भारत के पड़ौसी पाकिस्तान के हालात बहुत ही बुरे हैं। हाल ही में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने पाकिस्तान में क्वेटा से पेशावर जा रही ज़फ़र एक्सप्रेस ट्रेन को भारी गोलीबारी कर अपने कब्जे में ले लिया। बीएलए ने ट्रेन पर हमले और उसके बाद सेना के साथ मुठभेड़ में 30 पाकिस्तानी सैनिकों को मार डालने का दावा किया है। 214 लोगों के कब्जे में होने का दावा करते हुए बीएलए ने यह चेतावनी दी कि यदि सेना ने बंधकों को छुड़ाने की कोशिश की, तो सभी को मार दिया जाएगा।
पाठकों को बताता चलूं कि इन बंधकों में सेना के जवान, अर्धसैनिक बल, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के अधिकारी भी शामिल हैं। हालांकि, पुलिस ने सिर्फ 35 लोगों के बंधक होने की बात मानी है।इसी बीच, पाकिस्तानी सेना ने 13 बलोच लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया है। वास्तव में,बीएलए ने पाकिस्तान की जेल में बंद बलूच कैदियों की रिहाई के लिए शहबाज शरीफ सरकार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है।
यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित बोलन स्टेशन पर बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के अलगाववादियों द्वारा जफर एक्सप्रेस ट्रेन को अगवा करने और लगभग 180-190 यात्रियों को बंधक बनाने की खबर दहलाने वाली है।
यह आलेख लिखे जाने तक यह भी खबरें आ रहीं हैं कि बलूचों ने पाक के सौ सुरक्षा कर्मियों को मार गिराया है। यह भी खबरें आ रहीं हैं कि जाफर एक्सप्रेस को हाइजैक करने वाले हथियारबंद तीस बलूचों को सुरक्षा बलों ने ढ़ेर कर दिया है।
इधर, सरकारी मीडिया रेडियो पाकिस्तान के हवाले से यह खबरें भी आईं हैं कि आपरेशन खत्म हो चुका है और सारे विद्रोही मारे जा चुके हैं। वहीं बलूचों ने यह अल्टीमेटम दिया बताते हैं कि बीस घंटे ही बचे हैं और सैन्य कार्रवाई पर वे सभी बंधकों को मौत के घाट उतार देंगे। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
सैन्य सूत्रों ने दावा किया है कि 190 यात्रियों को मुक्त कराया जा चुका है और तीस घायलों को अस्पताल में भरती कराया गया है। अब वास्तव में क्या सच है और क्या झूठ है,यह तो समय आने पर ही पता चल पाएगा, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि पाकिस्तान में जो भी हो रहा है, वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता है।
बहरहाल,यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने ट्रेन हाईजैक की निंदा करते हुए कहा कि बंधकों को तत्काल मुक्त करना चाहिए। वहीं चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि हम आतंकवाद से लोगों की रक्षा करने में पाकिस्तान का पूरी तरह से समर्थन जारी रखेंगे।
हाल फिलहाल जो घटना हुई है,यह आर्थिक रूप से खस्ताहाल पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्थाओं और उसकी स्थिरता पर अनेक प्रकार के सवालिया निशान पैदा करती है। यह घटना दर्शाती है कि पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ तो है ही, साथ ही साथ पाकिस्तान दिन-ब-दिन अराजकता और असंतोष की तरफ बढ़ता चला जा रहा है।
पाठकों को बताता चलूं कि बलूचिस्तान से गुजरने वाली जफर एक्सप्रेस पर यह कोई पहला हमला नहीं है। वास्तव में यह वह ट्रेन है, जिसमें अक्सर सरकारी कर्मचारी, सैनिक और अधिकारी वगैरह यात्रा करते हैं और बीएलए की इस पर हमेशा नजर रहती है। सच तो यह है कि बीएलए पिछले कई सालों से पाकिस्तान पर ऐसे हमले करता रहा है। उसने कभी चीन के इंजीनियर को निशाना बनाया तो वह कभी पाकिस्तान के राजनयिकों को निशाना बनाता है।
उल्लेखनीय है कि बीएलए अफगानिस्तान के दक्षिणी हिस्से में सक्रिय एक बलूच राष्ट्रवादी चरमपंथी संगठन है, जिसका उद्देश्य बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर स्वतंत्र राष्ट्र बनाना है। वास्तव में, कहना ग़लत नहीं होगा कि ब्लूचिस्तान में अलगाववाद अपने चरम पर है।
दरअसल, पाकिस्तानी शासन के दमन और राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेले जाने का नतीजा ही है कि बलूचिस्तान में लोग अलगाववाद में लिप्त हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान और ईरान की सीमा से लगे हुए खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र बलूचिस्तान में बीजिंग ने ग्वादर बंदरगाह और अन्य परियोजनाओं में निवेश किया है।
कहना ग़लत नहीं होगा कि पिछले कुछ वर्षों में कई बलूच अलगाववादी समूह उभरकर आए हैं, जो लगातार पाकिस्तानी सेना के खिलाफ राजनीतिक हिंसा को अंजाम दे रहे हैं।बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) सहित इन समूहों का टारगेट बलूचिस्तान के लिए पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करना है।
गौरतलब है कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) सबसे बड़ा बलूच अलगाववादी समूह है और यह बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की मांग करते हुए दशकों से पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विद्रोह कर रहा है।
दूसरे शब्दों में कहें तो बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) या बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी खुद को बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने वाला सशस्त्र समूह है। यह बलूचिस्तान में सक्रिय सबसे पुराना अलगाववादी समूह भी है। यह संगठन पहली बार 1970 के दशक में सामने आया था। बलूचिस्तान के महत्व की यदि हम बात करें तो बलूचिस्तान चीन के 60 अरब डालर के निवेश (सीपीईसी) का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां रेको डिक जैसे खनन प्रोजेक्ट शामिल हैं, जिन्हें दुनिया की सबसे बड़ी स्वर्ण और तांबा खदान माना जाता है। यह प्रांत अस्थिरता और सुरक्षा चिंताओं से जूझ रहा है।
बलूचों ने जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के समय बलूचिस्तान सूबे में सशस्त्र विद्रोह शुरू किया, लेकिन सैन्य तानशाह जियाउल हक की सत्ता पर कब्जे के बाद बलूच नेताओं के साथ हुई वार्ता के बाद उन्होंने पाकिस्तान के साथ संघर्ष विराम कर लिया था, लेकिन बीएलए एक बार फिर से जिंदा हो गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पाकिस्तान में कारगिल युद्ध के बाद तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसके बाद मुशर्रफ के इशारे पर वर्ष 2000 में बलूचिस्तान हाईकोर्ट के जस्टिस नवाब मिरी की हत्या कर दी गई।
पाकिस्तानी सेना ने मुशर्रफ के कहने पर इस केस में बलूच नेता खैर बक्श मिरी को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद से बलूच लिबरेशन आर्मी एक बार फिर सक्रिय हो गई।
यह भी उल्लेखनीय है कि आज की बलूच लिबरेशन आर्मी की आधिकारिक स्थापना 2020 में हुई थी। इसके बाद से बलूच लिबरेशन आर्मी ने बलूचिस्तान के विभिन्न इलाकों में सरकारी प्रतिष्ठानों और सुरक्षा बलों पर हमला करना शुरू कर दिया। इस समूह में शामिल ज्यादातर लगाके मैरी और बुगती जनजाति से थे। ये जनजातियां क्षेत्रीय स्वायत्तता पाने के लिए अब भी पाकिस्तान सरकार से लड़ रही हैं।
संक्षेप में कहें तो, भारत और पाकिस्तान के अलगाव के बाद वर्ष 1948 से ही बलूचों के लिए एक अलग देश की मांग के साथ विद्रोह की शुरुआत हो गई थी। यह संघर्ष 1950 से 1970 के दशकों तक कई चरणों में चला। वर्ष 2003 में परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल के दौरान विद्रोही गतिविधियां काफी बढ़ गईं और उन्होंने बलूची विद्रोहियों के विरुद्ध कई अभियान चलाए। बलूचों द्वारा उनके शोषण और मानवाधिकारों के हनन की शिकायत की जाती रही है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि बीएलए को पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश 'आतंकवादी संगठन' मानते हैं।
बीएलए सुरक्षा बलों, विभिन्न सरकारी इमारतों, चीनी सेना और उसके वर्कर्स को टारगेट करके हमले करता रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच बीएलए ने सुसाइड अटैक, बड़े हमलों को अंजाम दिया है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि मजीद ब्रिगेड को बीएलए का सुसाइड स्क्वाड माना जाता है, जो कई हाई-प्रोफाइल हमलों जैसे कि वर्ष 2018 में कराची में चीनी दूतावास पर हमले और वर्ष 2019 में ग्वादर में एक लग्ज़री होटल पर हमले में शामिल रहा है।
बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से एक बहुत ही समृद्ध प्रांत है और उसकी लड़ाई इस बात को लेकर है कि पाकिस्तान उसके संसाधनों का लगातार दोहन करता है। इससे ब्लूचिस्तान के स्थानीय लोगों को इससे कोई फायदा नहीं मिलता है। पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के खिलाफ बीएलए पिछले करीब 60-70 सालों से लड़ रहा है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान ने वर्ष 2006 में ही बीएलए पर प्रतिबंध लगा दिया था। बहरहाल, बीएलए या यूं कहें कि बलूचों की पहली और सबसे बड़ी मांग ये है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान की किसी भी एजेंसी या सुरक्षा एजेंसी के कोई भी नुमाइंदे वहां नहीं होने चाहिए।
इसके अलावा बलूचों का यह भी मानना है कि चीन के साथ सीपीईसी प्रोजेक्ट चल रहे हैं, और इन प्रोजेक्टों से उनके खनिजों का लगातार दोहन हो रहा है। उनका यह मानना है कि इन प्रोजेक्ट्स की वजह से बड़ी संख्या में समुदाय के लोग विस्थापित हुए हैं। वास्तव में, बलूच लोग इन प्रोजेक्ट्स के यहां से हटाने की लगातार कई सालों से मांग कर रहे हैं।
बहरहाल,आईएमएफ के कर्ज के बोझ तले पाकिस्तान आर्थिक बदहाली से तो जूझ ही रहा है, वैश्विक आतंकवाद सूचकांक की 2025 की रिपोर्ट में भी उसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आतंक प्रभावित देश बताया गया था।
आंकड़े यह भी बताते है कि वर्ष 2024 में पाकिस्तान में आतंकी हमलों में 1,600 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जो पिछले एक दशक में सर्वाधिक मौतों वाला वर्ष भी है।सच तो यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद का एक बड़ा गढ़ रहा है और आज भी है और यही आतंकवाद उसके गले की फांस बना हुआ है।इन हालातों के बीच पाकिस्तान में हाल ही में आयोजित आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी सुरक्षित ढंग से निपट गई, यह अच्छी बात है।
आज जरूरत इस बात की है अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान में ऐसी घटनाओं पर पूरी नजर और सतर्कता बरते, क्यों कि यह कभी भी पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक बड़ा व गंभीर खत्तरा बनकर उभर सकता है।
पाकिस्तान की अक्सर यह आदत रही है कि जब कभी भी उसके देश के अंदर ऐसी घटनाएं घटित होतीं हैं तो वह दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए भारत विरोधी सुर अलापने लगता है, ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह पूरी सतर्कता के साथ पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखे।
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