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कालीन उद्योग के लिए दुनिया में मशहूर भदोही में विकास के ऊपर जातीय समीकरण भारी

Racial equation heavy over development - Lucknow News in Hindi

धीरज उपाध्याय

लखनऊ
। लोकसभा चुनाव 2019 के छठे चरण में पूर्वांचल की प्रमुख सीटो में से एक भदोही जो की बनारस और प्रयागराज के बीचों बीच बसा है, दुनिया भर में अपने कालीन और हथकरघा उद्योग के लिए मशहूर है। भदोही जिला करीब 4000 हजार करोड़ सालाना का कालीन निर्यात करता है। जिसने हजारों की संख्या में यहाँ के लोगों को रोजगार दिया हुआ है। हर बार की तरह इस बार भी यहाँ विकास के मुद्दे के ऊपर जातीय समीकरण वाली राजनीति भारी दिख रही है। ब्राह्मण, दलित, बिन्द, मुस्लिम, यादव बहुल इस सीट में करीब 18 लाख मतदाता है जो 12 मई को अपना सांसद चुनने के लिए मतदान करेंगे । इस बार यहाँ पर त्रिकोणिय मुक़ाबला होने की संभावना है।

यहाँ पर लोग अपने लिए बेहतर आधारभूत सुविधाएं चाहते है, जिससे यहाँ का कालीन उद्योग और तरक्की कर सके और स्थानिय लोगों को और अधिक रोजगार मिल सके। हालांकि जिले में इस बार चुनाव में विकास के सामने जातिय समीकरण का बोलबाला दिख रहा है। सभी पार्टियों ने इस गणित को ध्यान में रखकर टिकट वितरण किया है। राजनीतिक पंडितों की माने तो यदि भाजपा प्रत्याशी रमेश बिन्द अपने बिन्द समाज मतों के अलावा ब्राह्मण और क्षत्रिय मतों को अपने साथ रखने में कामयाब रहे तो परिणाम उनके पक्ष में जा सकता है ।

वहीं दूसरी और यदि गठबंधन के प्रत्याशी रंगनाथ मिश्र अपने परंपरागत दलित और पिछड़े समाज के मतो को बचाने के साथ ही ब्राह्मण, क्षत्रिय मतों को अपने पक्ष में करने के प्रयास में सफल रहे तो परिणाम उनके पक्ष में जा सकता है। वहीं कांग्रेस ने बाहुबली व आजमगढ़ के पूर्व सांसद रमाकांत यादव को टिकट देकर मुक़ाबला त्रिकोणीय व रोचक बना दिया है।
भदोही संसदीय क्षेत्र में मतदाताओं का रूझान किसी भी पार्टी की तरफ एक तरफा नहीं दिख रहा है। जबकि जातीय समीकरण के आधार पर कहा जा सकता है कि यहाँ सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी रंगनाथ मिश्र और भाजपा के प्रत्याशी रमेश बिन्द के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। जबकि कांग्रेस ने आजमगढ़ के बाहुबली रमाकांत यादव को प्रत्याशी बनाया है जो गठबंधन के वोट में सेंध लगाने का काम करते नजर आ रहे हैं , जिससे यहाँ चुनाव त्रिकोणी लड़ाई की ओर बढ़ा चला है।

देखा जाये तो भदोही संसदीय क्षेत्र में वर्ष 2014 के चुनाव में जब सपा-बसपा अलग होकर चुनाव लड़ी थी, तब भाजपा को यहाँ 22 फीसदी वोट मिले थे और भाजपा प्रत्याशी वीरेन्द्र सिंह मस्त यहाँ से करीब 1.5 लाख से अधिक वोटों से विजयी हुए थे। वहीं दूसरे नंबर पर रही बसपा को 13.38% और सपा को 13% वोट मिले थे। लेकिन इस बार 2019 में सपा-बसपा का गठबंधन के बाद परिस्थितियां अलग होने से भाजपा ने अपने मौजूदा एमपी को बलिया भेज दिया तथा जातिय समीकरण देखते हुये बसपा से आए रमेश बिन्द को प्रत्याशी बनाया है।


जबकि सपा-बसपा गठबंधन की ओर से पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्र को प्रत्याशी बनाकर दलित व पिछड़ेसमाज के साथ-साथ सर्वण समाज पर निशाना साधने का भरपूर प्रयास हुआ हैं। सभी पार्टियों के बड़े नेताओं जैसे प्रियंका, अखिलेश और मोदी ने यहाँ अपनी अपनी पार्टी का प्रचार किया है। संसदीय क्षेत्र में निर्णायक मतो में ब्राह्मण, क्षत्रिय,बिन्द, दलित, यादव , मुस्लमान का मत माना जा रहा है। ऐसे में यहाँ मुक़ाबला दिलचस्प है। हालांकि स्थनिए लोग चाहते है कि उनका सांसद स्थनिए मुद्दो को भी उठाए और जिले का समुचित विकास करे। यहाँ पर 2006 में बंद हुई चीनी मिल किसी भी पार्टी के एजेंडे में नहीं है, जिसका यहाँ के किसानों में रोष है ।

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Web Title-Racial equation heavy over development
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