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ऐतिहासिक रिकॉर्ड : IFS संजीव चतुर्वेदी के मामलों से 17वें न्यायाधीश अलग, अब कैट दिल्ली के न्यायमूर्ति राजवीर सिंह वर्मा ने छोड़ा केस

Historical record: 17th judge recuses from IFS Sanjiv Chaturvedi case, now CAT Delhi Justice Rajveer Singh Verma leaves the case - Dehradun News in Hindi

खास खबर। देहरादून/नईदिल्ली उत्तराखंड कैडर में चर्चित भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मुकदमों की सुनवाई से न्यायाधीशों के खुद को अलग करने का एक ऐसा सिलसिला जारी है, जिसने देश के न्यायिक इतिहास में नया रिकॉर्ड बना दिया है। अब तक किसी एक व्यक्ति के मामलों से इतनी बड़ी संख्या में जजों के अलग हटने का कोई पूर्व उदाहरण नहीं मिलता। इस कड़ी में अब 17वें न्यायाधीश के रूप में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की प्रधान पीठ (दिल्ली) के सदस्य (न्यायिक) न्यायमूर्ति राजवीर सिंह वर्मा ने चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है।
दिल्ली कैट के न्यायमूर्ति राजवीर सिंह वर्मा की पीठ ने 21 सितंबर को संक्षिप्त आदेश पारित करते हुए दर्ज किया, ‘कुछ समय तक मामले की सुनवाई करने के पश्चात, राजवीर सिंह वर्मा, सदस्य (न्यायिक), स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग करते हैं।’ यह याचिका मई 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में आईएफएस अधिकारियों के मूल्यांकन रिपोर्ट चैनल को लेकर उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के आदेश को चुनौती देने से संबंधित है। पूर्व के अधिकांश मामलों की तरह इस बार भी सुनवाई से हटने का कोई ठोस या स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों तक लंबी फेहरिस्तः
संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों से अब तक सर्वोच्च न्यायालय के 2 न्यायाधीश, नैनीताल उच्च न्यायालय के 4 न्यायाधीश, कैट के अध्यक्ष सहित 9 न्यायाधीश तथा जिला न्यायपालिका के 2 न्यायाधीश अलग हो चुके हैं। इस अभूतपूर्व न्यायिक घटनाक्रम की प्रमुख कड़ियां इस प्रकार हैंः-
सर्वोच्च न्यायालय: नवंबर 2013 में तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने चतुर्वेदी द्वारा उजागर भ्रष्टाचार व उत्पीड़न मामले में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा व वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका से खुद को अलग किया था। अगस्त 2016 में तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति यू.यू. ललित भी इसी मामले से अलग हो गए थे।
नैनीताल उच्च न्यायालय: सितंबर-अक्टूबर 2025 में न्यायमूर्ति आलोक वर्मा और न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी ने स्थगन आदेश की अवहेलना पर कैट सदस्यों व रजिस्ट्री के खिलाफ दायर अवमानना याचिका से खुद को अलग किया। इससे पूर्व फरवरी 2024 में न्यायमूर्ति मनोज तिवारी ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर कैबिनेट की नियुक्ति समिति (एसीसी) से दस्तावेज तलब करने वाले मामले से, तथा मई 2023 में न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने एम्स सीवीओ के रूप में भ्रष्टाचार विरोधी जांच से जुड़े दस्तावेज मांगने के मामले से अलग हटने का फैसला किया था। इन चारों न्यायाधीशों ने भी अपने आदेशों में कोई कारण नहीं बताया।
कैट (CAT) पीठें: मार्च 2019 में तत्कालीन अध्यक्ष न्यायमूर्ति एल. नरसिम्हन रेड्डी ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रमों’ का हवाला देकर स्थानांतरण याचिकाओं से हटे। फरवरी 2021 में न्यायमूर्ति आर.एन. सिंह (केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मामला), नवंबर 2023 में न्यायमूर्ति मनीष गर्ग व छबिलेंद्र राउल की पीठ (संयुक्त सचिव स्तर इम्पैनलमेंट व एसीसी रिकॉर्ड मामला), जनवरी 2025 में न्यायमूर्ति राजीव जोशी (लोकपाल प्रतिनियुक्ति मामला) तथा फरवरी 2025 में हरविंदर ओबेरॉय व बी. आनंद की खंडपीठ (एम्स सीवीओ के दौरान तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा द्वारा मूल्यांकन रिपोर्ट डाउनग्रेड करने से जुड़ा मामला) ने स्वयं को अलग कर लिया था।
जिला न्यायपालिका: अप्रैल 2025 में एसीजेएम नेहा कुशवाहा ने कैट जज डी.एस. महरा से पूर्व पारिवारिक संबंधों का हवाला देकर कैट जज मनीष गर्ग के खिलाफ मानहानि मामले से खुद को अलग किया। वहीं अप्रैल 2018 में शिमला की अदालत के जज ने हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव विनीत चौधरी द्वारा दायर मानहानि केस से खुद को अलग किया था।

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