कोलकाता। पश्चिम बंगाल के मानचित्र पर जब आप नजर दौड़ाते हैं, तो हुगली, अजय और दामोदर नदियों के बीच बसा एक इलाका अपनी हरियाली से आपका ध्यान खींच लेता है। यह है 'बर्धमान पूर्व', जिसे सदियों से बंगाल का 'धान का कटोरा' कहा जाता है।
2017 में जब प्रशासनिक सुविधा के लिए बर्धमान जिले को दो हिस्सों में बांटा गया, तो पूर्व बर्धमान एक नए अस्तित्व के साथ उभरा। 7 विधानसभा क्षेत्रों को समेटे यह लोकसभा सीट अनुसूचित जाति (एसएसी) के लिए आरक्षित है।
बर्धमान पूर्व की जमीन दो रंगों में रंगी है। पूर्व की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी जो धान, आलू और सरसों के उपज के लिए जानी जाती है और पश्चिम लाल मिट्टी के लिए जानी जाती है। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
जनसांख्यिकी के नजरिए से यह सीट एक 'पॉलिटिकल थ्रिलर' से कम नहीं है। करीब 85 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गांवों में बसती है। यहां 73.75 प्रतिशत हिंदू और 25.14 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। यह 25 प्रतिशत मुस्लिम तबका चुनावों में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाता है।
चूंकि यह सीट एससी वर्ग के लिए आरक्षित है, इसलिए असली खेल दलित वोटों के भीतर चलता है। बाहर से देखने पर एससी वर्ग एक लगता है, लेकिन भीतर गहरी खाई है। यहां मुख्य रूप से तीन उप-जातियां (नामशूद्र, बाग्दी और बाउरी) हैं।
नामशूद्र समुदाय ने शिक्षा (लगभग 80 प्रतिशत साक्षरता) और राजनीति में जबरदस्त तरक्की की है। सरकारी नौकरियों से लेकर नेतृत्व तक में उनका दबदबा है। वहीं, दूसरी ओर बाग्दी और बाउरी समुदाय आज भी हाशिए पर हैं। इनकी साक्षरता दर 38 से 60 प्रतिशत के बीच है और ये मुख्य रूप से भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं। राजनीतिक दल इन्हीं वंचित समुदायों के बीच कल्याणकारी योजनाओं का जाल फेंककर सत्ता की चाबी तलाशते हैं।
बर्धमान की अर्थव्यवस्था राइस मिलों के पहियों पर चलती है। यहां विकास की कुछ किरणें भी दिखती हैं। 'शिल्पा सेतु' (334 करोड़ रुपए) और भगीरथी पर 1,098 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा 'कालना-शांतिपुर पुल' यहां के भूगोल को बदलने वाले हैं। ये पुल न केवल दूरियां मिटाएंगे, बल्कि नदिया के विश्व प्रसिद्ध 'तंत साड़ी' बुनकरों को बर्धमान के बड़े बाजारों से जोड़ देंगे।
बर्धमान पूर्व लोकसभा सीट महज एक चुनाव क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह 7 अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों का एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसे भेदना विपक्ष के लिए लोहे के चने चबाने जैसा रहा है। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि यहां ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का एकछत्र राज है। इन सातों सीटों पर वर्तमान में टीएमसी के ही विधायक काबिज हैं।
रैना (एससी): कृषि बहुल आरक्षित सीट पर तृणमूल की मजबूत पकड़ है। पंचायत स्तर के मजबूत नेटवर्क ने यहां टीएमसी विधायक शंपा धारा की स्थिति को अजेय बना रखा है।
जमालपुर (एससी) : दलित और अल्पसंख्यक बहुल इस क्षेत्र में सरकार की 'लक्ष्मी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने आलोक कुमार माझी को बड़ी जीत दिलाई है।
कालना (एससी): तंत साड़ी के बुनकरों और किसानों के इस क्षेत्र में भी सत्ताधारी दल का भारी दबदबा है। यहां भी टीएमसी के देबोप्रसाद बाग मौजूदा विधायक हैं।
मेमारी एक प्रमुख व्यापारिक, परिवहन और कृषि केंद्र है। यहां से जीते टीएमसी के विधायक मधुसूदन भट्टाचार्य ने पार्टी के ग्रामीण वोट बैंक को मजबूती से बांध कर रखा है।
पुरबस्थली दक्षिण: यह इलाका राज्य के टीएमसी कद्दावर मंत्री स्वपन देबनाथ का अभेद्य गढ़ माना जाता है। नदी तट के किनारे बसे इस क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता भी काफी अधिक है।
पुरबस्थली उत्तर: भगीरथी नदी के कटाव जैसी गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझने के बावजूद यहां का राजनीतिक मिजाज तपन चटर्जी और तृणमूल के पक्ष में झुका हुआ है।
कटवा विधानसभा सीट: कटवा थर्मल पावर प्रोजेक्ट के जमीन अधिग्रहण के पुराने विवाद और नदी कटाव यहां के बड़े मुद्दे हैं। फिर भी, टीएमसी के रवींद्रनाथ चटर्जी जैसे अनुभवी नेता ने यहां अपना किला सुरक्षित रखा है।
सातों विधानसभाओं में यह 'क्लीन स्वीप' दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर तृणमूल का संगठन कितना मजबूत है। पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक, इस 'धान के कटोरे' में फिलहाल घास-फूल ही लहलहा रहा है।
पिछले एक दशक में बर्धमान पूर्व की सियासी जमीन ने कई भूकंप देखे हैं। 2014 में यहां असली लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और वामदलों (सीपीआई-एम) के बीच थी, तब भाजपा मात्र 13 प्रतिशत वोटों पर थी।
2019 में बंगाल की राजनीति पलटी। लोकसभा चुनाव में वामदलों का वोट बैंक ढह गया और एक 'सामरिक मतदान' (टैक्टिकल वोटिंग) के तहत लेफ्ट का वोटर भाजपा की तरफ खिसक गया। नतीजा यह हो गया कि भाजपा सीधे 38.32 प्रतिशत पर आ गई और टीएममसी की जीत का अंतर घटकर मात्र 89 हजार रह गया।
2024 का लोकसभा चुनाव आते-आते टीएमसी की रणनीतिकार ममता बनर्जी ने खतरे को भांप लिया। उन्होंने एक कड़ा और अचूक फैसला लिया। अपने मौजूदा सांसद सुनील कुमार मंडल (जो बाद में भाजपा में चले गए) का टिकट काट दिया गया। उनकी जगह पार्टी ने एक पढ़ी-लिखी महिला उम्मीदवार डॉ. शर्मिला सरकार को मैदान में उतारा।
इस एक 'मास्टरस्ट्रोक' ने पूरा खेल पलट दिया। डॉ. शर्मिला सरकार ने न सिर्फ 48.11 प्रतिशत वोट हासिल किए, बल्कि भाजपा के असीम कुमार सरकार को 1 लाख 60 हजार से भी अधिक वोटों के विशाल अंतर से परास्त किया। भाजपा करीब 37 प्रतिशत के आंकड़े पर ही ठिठक कर रह गई।
--आईएएनएस
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