तु रही है। गर्मी में सिर ढकने, बारिश में शरीर ढकने और सर्दी में खुद को ओढ़ने तक इसकी उपयोगिता बहुआयामी है। बंगाल, बिहार, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में तो यह पहचान और शान दोनों है। रानाघाट का रामनगर आईसतला: एक समय था जब गूंजती थीं करघों की आवाजेंरानाघाट के रामनगर आईसतला इलाके में गमछा निर्माण की परंपरा 30-40 वर्षों पुरानी है। पहले यहां की गलियों में करघों की लगातार खटर-पटर सुनाई देती थी। परिवार के परिवार इस पारंपरिक कुटीर उद्योग से जुड़े थे। मजदूर, कारीगर, व्यापारी, रंगाई करने वाले—all were part of this chain. लेकिन आज हालात इतने खराब हैं कि दर्जनों फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं, और जो बची हैं वे भी घाटे में चल रही हैं।
संकट की जड़ें: आधुनिक प्रतिस्पर्धा और सरकारी उपेक्षागमछा उद्योग को आज जिन मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वे हैं:
कच्चे माल की कमी और कीमतों में वृद्धिगमछा बनाने के लिए जरूरी सूत की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पहले जो सूत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होता था, वह अब महंगे दामों पर बाहर से मंगाना पड़ता है।
कारीगरों का पलायनमजदूरी कम मिलने और काम की अनिश्चितता के कारण कुशल कारीगर दूसरे क्षेत्रों में मजदूरी या निर्माण कार्य में चले गए हैं।
बिजली और मशीनों की समस्याबिजली की कटौती और पुराने करघों के कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा है। आधुनिकीकरण के लिए पूंजी नहीं है।
सरकारी सहायता का अभावन तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार की तरफ से कोई विशेष पैकेज या योजना इस पारंपरिक उद्योग के लिए लागू की गई है।
चीनी और मशीन-निर्मित उत्पादों से मुकाबलाबाजार में सस्ते दर पर उपलब्ध मिल-मेड तौलियों और गमछों ने पारंपरिक गमछा व्यापार को नुकसान पहुंचाया है।
एक स्थानीय उद्यमी की दास्तान: “हम सिर्फ परंपरा के लिए टिके हैं”रामनगर के गमछा निर्माता नित्यानंद हलदार कहते हैं:
“हमारे पिताजी इस काम को करते थे। हमने भी इसी को अपनाया। लेकिन अब ना मुनाफा है, ना श्रमिक मिलते हैं। फिर भी हम इस काम को छोड़ नहीं पा रहे क्योंकि यह हमारी पहचान है।”
नित्यानंद ने बताया कि वे 10 करघों से काम शुरू करते थे, लेकिन अब सिर्फ 2 ही चल पा रहे हैं। मजदूरी देने के लिए पैसे नहीं बचते।
महिलाओं की भागीदारी भी संकट मेंइस क्षेत्र की महिलाएं भी गमछा रंगने और तैयार करने में अहम भूमिका निभाती थीं। लेकिन अब जब काम घटा है, तो उनकी आमदनी भी खत्म हो गई है। कई महिलाओं को घरेलू नौकरानी या बीड़ी बनाने जैसे विकल्प अपनाने पड़े हैं।
व्यापारी बोले: “बाजार तो है, लेकिन लागत संभालना मुश्किल”स्थानीय व्यापारी गौरांग मजूमदार बताते हैं:
“बंगाल के अलावा बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, यहां तक कि महाराष्ट्र में भी रानाघाट के गमछों की मांग है। लेकिन लागत इतनी बढ़ चुकी है कि हम बाजार में टिक नहीं पा रहे।”
क्या कर सकती है सरकार?सरकार द्वारा निम्न उपाय किए जा सकते हैं:
सूक्ष्म और लघु उद्योग मंत्रालय द्वारा विशेष पैकेजविशेष आर्थिक सहायता और सब्सिडी देकर इस उद्योग को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
बुनकरों के लिए बीमा और पेंशन योजनाएंताकि वे जीवन सुरक्षा और वृद्धावस्था में सहारा पा सकें।
तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक मशीनों की सहायताताकि कम लागत में बेहतर गुणवत्ता का उत्पादन हो सके।
बाजार विस्तार और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जोड़नागमछा को एक "हैंडलूम ब्रांड" के तौर पर राष्ट्रीय पहचान दी जा सकती है।
संस्कृति भी खतरे में है, सिर्फ रोजगार नहींगमछा सिर्फ रोजगार नहीं, एक सांस्कृतिक प्रतीक है। यह बंगाल की ग्रामीण पहचान, परंपरा और आत्मसम्मान का हिस्सा है। इसके पतन के साथ एक सांस्कृतिक धरोहर भी खो रही है।
रानाघाट का गमछा उद्योग आज दोराहे पर खड़ा है—जहां परंपरा और पहचान को बचाने के लिए संघर्ष जारी है, लेकिन संसाधनों और सरकारी सहयोग के अभाव में वह धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है। यह समय है जब नीति-निर्माताओं को स्थानीय हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों की तरफ गंभीरता से ध्यान देना चाहिए, वरना हम एक और सांस्कृतिक धरोहर खो बैठेंगे।

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Web Title-Traditional Gamchha industry in crisis: Plight of Ranaghat weavers
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