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कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में बाघ शिकार मामलाः 7 साल बाद सीबीआई जांच की रोक हटने के करीब, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए नोटिस

Corbett Tiger Reserve tiger poaching case: After 7 years, the stay on CBI investigation is about to be lifted, Supreme Court issues notice - Dehradun News in Hindi

सीबीआई के हलफनामे में हुए चौंकाने वाले खुलासे, शिकारियों के साथ वन अधिकारियों की मिलीभगत बताई

देहरादून। उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) में 7 साल पहले हुए बहुचर्चित बाघ शिकार के मामले में सीबीआई जांच पर लगी रोक हटने की प्रबल संभावना बन गई है। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण कार्यकर्ता अतुल सती के आवेदन पर सुनवाई करते हुए, रोक हटाने के संबंध में केंद्र सरकार, उत्तराखंड सरकार और पूर्व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (CWLW) डी.एस. खाती को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 12 दिसंबर को निर्धारित की गई है।
पर्यावरण कार्यकर्ता अतुल सती ने अधिवक्ता गोविंद जी के माध्यम से दायर अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि डी.एस. खाती ने अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई जांच पर रोक लगवाते समय न्यायालय को गुमराह किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि खाती ने यह दावा किया था कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य या उसके अधिकारियों को सुने बिना ही अख़बारों की रिपोर्टों के आधार पर सीबीआई जांच का आदेश दे दिया था।
सती ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि जांच का आदेश केवल अख़बारों की रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि बाघ शिकार से जुड़े "गंभीर तथ्यों" को उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाए जाने के बाद दिया गया था। खाती ने स्वयं उच्च न्यायालय में एक शपथ पत्र दाखिल किया था, जो उनके इस दावे को खारिज करता है कि राज्य को प्रतिक्रिया का अवसर नहीं दिया गया था। उच्च न्यायालय का आदेश अनजाने में 2012 की एक पुरानी याचिका में पारित हो गया था, जबकि अधिकांश दस्तावेज 2017 की याचिका में थे। सती ने आरोप लगाया कि खाती ने रिकॉर्ड में हुई इस लिपिकीय त्रुटि (Clerical Error) का "अनुचित और अत्यंत अनैतिक लाभ" उठाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
सीबीआई के हलफनामे ने खोली पोल: मामले की सबसे विस्फोटक जानकारी सीबीआई के हलफनामों से सामने आई है, जिसने वन विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीबीआई ने अक्टूबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दिए गए अपने प्रत्युत्तर शपथ पत्र में स्पष्ट कहा था कि अब तक की जांच यह संकेत देती है कि वन अधिकारियों की शिकारी गिरोह के साथ मिलीभगत थी।
सीबीआई ने यह भी बताया था कि बाघों की मौत के मामलों में वन अधिकारियों ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया, और वन अधिकारियों के खिलाफ सबूतों से छेड़छाड़ के आरोपों की विस्तृत एवं गहन जांच आवश्यक है। जुलाई 2023 में एक अलग आवेदन दायर करके सीबीआई ने जांच पर लगे स्थगन आदेश को हटाने का पुरजोर अनुरोध किया था, चेतावनी दी थी कि स्थगन जारी रहने से शिकारी सबूतों को नष्ट कर सकते हैं, जिससे पूरी जांच के हित को नुकसान होगा।
अंतरराष्ट्रीय गिरोह और जांच का दायराः कार्यकर्ता सती ने कोर्ट को बताया कि यह केवल स्थानीय मामला नहीं है। नेपाल से बाघों की खालों की बरामदगी, जिन्हें भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने कॉर्बेट के बाघों की खाल के रूप में प्रमाणित किया था, यह दर्शाती है कि इस अपराध के पीछे अंतरराष्ट्रीय एवं अंतर-राज्यीय नेटवर्क सक्रिय है, जो उत्तर प्रदेश और हरियाणा तक फैला हुआ है। इस नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए सीबीआई जैसी विशेषज्ञ एजेंसी की जांच बहुत जरूरी है।
जांच में देरी से शिकारियों के नेटवर्क को फायदाः सती ने कोर्ट से गुहार लगाई कि सात साल से जारी यह स्थगन न केवल शिकार के पीछे सक्रिय अंतर-राज्यीय नेटवर्क का पता लगाने की संभावनाओं को गंभीर रूप से बाधित कर रहा है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में भी देरी कर रहा है। डी.एस. खाती ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है, यह कहते हुए कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन को अभी तक नहीं देखा है। इस बीच, खाती को बाघ शिकार के मामले में दोषी ठहराए जाने के समर्थन में 2018 में उत्तराखंड फॉरेस्ट फोर्स के प्रमुख द्वारा लिखे गए एक पत्र का हवाला दिया गया है।
वर्तमान वन प्रमुख समीर सिन्हा भी जांच के दायरे मेंः इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, यह वर्तमान हॉफ (Head of Forest Force) समीर सिन्हा के लिए भी गंभीर परेशानी खड़ी कर सकता है। जून 2018 में तत्कालीन पीसीसीएफ जयराज ने सरकार के आदेश पर इस मामले की जांच करते हुए खाती (उस समय मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक थे) और तत्कालीन निदेशक कार्बेट टाइगर रिजर्व समीर सिन्हा के खिलाफ भी कड़े आरोप लगाए थे और कार्रवाई करने की सिफाऱिश की थी। पिछले वर्ष, कॉर्बेट में सफारी परियोजना के लिए कथित तौर पर पेड़ों की कटाई और अवैध निर्माण के मामले में भी उत्तराखंड सरकार के अधिकारियों के खिलाफ जांच का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस जारी होने के बाद, अब तीन सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई इस बहुचर्चित और संवेदनशील मामले की दिशा तय करेगी। इस संबंध में वन विभाग के प्रमुख समीर सिन्हा से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। लेकिन, उन्होंने फोन काट दिया और वाट्सएप मैसेज का कोई उत्तर नहीं दिया।

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Web Title-Corbett Tiger Reserve tiger poaching case: After 7 years, the stay on CBI investigation is about to be lifted, Supreme Court issues notice
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